
मुकेश शर्मा
मुकेश शर्मा दिल्ली यूनिर्विसिटी से जर्नलिज्म डिग्री होल्डर हैं और पिछले 8 साल से Health Journalism से जुड़े हुए ... Read More
12 year old liver transplant
आज वर्ल्ड ट्रांसप्लांट डे है और इस मौके पर हम आपको ऐसी ही सच्ची कहानी के बारे में बताने वाले हैं, जिसमें एक मां ने अपने लिवर का कुछ हिस्सा अपनी बेटी को देकर उसकी जान को बचाया। कहते हैं ना कि कभी-कभी जिंदगी दूसरा मौका भी दे देती है और शायद गुजरात की रहने वाली इस महिला की अच्छी किस्मत से उसे दूसरा मौका मिला जिससे कि वह अपने दूसरे बच्चे की जान को बचा पाई। यह कहानी है गुजरात की रहने वाली एक महिला और उसकी 12 साल की बेटी आयशाबेन की जिसे एक दुर्लभ लिवर की बीमारी थी। धीरे-धीरे बच्ची का हालत इतनी बिगड़ गई कि डॉक्टरों ने लिवर ट्रांसप्लांट ही एक आखिरी विकल्प बताया। Apollo Hospitals Navi Mumbai के डॉक्टरों की मेहनत और एक मां की हिम्मत और उम्मीद ने किस तरह बच्ची के जीवन को बचाया इस कहानी में आगे जानेंगे।
गुजरात की रहने वाली 12 साल की आयशाबेन प्रोग्रेसिव फेमिलियल इंट्राहेप्टिक कोलेस्टेसिस (PFIC3) नाम की बीमारी थी। यह लिवर की एक दुर्लभ जेनेटिक बीमारी है, जो ABCB4 नाम के जीन में किसी तरह की म्यूटेशन (असामान्य बदलाव) के कारण होती है। इस बीमारी में बाइल (पित्तरस) से सही से निकल नहीं पाता है। इस स्थिति के कारण समय के साथ-साथ लिवर के अंदर बाइल, लिवर को ही नुकसान पहुंचान लग जाता है और लिवर डैमेज होने लगता है।
आयशाबेन को सिर्फ सिर्फ PFIC3 ही नहीं था बल्कि ऑटोइम्यून लिवर डिजीज भी था, जिसमें इम्यून सिस्टम गलती से लिवर को ही नुकसान पहुंचाने लग जाता है। सालों से आयशाबेन का इलाज दवाओं से चल रहा था, दवाओं से मदद तो मिल रही थी लेकिन रोग अंदर ही अंदर बढ़ रहा था। धीरे-धीरे स्थिति गंभीर होती गई और उसे पोर्टल हाइपरटेंशन नाम की समस्या हो गई, जिसमें लिवर के अंदर की रक्त वाहिकाओं का ब्लड प्रेशर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। इस स्थिति के कारण फूड पाइप (Esophagus) की रक्त वाहिकाएं बेहद कमजोर पड़ जाती हैं और उनमें सूजन आ जाती है।
आयशाबेन की स्थिति अंदर ही अंदर गंभीर होती जा रही थी और एक समय में आकर बढ़ती सूजन और प्रेशर के कारण उसकी रक्त वाहिकाएं फट गई। आयशाबेन ने खून की उल्टी करना शुरू कर दी और उसके शरीर के अंदर भी ब्लीडिंग (Internal Bleeding) होने लगी। स्थिति जब मेडिकल इमरजेंसी बन गई तो उसे नवी मुंबई के अपोलो हॉस्पिटल लेकर आया गया।
आयशाबेन के अस्पताल में लाते हुए डॉक्टरों ने इमरजेंसी मेडिकल प्रोसीजर शुरु कर दी, ताकि जल्द से जल्द इंटरनल ब्लीडिंग को रोका जाए। डॉक्टरों की मेहनत और समय पर देखरेख से इलाज सफल हुआ और इंटरनल ब्लीडिंग को रोक दिया गया।
ब्लीडिंग को रोकने के बाद डाक्टरों ने पाया कि आयशाबेन का लिवर फेल होने लगा है और अब दवाओं की मदद से स्थिति को कंट्रोल नहीं किया जा सकता है और बच्ची को बचाने का सिर्फ एक तरीका लिवर ट्रांसप्लांट ही था। मेडिकल इवेल्यूएशन के बाद पता चला की सबसे सूटेबल डोनर बच्ची की मां ही है। लिविंग डोनर ट्रांसप्लांट सर्जरी की मदद से आयशाबेन का रोग ग्रस्त लिवर निकाल दिया गया और उसकी मां के लिवर का एक टुकड़ा आयशाबेन के शरीर में ट्रांसप्लांट किया गया।
ट्रांसप्लांट सफल हुआ और ट्रांसप्लांट किया गया लिवर ऑपरेशन के बहुत ही कम समय बाद ठीक से काम करने लगा। ट्रांसप्लांट के बाद आयशाबेन भी का शरीर भी सही से रिकवर होने लगा और उसके लिवर फंक्शन में काफी सुधार आ चुका था। आयशाबेन को भूख नॉर्मल भूख लगने लगी, उसका वजन भी धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
आयशाबेन का केस बेहद मुश्किल था, क्योंकि उसे एक नहीं बल्कि दो गंभीर दुर्लभ बीमारियां थी और स्थिति पहले से ही बहुत गंभीर हो चुकी थी। बहुत बार ब्लीडिंग हो चुकी थी इसलिए सामान्य ट्रीटमेंट से मरीज को बचाना मुश्किल हो सकता था। स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की टीम की मेहनत, समय पर मेडिकल इंटरवेंशन, आयशाबेन की हिम्मत और उनकी मां के डोनेशन की मदद से यह ट्रीटमेंट सफल हो पाया।
Dr Sandeep Kudale - Consultant Paediatric Hepatology & Liver Transplant, Apollo Hospitals Navi Mumbai
डिसक्लेमर: इस लेख डॉक्टर व अस्पताल से मिली जानकारी के आधार पर लिखा गया है। इस लेख में इस्तेमाल की गई सभी तस्वीरें और जानकारियां नोएडा इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल (NIIMS) से ली गई हैं और उनकी सहमति के अनुसार ही साझा किया गया है। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।