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Written By: Editorial Team | Published : April 18, 2018 3:57 PM IST
कैंसर का नाम सुनते ही लोगों को मौत का डर सताने लगता है। इस आधुनिक दुनिया में आज भी ज्यादातर लोगों के जहन में कैंसर को लेकर कई तरह की भ्रांतियां (मिथ) हैं। कुछ मिथ को लोग सच मान लेते हैं। हालांकि, इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता है। कोई सोचता है कि कैंसर होना यानी मौत, तो कुछ लोग सोचते हैं कि यह लाइलाज रोग है, लेकिन सच में ऐसा नहीं है।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, दुनिया भर में प्रत्येक वर्ष 12.7 मिलियन से भी अधिक लोग कैंसर से ग्रस्त होते हैं और सात से आठ मिलियन से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है। हालांकि, कैंसर को लेकर लोगों में तरह-तरह की भ्रांतियां एवं डर व्याप्त हैं, जिसे सिर्फ जागरूकता के जरिए ही दूर किया जा सकता है। इन गलत मिथ के कारण ही कुछ लोग इसका सही समय पर इलाज कराने से बचते हैं।
बीएमसीएचआरसी, जयपुर की सीनियर कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ. निधि पटनी कैंसर से जुड़ी कुछ आम मिथ्स के बारे में बता रही हैं-
मिथ 1- कैंसर एक संक्रामक बीमारी है।
फैक्ट 1- मेडिकल जगत में कई तरह की टेक्नोलॉजी और सुविधाओं के आ जाने के बाद भी कई लोग ऐसे हैं, जो ये सोचते हैं कि कैंसर एक संक्रामक बीमारी है। पर सच्चाई तो यह है कि कैंसर न तो संक्रामक बीमारी है और न ही ही छूने से फैलने वाला है। यह तो शरीर में कहीं भी असामान्य कोशिकाओं के अनियन्त्रित रूप से बढ़ने के कारण होता है। ये कोशिकाएं सामान्य शारीरिक ऊतकों में प्रवेश कर जाती हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि कई कारण हैं, जिससे एब्नॉर्मल सेल डिविजन होता है और बाद में कैंसर कोशिकाओं का निर्माण होने लगता है, जैसे टॉक्सिन एक्सपोजर, पैथोजेन्स, रेडिएशन और आनुवांशिक (जेनेटिक्स)।
मिथ 2- एफएनएसी/बायोप्सी होने के बाद कैंसर फैलता है।
फैक्ट 2- अधिकतर लोग ये सोचते हैं कि जांच प्रक्रिया के कारण कैंसर होता है, न कि टॉक्सिन एक्सपोजर या किसी अन्य कारणों से। लोगों की आम धारणा है कि एफएनएसी (फाइन नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी) और बायोप्सी करवाने के बाद कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। दरअसल, एफएनएसी बहुत ही साधारण, आसान और सस्ता तरीका है, जिसमें सुई के जरिए गांठ या लम्प से सैंपल लिया जाता है। वहीं, बायोप्सी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें परीक्षण के लिए शरीर से टिशू का सैंपल लिया जाता है। कैंसर है या नहीं, इसका पता लगाने में ये दोनों ही महत्वपूर्ण और सुरक्षित जांच के तरीके हैं। हैरानी की बात तो यह है कि जब किसी को जांच प्रक्रिया के बाद कैंसर होने का पता चलता है, तो वे इन टेस्ट को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। आज भी इस प्रगतिशील दुनिया में इस तरह के विचार रखने वाले लोग मौजूद हैं।
मिथ 3- बीमारी से ज्यादा खराब कैंसर का इलाज है।
फैक्ट 3- यह मिथ आज से दो दशक पहले सच हो सकता था, पर अब ऐसा नहीं है। आज एडवांस टेक्नोलॉजी, नई-नई दवाओं के आ जाने से पहले से कैंसर का इलाज बहुत आसान हुआ है। इसके साइड एफेक्ट भी बहुत कम हैं। इलाज प्रक्रिया को सहन करना भी पहले से बहुत आसान हो गया है।
मिथ 4- कैंसर गांठ हमेशा दर्द देने वाला होता है।
फैक्ट 4- कैंसर का गांठ शुरुआत में दर्द देने वाला नहीं होता। बाद के स्टेजेज में दर्द महसूस किया जा सकता है, जब टिशू जैसे नर्व्स, मांसपेशियों, हड्डियों आदि में यह फैल नहीं जाता है। कई लोग गांठ को तब तक नजरअंदाज करते रहते हैं, जब तक कि इसमें कोई दर्द नहीं होता। ऐसा करने से बाद में यह और भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है।
मिथ 5- इलाज कराने के बाद भी कैंसर से मौत ही होती है।
फैक्ट 5- मौत को कोई नहीं रोक सकता, लेकिन कैंसर की पहचान सही समय पर कर ली जाए और प्रॉपर इलाज करवाया जाए, तो कैंसर से होने वाले मौत के खतरे को बहुत हद तक टाला जा सकता है। जरूरी है कि आप कैंसर के किसी भी लक्षण या खतरे को अनदेखा न करें। शरीर में हुए गांठ की जांच करवाएं।
मिथ 6- कैंसर एक आनुवांशिक बीमारी है।
फैक्ट 6- सभी तरह के कैंसर नेचर में जेनेटिक नहीं होते। कुछ ही कैंसर जैसे ब्रेस्ट, ओवेरियन, प्रोस्टेट, कोलोन कैंसर ही जेनेटिक प्रवृत्ति के होते हैं। अन्य कैंसर लाइफस्टाइल से संबंधित और टॉक्सिन एक्सपोजर के कारण भी हो सकते हैं।
मिथ 7- रेडिएशन थेरेपी दर्द भरा होता है।
फैक्ट 7- रेडिएशन थेरेपी दर्द भरा नहीं होता, लेकिन जब चेहरे और गर्दन के पास इस थेरेपी को किया जाता है, तो कई बार इससे रिएक्शन होता है। ऐसे में दर्द के कारण निगलने में परेशानी होती है। लेकिन शरीर के दूसरे हिस्सों में जैसे दिमाग, स्तन, फेफड़े आदि में इस प्रक्रिया से बिल्कुल भी दर्द नहीं होता है।
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अनुवादक: Anshumala.
चित्रस्रोत: Shutterstock Images.