
किशोरी मिश्रा
किशोरी मिश्रा को डिजिटल मीडिया का लगभग 8+ वर्षों का व्यापक अनुभव है, जिसमें स्वास्थ्य (Health) और जीवनशैली ... Read More
Written By: Kishori Mishra | Updated : April 21, 2026 4:08 PM IST
5 दिन के बच्चे की हुई सफल सर्जरी
डिलीवरी वाले दिन चारों ओर खुशियां छाई होती हैं। हर किसी के आंखों में खुशी के आंसू होते हैं, लेकिन ये खुशियां तब गम के आंसू में बदल जाता है, जब जन्म लेते ही बच्चे को परिवार के सदस्यों की गोद के बजाय एनआईसीयू का बिस्तर मिलता है। ऐसी ही घटना महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर में हुई, जहां बच्चा सही ढंग से सांस नहीं ले पा रहा था, जिसकी वजह से उसे एनआईसीयू में भर्ती कराया गया। जांच होने के बाद पता चला कि बच्चे को जन्मजात हार्ट डिजीज है। इसके बाद बच्चे को नारायणाहेल्थएसआरसीसीचिल्ड्रन्सहॉस्पिटल में ले जाया गया, जहां उसे एक नया जीवनदान मिला। आइए इस घटना के बारे में विस्तार से जानते हैं-
बताया जा रहा है कि नवजात शिशु एक महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर में रहने वाला है। जन्म के बाद अचानक उसकी स्किन नीली नजर आने लगी, जहां उसके शरीर का ऑक्सीजन लेवल जांच किया गया। जांच में उसके ऑक्सीजन का लेवल सिर्फ 65 प्रतिशत पाई गई। वहां के डॉक्टर्स को गंभीर सायनोटिक जन्मजात हार्ट डिजीज की आशंका हुई। इस स्थिति में फेफड़ों तक पर्याप्त ब्लड नहीं पहुंच पाता, स्थानीय चिकित्सक ने तुरंत मुंबई स्थित नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल के विशेषज्ञों से संपर्क कर आपातकालीन रेफरल की व्यवस्था की।
नारायणा हॉस्पिटल के क्लिनिकल लीड एंड सीनियर कंसल्टेंट पीडियाट्रिक कार्डियलॉजिस्ट डॉ. सुप्रतिम सेन ने कार्डियक टीम को लीड किया था। टीम की सलाह पर नवजात को एंबुलेंस से ट्रांसफर करने से पहले जीवनरक्षक दवा प्रोस्टाग्लैंडिन ई1 दी गई। 12 घंटे की लंबी यात्रा के बावजूद शिशु अस्पताल सुरक्षित अवस्था में पहुंचा।
इस स्थिति में हृदय के दाएं हिस्से और फेफड़ों को जोड़ने वाली सामान्य धमनी (पल्मोनरी आर्टरी) नहीं होती है। नवजात अस्थायी रूप से पीडीए के माध्यम से ब्लड सर्कुलेट होने के कारण जीवित रहता है, जो भ्रूण अवस्था की एक प्राकृतिक संरचना है। जन्म के दो से सात दिनों के अंदर अधिकांश पीडीए अपने आप बंद हो जाते हैं, इसलिए बच्चे का समय पर इलाज बहुत ही जरूरी हो जाता है।
डॉ. सुप्रतिम सेन ने बताया कि कार्डियक टीम द्वारा कार्डियक कैथेटराइजेशन लैब में पीडीए स्टेंटिंग की, जो न्यूनतम इनवेसिव लेकिन तकनीकी रूप से काफी जटिल प्रोसेस है। लगभग एक घंटे चली इस प्रक्रिया के दौरान पीडीए में सफलतापूर्वक एक छोटा स्टेंट स्थापित किया गया, जिससे फेफड़ों तक ब्लड फ्लो सही किया गया। इससे शिशु के शरीर का ऑक्सीजन लेवल स्थिर हुआ। सर्जरी के बाद सिर्फ 5 दिन के अंदर की बच्चे की स्थिति में सुधार देखा गया, जिसके बच्चे को अस्पताल से छुट्टी मिल गई।
डॉक्टर सुप्रतिम सेन का कहना है कि नवजातों में पीडीए स्टेंटिंग को काफी जटिल प्रक्रिया मानी जाती है, क्योंकि मरीज सिर्फ कुछ दिन के होते हैं और उनका वजन 3.5 किलोग्राम से कम होता है। पिछले कुछ वर्षों में नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल की पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी टीम ने जटिल जन्मजात हृदय दोष से पीड़ित शिशुओं में लगभग 50 पीडीए स्टेंटिंग प्रक्रियाएं सफलतापूर्वक पूरी की हैं, जिनके तात्कालिक और मध्यम अवधि के परिणाम रिजल्ट काफी अच्छे रहे हैं।
हार्ट ट्रांसप्लांट एक जटिल और महंगी सर्जरी होती है। भारत में इसका कुल खर्च आमतौर पर 15 लाख से 30 लाख रुपये तक हो सकता है। इसमें डोनर हार्ट की व्यवस्था, सर्जरी, ICU में देखभाल, दवाइयां और डॉक्टरों की फीस शामिल होती है। सरकारी अस्पतालों में यह खर्च अपेक्षाकृत कम हो सकता है, जबकि निजी अस्पतालों में ज्यादा होता है। सर्जरी के बाद मरीज को जीवनभर इम्यूनो-सप्रेसेंट दवाइयां लेनी पड़ती हैं, जिनका खर्च हर महीने 10,000 से 30,000 रुपये तक हो सकता है। कुछ मामलों में आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं से आर्थिक मदद भी मिल जाती है।
जी हां, मोटापा हार्ट डिजिज का एक रिस्क फैक्टर होता है।
75 वर्ष की उम्र के बाद, हार्ट डिजिज रोग के मरीजों में महिलाओं की संख्या अधिक होती है।
हार्ट पेशेंट को नियमित रूप से 30-35 मिनट की वॉक जरूर करना चाहिए। इससे हृदय स्वास्थ्य में सुधार होता है।
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