फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer)

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शरीर की कोशिकाएं पुरानी या क्षतिग्रस्त होन पर नष्ट होने लग जाती हैं। लेकिन कुछ मामलों में कोशिकाओं की संख्या असाधारण रूप से बढ़ने लगती हैं और इस कारण से ट्यूमर व अन्य जटिलताएं विकसित हो जाती हैं। कोशिकाओं की संख्या असाधारण रूप से बढ़ने की स्थिति को कैसर के नाम से जाना जाता है। जब फेफड़ों में कोशिका विभाजन असामान्य रूप से तेज हो जाता है और कोशिकाओं की संख्या बढ़ने लगती है, तो यह स्थिति लंग कैंसर के रूप में विकसित हो जाती है। फेफड़ों का कैंसर आमतौर पर लगातार खांसी और सांस फूलने जैसी समस्याओं को रूप में विकसित होता है। धूम्रपान करने वाले व अन्य विषाक्त पदार्थों व गैसों के संपर्क में आने वाले लोगों को फेफड़ों का कैंसर होने का खतरा सबसे अधिक रहता है। फेफड़ों के कैंसर का समय पर इलाज करना जरूरी होता है और ऐसा न करने पर कई जटिलताएं विकसित हो सकती हैं। लंग कैंसर के इलाज में दवाएं (कीमोथेरेपी), रेडिएशन थेरेपी और सर्जरी आदि शामिल हैं।

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लंग कैंसर के प्रकार

फेफड़ों में होने वाले कैंसर के प्रमुख रूप से दो प्रकार हैं, जिन्हें स्मॉल-सेल लंग कार्सिनोमा और नॉन स्माल-सेल लंग कार्सिनोमा के नाम से जाना जाता है। इनके बारे में निम्न जानकारियां दी हुई हैं -


  • स्मॉल-सेल लंग कार्सीनोमा (SCLC) - लंग कैंसर के इस प्रकार में माइक्रोस्कोप की मदद से कैंसरयुक्त कोशिकाएं गोल व छोटी-छोटी देखी जाती हैं। एससीएलसी तेजी से फैलता है और एनएससीएलसी की तुलना में इसके मामले कम पाए जाते हैं।

  • नॉन स्माल-सेल लंग कार्सीनोमा (NSCLC) - लंग कैंसर के इस प्रकार की कोशिकाएं अपेक्षाकृत बड़ी होती हैं। एनएससीलएलसी के मामले अधिक पाए जाते हैं और यह अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ता है।

फेफड़ों के कैंसर की स्टेज

फेफड़ों के कैंसर की गंभीरता के आधार पर उसके चरण निर्धारित किए जाते हैं, जिनमें बारे में निम्न बताया गया है -


  • स्टेज 1 - कैंसर अभी फेफड़ों से बाहर नहीं फैल पाया है

  • स्टेज 2 - कैंसर कोशिकाएं फेफड़ों व उसके आसपास की लसीका ग्रंथियों में फैल गया है।

  • स्टेज 3 - फेफड़ों के साथ-साथ कैंसर छाती के बीच में मौजूद लसीका ग्रंथि तक फैल गया है।

  • स्टेज 3ए - कैंसरयुक्त (मालिग्नै) कोशिकाएं सिर्फ लसीका ग्रंथियों में मौजूद हैं, जहां से कैंसर शुरू हुआ है।

  • स्टेज 3बी - कैंसर कोशिकाएं लसीका ग्रंथियों के उन हिस्सों में से बाहर भी मौजूद हैं, जहां से कैंसर शुरू हुआ है।

  • स्टेज 4 - इसमें कैंसर की कोशिकाएं दोनों फेफड़ों के साथ-साथ अन्य अंगों में भी पाई जाती हैं।

लंग कैंसर के लक्षण

फेफड़ों में होने वाले कैंसर का कोई भी प्रकार हो लेकिन इसके विकसित होने के शुरुआती लक्षण आमतौर पर एक जैसे ही रहते हैं। अधिकतर मामलों में फेफड़ों के कैंसर की अंतिम स्टेज में ही इससे लक्षण विकसित होना शुरू होते हैं। फेफड़ों के कैंसर के दौरान आमतौर पर निम्न लक्षण देखे जा सकते हैं -


  • लगातार खांसी रहना

  • खांसी के दौरान खून आना

  • सीने में दर्द

  • हंसने, खांसने या गहरी सांस लेने के दौरान सीने में दर्द होना

  • गला बैठ जाना

  • सांस फूलना

  • घरघराहट रहना

  • थकान व कमजोरी महसूस होना

  • भूख न लगना

  • शरीर का वजन कम होना

  • निमोनिया या ब्रोंकाइटिस होना

  • गर्दन या कॉलरबोन की लिम्फ नोड्स में सूजन आना

  • गर्दन व उनके पीछे ही हड्डियों व पसलियों में दर्द होना

  • टांग या बांह सुन्न पड़ना

  • चक्कर आना

  • शरीर का संतुलन न बना पाना

  • पलकें ढीली होकर लटक जाना

  • मांसपेशियों में थकान महसूस होना

  • मतली या उल्टी

  • शरीर में पानी जमा होना

  • हाई बीपी या हाई शुगर

  • दौरे पड़ना


यदि समय पर इसकी जांच न की जाए तो लंग कैंसर जानलेवा हो सकता है, इसलिए यदि आपको उपरोक्त में से कोई भी लक्षण महसूस हो रहा है, तो जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करें।

