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आंकड़ों के अनुसार, कैंसर से होने वाली मौत के मामलों में लिवर कैंसर चौथे स्थान पर है। पिछले 40 सालों में लिवर कैंसर के मामलों में तीन गुना बढ़ोत्तरी हुई है। सामान्य तौर पर, लक्षणों के आधार पर इस बीमारी का पता लगाना काफी कठिन होता है। दरअसल जो लोग पहले से ही लिवर की गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं, या जिन्हें सिरोसिस है (आमतौर पर हेपेटाइटिस-बी या सी वायरस के संक्रमण से होने वाला रोग), या फिर जो लोग शराब के सेवन से लिवर की बीमारी अथवा फैटी लिवर की समस्या से ग्रस्त हैं, उन्हें शुरुआती लिवर कैंसर होने की संभावना रहती है। जब कैंसर आंत, फेफड़े, स्तन तथा शरीर के दूसरे अंगों में फैल जाता है, तब लिवर कैंसर का दूसरा चरण विकसित हो सकता है।
लिवर कैंसर से प्रभावित हिस्से को सर्जरी के माध्यम से हटाना- इस बीमारी के इलाज का सबसे अच्छा तरीका माना जाता है। बदकिस्मती से, ट्यूमर का आकार बहुत अधिक बढ़ जाने, लिवर के बहुत ज्यादा फैल जाने, या लिवर की बीमारी के सीमा से अधिक विस्तार के कारण ज्यादातर मरीजों की सर्जरी कर पाना संभव नहीं होता है। लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा काफी कम मरीजों को उपलब्ध हो पाती है, क्योंकि ट्रांसप्लांट के लिए जरूरी अंग की आपूर्ति सीमित मात्रा में होती है। इसकी वजह से मरीजों को लंबे वक्त तक इंतजार करना पड़ता है और उनका ट्यूमर बढ़ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप लिवर ट्रांसप्लांट की दर कम हो जाती है।
हाल के दिनों में कीमोथेरेपी, या जीवित कोशिकाओं को विकसित करने वाले एंटीबॉडी के उपयोग, सभी अंगों के लिए कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी की प्रक्रिया काफी उन्नत और विकसित हुई है, इसके बावजूद ये तरीके काफी कम कारगर साबित हुए हैं। ज्यादातर क्लिनिकल ट्रायल से यह बात सामने आई है कि इन तरीकों से उपचार कराने वाले कुछ गिने-चुने मरीज ही लंबे समय तक जीवित रह पाते हैं। जिसकी वजह से कई नॉन-सर्जिकल तरीकों, यानी कि सर्जरी के बिना इलाज के तरीकों को वैकल्पिक उपचार के रूप में विकसित किया गया है।
इन्टर्वेन्शनल रेडियोलॉजी में दवाई और टेक्नोलॉजी का साथ-साथ उपयोग किया जाता है, जो कैंसर के उपचार का जबरदस्त तरीका साबित हुआ है और इसमें मरीज को दर्द का अनुभव कम होता है। उपचार के इन तरीकों को मोटे तौर पर दो अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहली श्रेणी में इमेज-गाइडेड एब्लेटिव थेरेपी जैसे कि, रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन (RFA), माइक्रोवेव एब्लेटिव थेरेपी, क्रायोएब्लेशन और इरिवर्सेबल इलेक्ट्रोपोरेशन, शामिल हैं। दूसरी श्रेणी में ट्रांस-आर्टरियल कीमोइम्बोलाइज़ेशन (TACE) और ट्रांस-आर्टरियल रेडियोएम्बोलाइज़ेशन जैसी ट्रांस-आर्टरियल हैप्टिक थेरेपी शामिल हैं।
3 सेमी से कम आकार के ट्यूमर के इलाज के लिए इस तरीके का उपयोग किया जाता है। इन्टर्वेन्शनल रेडियोलॉजिस्ट या ऑन्कोलॉजिस्ट सटीक स्थान की पहचान करने के लिए लाइव इमेज (CT/USG) गाइडेंस की मदद से सीधे ट्यूमर में एक छोटी, सुई जैसी प्रोब डालते हैं। फिर प्रोब के माध्यम से रेडियोफ्रीक्वेंसी एनर्जी भेजी जाती है जो गर्मी उत्पन्न करती है और लिवर के ट्यूमर को नष्ट कर देती है। इस प्रक्रिया में स्वस्थ कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं होता है।
