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Written By: Yogita Yadav | Published : October 1, 2019 8:24 PM IST
छोटे बच्चों के आहार की शुरूआत अकसर गेहूं से बने व्यंजनों से की जाती है, पर डेनमार्क में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि बचपन में ग्लूटेन का अतिरिक्त सेवन शिशुओं में टाइप 1 डायबिटीज का जोखिम बढ़ा देता है। © Shutterstock
डेनमार्क में हाल ही में किए गए एक अध्ययन में यह सामने आया है कि जो महिलाएं गर्भावस्था में उच्च ग्लूटेन डाइट का सेवन करती हैं, उनके शिशुओं में टाइप 1 डायबिटीज होने का जोखिम और ज्यादा बढ़ जाता है। आहार मे ग्लूटेन की मात्रा ज्यादा होने पर स्वास्थ्य पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है। पर अभी तक शिशुओं द्वारा ग्लूटेन के उच्च उपभोग पर अध्ययन नहीं हो पाया था। अब इस नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने गर्भावस्था से लेकर 18 महीने की आयु तक शिशुओं पर ग्लूटेन के प्रभावों का आकलन किया। इसमें सामने आया कि इस आयु तक 10 ग्राम अतिरिक्त ग्लूटेन के सेवन से शिशुओं में टाइप 1 डायबिटीज का खतरा 46 फीसदी तक बढ़ जाता है।
शोध में 86,306 मामलों को शामिल किया गया। शोध टीम में डॉ निकोलई लुंड-ब्लिक्स और ओस्लो विश्वविद्यालय अस्पताल के सहकर्मी और नॉर्वे के ओस्लो में नार्वे इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ता शामिल थे। यह शोध 16-20 सितंबर को स्पेन के बार्सिलोना में यूरोपीय एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज (ईएएसडी) की वार्षिक बैठक में प्रस्तुत किया गया था।
इसमें पाया गया कि गर्भावस्था के 22वें सप्ताह से लेकर शिशु के जन्म के 18 महीने बाद तक मां और शिशु के ग्लूटेन सेवन का सबसे ज्यादा असर शिशु की सेहत पर पड़ता है। यह प्रति दस ग्राम अतिरिक्त ग्लूटेन होने पर भी स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा देता है। इससे शिशुओं में टाइप 1 डायबिटीज का जोखिम 46 फीसदी तक बढ़ जाता है।
ग्लूटेन कोई अनजानी चीज नहीं है। बल्कि यह गेहूं, जौ आदि में मौजूद लसलसा पदार्थ है, जो उसका आकार बनाए रखने में मदद करता है। यह प्रोटीन का ही एक प्रकार है। पर कई बार इसकी अधिकता सेहत के लिए खतरनाक हो जाती है। गेहूं से बनने वाले हर आहार जैसे ब्रेड, दलिया, पास्ता आदि में ग्लूटेन होता ही है।
अमूमन छोटे बच्चों को इसी आहार के साथ अन्न की शुरूआत की जाती है। पर आहार विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि गर्भावस्था में मां को और छह माह के बाद शिशु के आहार में उतना ही ग्लूटेन दें, जितनी कि शरीर को जरूरत है। कुछ लोगों को ग्लूटेन से एलर्जी भी हो जाती है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से परामर्श करें। इससे बचने के लिए जरूरी है कि गर्भावस्था में मां अपने आहार और शिशु के जन्म के बाद उसके आहार में विशेष ध्यान रखें।