फेफड़ों के कैंसर के कारण

लंग कैंसर किसी भी व्यक्ति को हो सकता है। हालांकि कुछ कारक हैं, जो आपको फेफड़ों का कैंसर होने का खतरा बढ़ा देते हैं -


  • धूम्रपान करना - जो लोग धूम्रपान करते है या पहले किया करते थे उन्हें लंग कैंसर होने का खतरा काफी अधिक रहता है। साथ ही सेकेंड हैंड स्मॉल यानी धूम्रपान कर रहे किसी अन्य व्यक्ति के संपर्क में आना भी लंग कैंसर होने के खतरे को बढ़ा सकता है।

  • विषाक्त पदार्थों के संपर्क में आना - एस्बेस्टस, रेडॉन, यूरेनियम या आर्सेनिक जैसी हेवी मेटल के संपर्क में आना लंग कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है। सीमेंट फैक्टरी या अन्य किसी भवन निर्माण कार्यों से जुड़े लोगों को अक्सर यह कैंसर होने का खतरा अधिक रहता है।

  • अनुवांशिक कारक - कुछ अध्ययनों के अनुसार यदि परिवार में किसी एक व्यक्ति के फेफड़ों में कैंसर है, तो अन्य लोगों को भी यह रोग होने का खतरा बढ़ सकता है।

  • फेफड़ों संबंधित कोई अन्य बीमारी - यदि पहले फेफड़ों को कोई रोग हो चुका है, जिससे फेफड़ों में स्कार बनने लगे हैं तो भी लंग कैंसर होने का खतरा बढ़ सकता है।

  • वातावरणीय कारक - वातावरण प्रदूषित होने के कारण फेफड़ों का कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।

फेफड़ों के कैंसर का निदान

लंग कैंसर का निदान करने के लिए डॉक्टर सबसे पहले मरीज के लक्षणों की जांच करते हैं और अन्य शारीरिक परीक्षण भी करते हैं। यदि इस दौरान डॉक्टर को लगता है कि आप लंग कैंसर से ग्रसित हो सकते हैं, वे इसकी पुष्टि करने के लिए निम्न टेस्ट कर सकते हैं -


  • लैब टेस्ट - इस दौरान कई ब्लड टेस्ट किए जा सकते हैं, जो यह पता लगाने में मदद करते हैं कि आप किस प्रकार के लंग कैंसर से ग्रसित हैं।

  • इमेजिंग टेस्ट - इस दौरान सीटी स्कैन और पेट स्कैन (PET Scan) समेत कई टेस्ट किए जाते हैं, जो फेफड़ों के कैंसर का पता लगाने में मदद करते हैं।

  • ऊतकों का सैंपल लेना - इसमें फेफड़ों के प्रभावित हिस्से से ऊतक का सैंपल लिया जाता है, जिसकी जांच करके कैंसर का पता लगाया जा सकता है।

फेफड़ों के कैंसर का इलाज

लंग कैंसर का इलाज उसके प्रकार, स्टेज और वह फेफड़ों में किस जगह विकसित हुआ है आदि पर निर्भर करता है। लंग कैंसर के इलाज में निम्न उपचार विकल्प शामिल हैं -


  • सर्जरी - सर्जरी की मदद से फेफड़ों से कैंसरग्रस्त ऊतकों को निकाला जाता है और साथ ही आसपास के ऊतकों को भी निकाल दिया जाता है ताकि इलाज के बाद फिर से इसके फैलने का खतरा कम हो जाए। कुछ गंभीर स्थितियों में फेफड़े का एक बड़ा हिस्सा भी निकाला जा सकता है।

  • कीमोथेरेपी - इस थेरेपी में मरीज को खास प्रकार की दवाएं दी जाती हैं, जो कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने का काम करती हैं। ये दवाएं लंग कैंसर के गंभीर चरणों में भी काम कर सकती हैं। हालांकि, इन दवाओं से कुछ साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं।

  • रेडिएशन थेरेपी - इसकी मदद से उच्च ऊर्जा वाली विकिरणों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी मदद से कैंसर के ट्यूमर का छोटा बना दिया जाता है। यदि कैंसर का ट्यूमर किसी एक ही जगह पर बना हुआ है, तो रेडिएशन थेरेपी काफी अच्छा उपचार विकल्प हो सकता है।

  • टारगेटेड थेरेपी - इस थेरेपी की मदद से कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने में मदद मिल सकती है। उदाहरण के लिए कैंसर की कोशिकाओं की संख्या को बढ़ने से रोकने में भी टारगेटेड थेरेपी की इस्तेमाल किया जा सकता है।

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