माइक्रोवेव एब्लेशन की प्रक्रिया को डाइ-इलेक्ट्रिक हिस्टैरिसीस के नाम से जाना जाता है। CT/USG गाइडेंस की मदद से, विशेष रूप से बनाये गए माइक्रोवेव प्रोब को सीधे ट्यूमर में डाला जाता है और प्रोब के आसपास उत्पन्न गर्मी से असामान्य रूप से बढ़े हुए उत्तक नष्ट हो जाते हैं। माइक्रोवेव एब्लेशन प्रक्रिया से प्रभावित अंगों को अच्छी तरह हटाया जाता है, मरीजों को दर्द का अनुभव कम होता है, साथ ही नजदीकी रक्त वाहिकाओं पर कम हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
क्रायोएब्लेशन प्रक्रिया में अत्यधिक ठंड के उपयोग से कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। अल्ट्रासाउंड इमेजिंग की मदद से इन्टर्वेन्शनल रेडियोलॉजिस्ट लिक्विड नाइट्रोजन युक्त क्रायोप्रोब (धातु के प्रोब) को लिवर ट्यूमर पर सीधे रखता है। क्रायोप्रोब ट्यूमर को अत्यधिक ठंडा करके नष्ट कर देता है। प्रभावित अंगों को हटाने के दूसरे तरीकों की तुलना में बड़े ट्यूमर के इलाज के लिए क्रायोएब्लेशन का उपयोग किया जा सकता है, और इसके लिए कभी-कभी सामान्य एनेस्थेसिया की आवश्यकता होती है।
दुर्भाग्य से, थर्मल एब्लेशन के जरिए अधिकांश मरीजों का उपचार संभव नहीं हो पाता है क्योंकि ज्यादातर मामलों में ट्यूमर पित्त की मुख्य नली के एकदम करीब होता है। हालांकि, इरिवर्सेबल इलेक्ट्रोपोरेशन (IRE) में डायरेक्ट करंट के इस्तेमाल से कैंसर-ग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। ट्यूमर अगर पित्त की मुख्य नली के एकदम करीब हो, तो उस स्थिति में यह अधिक उपयोगी है, क्योंकि सामान्य थर्मल एब्लेशन तकनीक से ऐसे मरीजों का उपचार करना संभव नहीं होता है।
पारंपरिक ट्रांस-आर्टरियल कीमोइम्बोलाइज़ेशन (TACE) में कीमोथैरेप्यूटिक एजेंट के साथ-साथ तेल का भी प्रयोग किया जाता है, और बीमारी के दूसरे चरण में इस तकनीक के इस्तेमाल का सुझाव दिया जाता है। कीमोथेरेपी में कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए दवाओं का उपयोग किया जाता है, जो सामान्य तौर पर कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने, विभाजित करने और नई कोशिकाओं का निर्माण करने से रोकता है। इस प्रक्रिया के दौरान, इन्टर्वेन्शनल रेडियोलॉजिस्ट लाइव इमेज गाइडेंस की मदद से मरीज़ की कमर या कलाई में एक छोटे से छेद के माध्यम से एक छोटी ट्यूब (माइक्रो केथेटर) को उस रक्त वाहिका तक पहुंचाते हैं, जो लिवर ट्यूमर को रक्त की आपूर्ति करती है।
एक बार सही जगह पर पहुंच जाने के बाद, माइक्रो-कैथेटर के जरिए पर्याप्त मात्रा में कीमोथेरेपी की दवा को ट्यूमर में भेजा जाता है, जिसके बाद थोड़े समय के लिए धमनी में रक्त का प्रवाह बंद हो जाता है, और इस तरह कीमोथेरेपी की दवा ट्यूमर में लंबे समय तक रहती है। ट्यूमर को रक्त की आपूर्ति नहीं होने के कारण कैंसर कोशिकाएं भी नष्ट हो जाती हैं।
