
आशु कुमार दास
आशु कुमार दास एक अनुभवी हेल्थ कंटेंट स्पेशलिस्ट हैं। इन्हें हेल्थ कंटेंट राइटर के तौर पर काम करते हुए 6 ... Read More
Medically Verified By: Dr. Anil Thakwani
1 अगस्त को लंग कैंसर डे मनाया जाता है।
पहले हम यही सोचते थे कि फेफड़ों का कैंसर = सिगरेट पीने वालों की बीमारी। लेकिन आज अस्पतालों में ऐसे मरीज भी आ रहे हैं जिन्होंने जिंदगी में कभी सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया। फिर भी उन्हें लंग कैंसर हो गया। इसका मतलब साफ है कि अब लंग कैंसर सिर्फ सिगरेट, हुक्का और बीड़ी पीने वालों की बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि हर किसी को हो रही है। नोएडा स्थित शारदा केयर हेल्थसिटी के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर और हेड डॉ. अनिल थकवानी का बताते हैं कि भारत जैसे देश में आज भी लंग कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को लेकर कई सारी बातें कही जाती हैं, जिसके कारण बीमारी का पता देर से चलता है। 1 अगस्त को जब वर्ल्ड लंग कैंसर डे मनाया जा रहा है, तब डॉ. अनिल थकवानी बता रहे हैं लंग कैंसर से जुड़े ऐसे ही 5 मिथकों के बारे में।
लंग कैंसर एक घातक बीमारी है।
सच्चाई- डॉक्टर कहते हैं यह सबसे खतरनाक गलतफहमी है। हां, सिगरेट पीना लंग कैंसर होने का सबसे बड़ा कारण है। लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। दिल्ली-नोएडा जैसी जगहों की हवा में PM 2.5 रोज फेफड़ों में जा रहा है। घर में कोई स्मोक करता है और आप उसका धुआं सांस लेते हैं। गांवों में या पुराने घरों में लकड़ी-कोयले पर खाना बनाने से निकलने वाला धुआं। ऑफिस व फैक्ट्री से निकलने वाले केमिकल्स जैसे एस्बेस्टस, रेडॉन गैस भी लंग कैंसर जैसी घातक बीमारी का कारण बन रहे हैं। जो लोग लंबे समय तक प्रदूषण और ऊपर बताए गई कारकों के संपर्क में रहते हैं उन्हें भी लंग कैंसर का खतरा रहता है।
सच्चाई- भारत में हर 3 से 4 महीने में मौसम में बदलाव होता है। मौसम में बदलाव होने पर सर्दी- जुकाम होना नॉर्मल है। लेकिन अगर यह परेशानी 12 महीने की हो रही है तो सतर्क होना जरूरी है। डॉक्टर कहते हैं- हम सोचते हैं मैं तो पीता नहीं, तो कैंसर कैसे होगा और 3 महीने तक खांसी दबाते रहते हैं। यह करना पूरी तरह से गलत है। अगर किसी व्यक्ति को लगातार खांसी आ रही है, सीने में दर्द हो रहता है, खाना खाने के बाद भी वजन नहीं बढ़ रहा है तो यह टीबी या फेफड़ों से जुड़ी किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है। अगर इसका सही समय पर इलाज न कराया जाए तो यह लंग कैंसर का रूप ले सकता है।
सच्चाई - असल में शुरुआत में फेफड़ों के कैंसर का कोई लक्षण होता ही नहीं है। फेफड़े बहुत बड़े होते हैं और उनमें दर्द की नसें भी कम होती हैं। इसलिए कैंसर जब छोटा होता है तब वो चुपचाप बढ़ता रहता है। पता तब चलता है जब वो काफी बड़ा हो गया हो या दूसरे अंगों में फैल गया हो। इसलिए जिन लोगों को रिस्क ज्यादा है - जैसे 50+ उम्र, स्मोकिंग हिस्ट्री, फैमिली हिस्ट्री उन्हें डॉक्टर की सलाह पर साल में 1 बार Low-Dose CT Scan जरूर करवाना चाहिए।
कई कारणों से महिलाओं को भी लंग कैंसर का खतरा है।
सच्चाई - इस मिथक को तोड़ते हुए डॉ. अनिल थकवानी बताते हैं कि यह बात 2 दशक पुरानी हो चुकी है। अब ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के केस तेजी से बढ़ रहे हैं। खासकर वो महिलाएं जिन्होंने कभी स्मोक नहीं किया। महिलाओं में फेफड़ों का कैंसर होने का मुख्य कारण है कि वो सालों से रसोई के धुएं में हैं। घर में पति/बेटा स्मोक करता है तो सेकेंड-हैंड स्मोक ले रही हैं। इसलिए मैं लेडी हूं, मुझे नहीं होगा वाली सोच निकाल दीजिए। अगर आपको अपने अंदर फेफड़ों से जुड़ा कोई लक्षण नजर आ रहा है तो तुरंत अपने डॉक्टर से बात करें और टेस्ट करवाएं।
सच्चाई - फेफड़ों का कैंसर या कोई अन्य कैंसर होने पर आपकी मौत ही होगी यह बात बिल्कुल गलत है। अगर समय पर फेफड़ों के कैंसर का पता चल जाए तो सर्जरी से ट्यूमर निकाला जा सकता है। कुछ मामलों में टार्गेटेड थेरेपी - कैंसर की जीन को टारगेट करने वाली दवा, इम्यूनोथेरेपी - आपकी बॉडी की इम्यूनिटी को कैंसर से लड़ने लायक बनाना, कीमो + रेडिएशन के जरिए मरीज की जिंदगी को बचाया जा सकता है। डॉक्टर बताते हैं कि फेफड़ों के कैंसर का इलाज करवाने के बाद कई मरीज 5 से 10 साल तक बिल्कुल सामान्य जिंदगी जीते हैं।
साल में 1 बार लंग कैंसर की जांच जरूरी है।
अगर आप भी लंग कैंसर जैसी घातक बीमारी से बचाव करना चाहते हैं तो डॉक्टर द्वारा बताई गई इन चीजों से दूरी ही बनाकर रखें।
अगर आप हाई-रिस्क कैटेगरी में हैं तो साल में 1 बार चेस्ट एक्स-रे या डॉक्टर से सलाह लें।
Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसका उद्देश्य किसी भी बीमारी का इलाज या डॉक्टर की सलाह का विकल्प बनना नहीं है। फेफड़ों के कैंसर या किसी भी अन्य स्वास्थ्य समस्या के लक्षण दिखने पर खुद इलाज करने से बचें। सही जांच और इलाज के लिए योग्य डॉक्टर या फेफड़े के विशेषज्ञ यानी पल्मोनोलॉजिस्ट/ऑन्कोलॉजिस्ट से तुरंत सलाह लें।