मेडिकल टूरिज्म अब कहानी सिर्फ ऑपरेशन की नहीं, रिकवरी की है; एक्सपर्ट बता रहे हैं इसके बारे में

Press Information Bureau (PIB) के अनुसार, दुनिया का मेडिकल वैल्यू ट्रैवल (Medical Value Travel) बाजार साल 2022 में लगभग 115.6 अरब अमेरिकी डॉलर का था। समय के साथ भारत में मेडिकल टूरिज्म का दौर तेजी से बढ़ रहा है।

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Written By: Ashu Kumar Das | Updated : August 6, 2026 7:13 PM IST

पहले मेडिकल टूरिज्म का मतलब एक ही था। फ्लाइट पकड़ो, दूसरे देश जाओ, ऑपरेशन कराओ और वापस आ जाओ। लेकिन अब स्क्रिप्ट बदल गई है। आज मरीज पूछता है - ऑपरेशन के बाद मैं कब अपने पैरों पर खड़ा हो पाऊंगा? कब ऑफिस जा पाऊंगा? कब बिना सहारे के अपने बच्चे को गोद में उठा पाऊंगा? यानी सफलता का पैमाना अब सिर्फ सफल सर्जरी नहीं रह गया है। अब असली सफलता है - इलाज के बाद सामान्य जिंदगी में लौटना। और इसी वजह से मेडिकल टूरिज्म का भविष्य अब Restorative Healthcare यानी बेहतर रिकवरी की ओर जा रहा है।

मेडिकल टूरिज्म का बाजार तेजी से बढ़ रहा है

Press Information Bureau (PIB) के अनुसार, दुनिया का मेडिकल वैल्यू ट्रैवल (Medical Value Travel) बाजार साल 2022 में लगभग 115.6 अरब अमेरिकी डॉलर का था। अनुमान है कि यह 2030 तक 286.1 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगा। यानी यह बाजार करीब 11 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ोतरी सिर्फ ऑपरेशन की वजह से नहीं, बल्कि इलाज के बाद मिलने वाली बेहतर रिकवरी सेवाओं की बढ़ती मांग के कारण भी हो रही है।

अब मरीज सिर्फ इलाज नहीं रिजल्ट देखते हैं

मोटरिका इंडिया के सीईओ रुस्लान बबिन्त्सेव (Ruslan Babintsev) कहते हैं-  कुछ साल पहले तक विदेश जाने वाला मरीज किसी अच्छे अस्पताल या सर्जन की तलाश करता था। लेकिन अब मरीज यह देखता है कि इलाज के बाद वह कितनी जल्दी अपने पैरों पर खड़ा हो पाएगा, नौकरी कर पाएगा या बिना किसी सहारे के सामान्य जीवन जी पाएगा। अगर ऑपरेशन सफल हो जाए लेकिन मरीज पहले की तरह चल-फिर न सके या काम पर वापस न जा सके, तो इलाज अधूरा माना जाता है। इसलिए अब अस्पतालों के लिए सिर्फ सफल सर्जरी नहीं, बल्कि मरीज को पूरी तरह सामान्य जीवन में लौटाना सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

दुनिया में करोड़ों लोगों को पुनर्वास की जरूरत

World Health Organization (WHO) के अनुसार, दुनिया में 2.41 अरब लोग ऐसे हैं जिन्हें किसी न किसी प्रकार के पुनर्वास (Rehabilitation) की जरूरत है। यह संख्या 1990 के मुकाबले 63 प्रतिशत बढ़ चुकी है। वहीं WHO-UNICEF Global Report on Assistive Technology बताती है कि 2.5 अरब से अधिक लोगों को कृत्रिम अंग (Prostheses), व्हीलचेयर, न्यूरोइम्प्लांट्स (Neuroimplants) जैसे सहायक उपकरणों की जरूरत है। लेकिन इनमें से करीब 1 अरब लोगों को ये सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं।

बायोनिक हाथ लगाना आसान है, उसे चलाना मुश्किल

एक्सपर्ट बताते हैं कि आज 3D प्रिंटिंग और रोबोटिक्स ने कमाल कर दिया है। बायोनिक हाथ-पैर पहले से ज्यादा स्मार्ट और हल्के हैं। किसी व्यक्ति के शरीर में बायोनिक हाथ लगाना बहुत ही आसान काम है, लेकिन मरीज के लिए उसे जिंदगीभर चलाना बहुत ही मुश्किल काम है। एक्सपर्ट कहते हैं कि हम अंग बना देते हैं। लेकिन जिंदगी मरीज को खुद जीनी पड़ती है। असली मेहनत तो बायोनिक हाथ को लगाने के बाद शुरू होती है। नए हाथ से चम्मच पकड़ना सीखना, नए पैर से सीढ़ी चढ़ना, मशीन और दिमाग के बीच तालमेल बैठाना। इसके लिए फिजियोथेरेपिस्ट, प्रोस्थेटिस्ट, साइकोलॉजिस्ट की पूरी टीम महीनों तक मरीज के साथ चलती है। सिर्फ डिवाइस देने से जिंदगी नहीं बदलती। सही ट्रेनिंग और लगातार पुनर्वास ही इंसान को दोबारा खड़ा करता है।

रूस इसका एक अच्छा उदाहरण है। यहां की मोटोरिका (Motorica) दुनिया की सबसे बड़ी कृत्रिम अंगकंपनियों में गिनी जाती है। मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग में इसके ऐसे सेंटर हैं, जहां मानकर चला जाता है कि किसी एक डॉक्टर या विशेषज्ञ के दम पर मरीज पूरी तरह ठीक नहीं हो सकता। इसलिए हर मरीज के लिए ऑर्थोपेडिक डॉक्टर, फिजियोथेरेपिस्ट, प्रोस्थेटिस्ट और मनोवैज्ञानिक मिलकर एक टीम की तरह काम करते हैं। पिछले 11 सालों में इस कंपनी ने 15 से ज्यादा देशों के लोगों को 11,000 से अधिक कृत्रिम हाथ लगाए हैं।