विभिन्न अध्ययनों से यह पता चला है कि, HCC और लिवर को सुरक्षित रखने वाली प्रक्रियाओं की तुलना में TACE की विधि से उपचार कराने वाले मरीजों के लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना अधिक होती है। इसके अलावा, तेल के बजाय ड्रग इल्यूटिंग बीड्स (DEB) के इस्तेमाल से अधिक मात्रा में कीमोथेरेपी की दवा को ट्यूमर में भेजा जा सकता है और लिवर में जहरीले तत्व फैलने की संभावना काफी कम हो जाती है। कीमोइम्बोलाइज़ेशन का उपयोग HCC के प्राथमिक उपचार के रूप में किया जाता है, साथ ही इसका इस्तेमाल लिवर ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे मरीजों में ट्यूमर के विकास को धीमा करने के लिए भी किया जा सकता है।
HCC के दूसरे चरण तक पहुंच चुके मरीजों के उपचार के विकल्प के तौर पर Yttrium-90 बीड्स के साथ रेडियोएम्बोलाईज़ेशन का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में माइक्रोकैथेटर को लिवर ट्यूमर को रक्त की आपूर्ति करने वाली धमनी तक पहुंचाया जाता है, और फिर एक रेडियोएक्टिव सामग्री को ट्यूमर के भीतर भेजा जाता है। कीमोइम्बोलाइज़ेशन की तरह रेडियोएम्बोलाईज़ेशन भी काफी कारगर और सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त HCC के विकसित चरण वाले मरीजों के लिए रेडियोएम्बोलाइजेशन काफी सुरक्षित और प्रभावी है। रेडियोएम्बोलाइजेशन के आधुनिक तरीकों में रेडिएशन सेग्मेंटेक्टोमी शामिल है, जिसमें रेडिएशन की उच्च खुराक को धमनियों तक पहुंचाकर ट्यूमर को नष्ट किया जाता है और सामान्य लिवर पैरेन्काइमा को रेडिएशन से बचाया जाता है।
जिन मरीजों का नॉन-सर्जिकल तरीके से इलाज संभव है, वैसे मरीजों को अच्छी तरह ठीक करने के लिए इस तरीके से उपचार किया जा सकता है, या फिर उपचार के दूसरे तरीकों के साथ-साथ इसका भी उपयोग किया जा सकता है। इन्टर्वेन्शनल रेडियोलॉजी में मरीज को दर्द का अनुभव कम होता है, साथ ही इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि सभी अंगों के लिए कीमोथेरेपी और पारंपरिक रेडिएशन की तुलना में चिकित्सा की इस तकनीक से मरीज पर रेडिएशन का दुष्प्रभाव काफी कम होता है। इसकी वजह यह है कि, ट्यूमर एब्लेटिव थेरेपी सटीक रूप से ट्यूमर को लक्षित करती है, जिससे शरीर के स्वस्थ अंगों पर कोई बुरा असर नहीं होता है, साथ ही रोगियों को अधिक गंभीर और असुविधाजनक दुष्प्रभावों से भी छुटकारा मिलता है।
एकदम सटीक तरीके से इलाज करने वाले ऐसे तरीकों में मरीजों को दर्द का अनुभव काफी कम होता है, और कई मामलों में तो सामान्य एनेस्थीसिया तथा अस्पताल में भर्ती किए जाने की जरूरत के बिना ही मरीजों का उपचार किया जा सकता है। इन्टर्वेन्शनल तरीके से उपचार करने पर, कभी-कभी लिवर एंजाइम में वृद्धि के कारण थकान, फ्लू जैसे लक्षण और सूजन जैसे सामान्य दुष्प्रभाव नजर आ सकते हैं। लेकिन तुरंत उपचार के बाद एक से दो हफ्ते के भीतर ऐसे दुष्प्रभावों को दूर किया जा सकता है। इसके बाद, मरीज जल्द ही पहले की तरह सामान्य जीवन जी सकते हैं।
इस बात को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है कि, क्रोनिक हेपेटाइटिस या सिरोसिस वाले सभी मरीजों की समय-समय पर जांच की जानी चाहिए ताकि ट्यूमर का शुरुआत में ही पता लगाया जा सके, क्योंकि इन बीमारियों से पीड़ित मरीजों में लिवर कैंसर होने की संभावना सबसे अधिक होती है।
Inputs: Dr. Santosh B. Patil, Consultant Neuro and Vascular Interventional Radiologist at The Vein Center.