
किशोरी मिश्रा
किशोरी मिश्रा को डिजिटल मीडिया का लगभग 8+ वर्षों का व्यापक अनुभव है, जिसमें स्वास्थ्य (Health) और जीवनशैली ... Read More
Medically Verified By: Dr.Bhushan Thombare
Cold and Cough in monsoon
हर साल जैसे ही मानसून की बारिश शुरू होती है, फिजिशियन और चेस्ट फिजिशियन की ओपीडी में एक ही बात सुनने को मिलती है: "डॉक्टर साहब, मुझे कुछ समय से खांसी और जुकाम है जो दवा लेने के बाद भी सही नहीं हो रहा है, क्या करूं?" ज्यादातर मामलों में यह कुछ खास नहीं होता, एक सामान्य वायरल खांसी होती है जो एक या दो हफ्ते में ठीक हो जाती है। बहुत कम ऐसा होता है जब मरीज सिर्फ खांसी की शिकायत लेकर सीधे ओपीडी पहुंचते हैं। ऐसा सिर्फ तब होता है जब खांसी लंबी हो और दवा लेने के बाद भी सही न हो रही हो। मुंबई के एशियन हार्ट इंस्टीट्यूट में सीनियर कंसल्टेंट थोरैसिक सर्जन डॉ. भूषण ठोंबरे कहते हैं कि उनके पास मरीज तब रिफर किए जाते हैं जब खांसी के साथ छाती में कोई और गंभीर समस्या पैदा हो गई हो। इस आर्टिकल में हम जिन सवालों के जवाब दे रहे हैं उसके लिए हमने बात की है डॉ. भूषण ठोंबरे से। आइए मानसून में खांसी संबंधी सभी जरूरी सवालों के जवाब जानते हैं।
मुंबई जैसे शहर में नमी वाली हवा, तापमान में अचानक बदलाव और लोकल ट्रेनों या बसों की भीड़भाड़ जुलाई और अगस्त को सांस के संक्रमण का मुख्य सीजन बना देती है। वायरल खांसी और जुकाम के मामले तेजी से बढ़ते हैं। ज्यादातर लोगों में यह आराम करने, गर्म पानी/सूप लेने और थोड़े समय की दवाइयों से एक से दो सप्ताह में ठीक हो जाता है।

एलर्जी वाली खांसी का एक साफ पैटर्न होता है, जिसमें छींकें आना, बहती नाक, आंखों से पानी आना और सूखी खांसी जो सीलन भरे या धूल भरे कमरों में बढ़ जाती है। इसमें न तो बुखार होता है और न ही वजन घटता है। यह एलर्जी की दवाइयों से और धूल/सीलन से दूर रहने से ठीक हो जाती है, इसके लिए एंटीबायोटिक्स की जरूरत नहीं होती। अगर आपकी स्थिति इस पैटर्न से मेल नहीं खाती, या ट्रिगर से बचने और दवाएं लेने के बाद भी खांसी ठीक नहीं होती, तो आगे जांच कराना सही रहता है।
एक वायरल खांसी को दो से तीन सप्ताह के भीतर ठीक हो जाना चाहिए। भारत का मेडिकल सिस्टम कहता है कि कोई भी व्यक्ति जिसकी खांसी दो सप्ताह या उससे अधिक समय से बनी हुई है, उसे संभावित टीबी का मामला माना जाए और उसकी जांच की जाए, चाहे खांसी कितनी भी हल्की क्यों न लगे।
इनमें से कोई भी एक लक्षण यह साबित नहीं करता कि स्थिति गंभीर ही है। लेकिन खांसी लंबे समय तक बनी रहने के साथ इनमें से कोई लक्षण दिखे, तो खांसी का सिरप पीते रहने के बजाय आगे जांच कराने की जरूरत होती है।
