अधेड़ उम्र में तनावपूर्ण जीवन जीने वाली महिलाओं में बढ़ जाता है मस्तिष्‍क विकार का जोखिम

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ जेरिएट्रिक साइकियाट्री में प्रकाशित निष्कर्षों से पता चला है कि महिलाओं के लिए, पिछले वर्ष की तुलना में मध्य जीवन में अधिक तनावपूर्ण जीवन के अनुभव होने के कारण स्मृति परीक्षण में अधिक गिरावट आई थी।

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Written By: Yogita Yadav | Updated : August 7, 2019 12:11 PM IST

अमेरिका में हुए एक नए शोध में यह बात सामने आई है कि जो महिलाएं मध्‍यम आयु अर्थात अधेड़ उम्र में तनावपूर्ण (Middle age stress) जीवन जीती हैं, उनमें आगे चलकर मनोभ्रंश अर्थात डिमेंशिया के जोखिम बढ़ जाते हैं। मध्‍यम आयु की तनावपूर्ण (Middle age stress) स्थितियां उनकी याददाश्त को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं। जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन विभाग के शोधकर्ताओं ने यह शोध किया है। जिसमें 47 वर्ष की औसत आयु वाले 337 पुरुषों और 572 महिलाओं को शामिल किया गया। 1982 और 2004 के बीच इनकी कई बार जांच की गई और लगातार साक्षात्‍कार भी हुए।

कटु अनुभवों का असर (Middle age stress) 

अंतिम चेकअप में  प्रतिभागियों से पूछा गया था कि क्या उन्हें पिछले वर्ष में एक दर्दनाक घटना (Middle age stress)  का सामना करना पड़ा था। जैसे किसी के साथ संघर्ष, बलात्कार, एक आलिंगन,  किसी अन्य प्रकार का शारीरिक हमला, किसी और पर हमला करना या मारना, धमकी या किसी व्‍यक्ति की वजह से असहनीय परिस्थितियों से गुजरना, जीवन के अन्‍य तनावपूर्ण अनुभव जैसे शादी, तलाक, किसी प्रियजन की मृत्यु, नौकरी छूटना, गंभीर चोट या बीमारी, बाहर घूमने वाला बच्चा, सेवानिवृत्ति या बच्चे का जनम आदि। प्रतिभागियों को तीसरी और चौथी यात्राओं में कुछ सीखने और याद करने को कहा गया। शोधकर्ताओं ने इसमें गिरावट को दर्ज किया।

मध्‍यम आयु का तनाव करता है ज्‍यादा प्रभावित (Middle age stress) 

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ जेरिएट्रिक साइकियाट्री में प्रकाशित निष्कर्षों से पता चला है कि महिलाओं के लिए, पिछले वर्ष की तुलना में मध्य जीवन में अधिक तनावपूर्ण जीवन के अनुभव होने के कारण स्मृति परीक्षण में अधिक गिरावट आई थी। महिलाओं को जितना अधिक तनावपूर्ण जीवन का अनुभव होता है, उन्हें परीक्षण के साथ उतनी ही कठिनाई होती है।

शादी और तलाक भी डालते हैं असर (Middle age stress) 

हालांकि, शोधकर्ताओं ने सभी महिलाओं में एक ही तरह के रिएक्‍शन नहीं देखे। दर्दनाक घटनाओं के अनुभव, लंबे समय तक तनाव  या पुराने तनावपूर्ण अनुभव जैसे कि तलाक के दौरान के अनुभव आदि मस्तिष्क के कामकाज पर नकारात्मक प्रभाव अधिक डालते हैं।

लगातार तनाव का बने रहना है घातक

अध्‍ययन की प्रमुख लेखक सिंथिआ मुनरो कहती हैं, "एक सामान्य तनाव प्रतिक्रिया कॉर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन में अस्थायी वृद्धि का कारण बनती है, और जब यह खत्म हो जाती है, तो स्तर वापस आ जाते हैं और आप ठीक हो जाते हैं। लेकिन बार-बार तनाव के साथ, या तनाव के प्रति बढ़ी संवेदनशीलता के साथ, आपका शरीर एक बढ़ी हुई और निरंतर हार्मोन प्रतिक्रिया देता है। जिसके परिणामस्‍वरूप कुछ भी सीखने, समझने में अधिक समय लगता है। ”

पुरुषों पर नहीं होता ज्‍यादा असर

शोध के निष्‍कर्ष में टीम ने पाया कि तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर पुरुषों और महिलाओ में अलग-अलग तरह से असर करते हैं। इसका महिलाओं पर ज्‍यादा नकारात्‍मक प्रभाव देखने में आया। अल्जाइमर रोग की दर भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक है। सिंथिआ मुनरो कहती  हैं, "हम तनाव देने वाले कारकों से छुटकारा नहीं पा सकते हैं, लेकिन हम तनाव पर प्रतिक्रिया करने के तरीके को समायोजित कर सकते हैं और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर वास्तविक प्रभाव डाल सकते हैं।" हालांकि हमारे अध्ययन में पुरुषों के लिए अभी तक ऐसे परिणाम नजर नहीं आए। फि‍र भी यह कहा जा सकता है कि उनके मस्तिष्‍क पर भी तनाव नकारात्‍मक असर डालता ही है।

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