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Written By: Jitendra Gupta | Published : August 17, 2022 5:39 PM IST
लॉन्ग कोविड के शिकार लोगों के खून में हो रही गड़बड़ियां! वैज्ञानिकों ने बताया कौन से रोगी सबसे ज्यादा परेशान
लॉन्ग कोविड के बारे में आपने तमाम बातें सुनी होंगी जैसे कि इंफेक्शन से ठीक होने के बाद भी आप कुछ लक्षणों से परेशान रहते हैं। हाल ही में हुई एक स्टडी में ये सामने आया है कि लॉन्ग कोविड से पीड़ित लोगों के खून में कुछ तरह की असामान्यताएं पाई गई हैं। अध्ययन के ये निष्कर्ष पहले से मौजूद सबूतों की लिस्ट में इस दिक्कत को शामिल करते हैं, जिससे इस स्थिति के कारकों और संभावित इलाज की जरूरत पर जोर देते हैं।
अध्ययन के इन निष्कर्षों से ये भी सामने आया है कि बहुत से वैज्ञानिक और मरीजों को ये संदेह है कि लॉन्ग कोविड, लंबे अरसे तक थकान और इंफेक्शन के बाद अन्य स्थितियों की वजह बन सकता है। पिछले सप्ताह प्रकाशित होने से पहले इस नए अध्ययन में लॉन्ग कोविड से जूझ रहे 99 लोगों का डेटा शामिल है।
स्क्रिप्स रिसर्च ट्रांस्लेशनल इंस्टीट्यूट के निदेशक इरिक टोपोल का कहना है कि ये अध्ययन भले ही सीमित था लेकिन इसमें गहराई से अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन में टी कोशिकाओं का बारीकी से अध्ययन किया गया था। टी कोशिकाएं एंटीबॉडी रिस्पॉन्स का काम करती हैं। उन्होंने कहा कि ये खोज का विषय है लेकिन ये दूसरे बड़े अध्ययनों के लिए नींव का काम करेगा।
लॉन्ग कोविड के मरीज ढेर सारी परेशानियों का शिकार होते हैं, जिसमें शामिल हैंः
1-तेज थकान
2-ब्रेन फॉग
3-कोर्टिसोल का लो लेवल
इसके अलावा मरीजों में दूसरे लक्षण भी दिखाई देते हैं। बता दें कि कोर्टिसोल एक स्ट्रेस हार्मोन है, जो शरीर में इंफ्लेमेशन, ग्लूकोज, नींद चक्र और दूसरी चीजों क कंट्रोल करने का काम करता है। टी कोशिकाओं की विशेषता होती है कि वो हमारे इम्यून सिस्टम को अज्ञात हमलावरों जैसे कोरोनावायरस और दूसरे गैर सक्रिय रोगाणुओं से लड़ने के लिए इशारा करती है।
लॉन्ग कोविड के मरीजों पर अध्ययन कर रहे दूसरे समूहों ने भी इस साल इसी तरह के नतीजों की बात कही थी। वैज्ञानिकों ने जनवरी सेल पेपर में कहा था कि वे लोग जो लंबे अरसे से श्वसन लक्षणों के साथ-साथ लो कोर्टिसोल लेवल से परेशान रहते हैं उन मरीजों में वायरस के दोबारा से सक्रिय होने के साथ-साथ न्यूरोलॉजिक्ल समस्याएं भी रहती हैं।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और फ्रेंसिस क्रिक इंस्टीट्यूट की प्रोफेसर का कहना है कि इस डेटा से प्राप्त निष्कर्ष हमें ये सोचने पर मजबूर करते हैं कि और कौन सी दूसरी दवाओं पर किया जा सकता है जैसे वायरस को निशाना बनाने वाली एंटीबॉडी और एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं, जो इम्यून सिस्टम को ठीक कर सकती हैं।