दुनिया भर में टीबी का सबसे बड़ा बोझ आज भी भारत पर ही है। WHO की ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, पिछले दशक में मामलों में 21 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद, 2024 में दुनिया भर में दर्ज कुल टीबी मामलों का लगभग एक-चौथाई हिस्सा भारत से था। समय पर पता चलने और पूरा इलाज होने पर यह बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है। गड़बड़ तब होती है जब बार-बार अधूरी एंटीबायोटिक ली जाती हैं, जो बीमारी को पूरी तरह खत्म किए बिना सिर्फ उसके लक्षणों को कुछ समय के लिए दबा देती हैं। डायबिटीज के मरीजों और कैंसर का इलाज करा रहे लोगों की बढ़ती संख्या के साथ, टीबी एक लगातार बना रहने वाला खतरा है। हालांकि, यह पूरी तरह इलाज योग्य है।

कम्युनिटी एक्वायर्ड निमोनिया (सामान्य वातावरण में होने वाला निमोनिया) आज भी आम है। अगर इसका सही इलाज न किया जाए तो यह फेफड़ों में पानी या मवाद जमने का रूप ले सकता है। हालांकि ऐसा अक्सर डायबिटीज के मरीजों, कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों या रूमेटाइड अर्थराइटिस/स्पोंडिलाइटिस जैसी बीमारियों के लिए इम्युनिटी कम करने वाली दवाएं लेने वालों में देखा जाता है।
यह कम आम है, लेकिन धूम्रपान करने वालों और 40 वर्ष से अधिक उम्र के किसी भी व्यक्ति को इसे ध्यान में रखना चाहिए। फेफड़ों का कैंसर केवल खांसी के रूप में सामने आए, इसके लिए ट्यूमर का सांस की नली के पास होना या इतना बड़ा होना जरूरी है कि वह दबाव बना सके। खांसी जिसके स्वभाव में बदलाव आया हो, या जिसके साथ वजन कम हो रहा हो या बलगम में खून आ रहा हो, उसमें केवल तसल्ली देने के बजाय छाती का इमेजिंग कराया जाना चाहिए।
जो लोग पहले से कैंसर से लड़ रहे हैं, उनमें नई खांसी आना चल रही कैंसर थेरेपी के कारण कम हुई इम्युनिटी की वजह से निमोनिया का संकेत हो सकता है। यह छाती में पानी जमने, लिम्फ नोड या सांस की नली के पास ट्यूमर बढ़ने का भी संकेत हो सकता है। यह कैंसर के छाती की अंदरूनी परत तक फैलने (मैलिग्नेंट प्लुरल एफ्यूजन) का संकेत हो सकता है। इसमें छाती में तेज दर्द हो सकता है, लेकिन ज्यादातर समय यह शांत रहता है और फेफड़ों में एक लीटर से अधिक पानी जमने के बाद ही खांसी और सांस फूलने के रूप में सामने आता है।
एक वायरल खांसी एक से दो सप्ताह में हल्की पड़ जाती है। निमोनिया जो कि खुद फेफड़ों के ऊतकों का एक इंफेक्शन है अधिक तीव्रता से सामने आता है। जैसे तेज बुखार, सांस फूलना और छाती में दर्द जो सांस लेने पर बढ़ता है। सही एंटीबायोटिक्स और आराम से इसका इलाज संभव है। समस्या तब आती है जब इसका इलाज अधूरा छोड़ दिया जाता है, लक्षण कम हो जाते हैं, बुखार उतर जाता है और हर कोई यह मान लेता है कि यह ठीक हो गया है बिना डॉक्टर से यह पुष्टि कराए कि फेफड़े वास्तव में पूरी तरह ठीक हुए हैं या नहीं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, टारगेट और डेडलाइन के चक्कर में लोग बुखार उतरते ही सीधे काम पर लौट आते हैं।

फेफड़ों और छाती की दीवार के बीच तरल पदार्थ जमा होना शुरू हो सकता है जिसे Pleural Effusion कहा जाता है। आप इसे खांसी की तुलना में अधिक सांस फूलने या छाती के एक तरफ मीठे दर्द के रूप में महसूस करेंगे। निमोनिया के साथ थोड़ा-बहुत पानी जमना आम बात है और यह आमतौर पर अपने आप ठीक हो जाता है। लेकिन जो पानी लगातार बढ़ रहा हो या एंटीबायोटिक्स के बावजूद कम न हो रहा हो, उसे अल्ट्रासाउंड-गाइडेड सुई से निकालकर जांचने की आवश्यकता होती है कि कहीं वह पानी खुद इंफेक्टेड तो नहीं हो गया है।
एम्पीमा फेफड़ों और छाती की दीवार के बीच मवाद जमने की स्थिति है, जो निमोनिया या संक्रमण के ठीक से इलाज न होने पर बनती है और इसे निकालने के लिए अक्सर सर्जन की जरूरत पड़ती है। अगर वह जमा हुआ पानी इंफेक्टेड हो जाता है, तो यह अब साधारण पानी नहीं रहता; यह जटिल होकर Empyema Thoracis बन जाता है यानी छाती की गुहा के भीतर मवाद का जमना। यही वह स्थिति है जहां एक थोरेसिक सर्जन की आवश्यकता पड़ती है। शुरुआती दौर में इसका इलाज चेस्ट ट्यूब और एंटीबायोटिक्स से किया जा सकता है। लेकिन देर होने पर, जब पानी गाढ़ा हो जाता है या एक रेशेदार परत फेफड़े को जकड़ लेती है, तो केवल ड्रेन करने से पानी दोबारा बनना बंद नहीं होता और फेफड़ा भी नहीं फैलता। तब मरीज को सर्जरी की जरूरत पड़ती है।

आजकल यह सर्जरी की-होल तरीके से की जाती है, जिसे वीडियो असिस्टेड थोराकोस्कोपिक सर्जरी कहा जाता है। इसमें पेट की लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की तरह ही एक छोटे कैमरे और विशेष उपकरणों के जरिए बिना बड़ा चीरा लगाए सर्जरी की जाती है। लेकिन इस स्थिति तक पहुंचना ही क्यों? मेरे द्वारा ऑपरेट किए गए एम्पीमा के लगभग हर एडवांस केस की शुरुआत हफ्तों पहले एक मामूली खांसी या निमोनिया के दौरे से हुई थी। बीमारी कोई स्टेज छोड़ती नहीं है, बस रास्ते में कोई एक कदम छूट जाता है किसी ने यह देखने की जहमत नहीं उठाई कि बीमारी पूरी तरह ठीक हुई है या नहीं, या फिर इसे "बस कमजोरी है, ठीक हो जाएगी" कहकर छोड़ दिया गया।
पानी और परजीवी से होने वाली अन्य बीमारियों के अलावा, छाती की बीमारियां भी इस मौसम में आम हैं। लगातार एक हफ्ते भारी बारिश होती है और आसपास हर कोई खांसता हुआ दिखता है, जिसे हम नॉर्मल मान लेते हैं। यही नॉर्मलाइजेशन टीबी, शुरुआती कैंसर या पनप रहे एम्पीमा को बहुत लंबे समय तक छिपाए रखता है।
अगर खांसी बारिश का मौसम खत्म होने के बाद भी बनी रहती है, या दो सप्ताह से अधिक हो जाती है, तो इसकी जांच कराएं।
खांसी एक ऐसा लक्षण है जो शरीर द्वारा दिए जाने वाले सबसे आम संकेतों में से एक है और सबसे ज्यादा नजरअंदाज भी किया जाता है। ज्यादातर समय यह बेहानी होती है। लेकिन कभी-कभी यह टीबी, शुरुआती कैंसर या एम्पीमा की तरफ बढ़ रहा इंफेक्शन हो सकती है। अगर शुरुआत में इलाज किया जाए तो रिकवरी का रास्ता सीधा है, लेकिन गंभीर होने के बाद इसे संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है।
Disclaimer : इस लेख में दी गई जानकारी किसी चिकित्सकीय सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। यदि आपको खांसी दो सप्ताह से अधिक समय तक बनी रहे, तेज बुखार, सांस लेने में तकलीफ, खून वाली खांसी, सीने में तेज दर्द या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो बिना देरी किए योग्य डॉक्टर या पल्मोनोलॉजिस्ट से संपर्क करें।