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Written By: Yogita Yadav | Published : May 24, 2019 8:25 PM IST
छह साल की इस बच्ची का ग्वालियर के एक अस्पताल में इलाज चल रहा था। शुक्रवार को उसके आंख के कैंसर का सफल ऑपरेशन हुआ। यह बच्ची को नया जीवन मिलने जैसा ही है। © Shutterstock
आंख के कैंसर से ग्रस्त उत्तर प्रदेश की एक बच्ची को नया जीवन मिला है। जिसके लिए एक पत्रकार ने सोशल मीडिया पर मदद की गुहार लगाई थी। उसकी बदौलत महोखर गांव की कैंसर से जूझ रही बच्ची को नया जीवन मिला है। छह साल की इस बच्ची का ग्वालियर के एक अस्पताल में इलाज चल रहा था। शुक्रवार को उसके आंख के कैंसर का सफल ऑपरेशन हुआ। यह बच्ची को नया जीवन मिलने जैसा ही है।
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बांदा जिले के महोखर गांव की छह साल की दलित बच्ची अंशिका को आंख और मस्तिष्क के बीच कैंसर हो गया था। एक हिंदी न्यूज चैनल के पत्रकार अजय सिंह चौहान इस बारे में लोगों को बताया था। पहले इसे वे ट्यूमर मान रहे थे। जिसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली। इस पोस्ट में देश के लोगों से इलाज के लिए आर्थिक मदद का आह्वान किया।
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सोशल मीडिया की पोस्ट पढ़कर नोएडा के धनंजय सिंह मदद को आगे आए। उन्होंने बच्ची को एम्स (दिल्ली) में भर्ती कराया। लेकिन वहां चिकित्सकों ने कैंसर बताकर वापस कर दिया। बाद में धनंजय ने अपने चाचा राजाबाबू सिंह (ग्वालियर के आईजी) से बात की। और तब बच्ची को ग्वालियर के कैंसर अस्पताल में भर्ती कराया गया।
आईजी सिंह के अनुसार, चिकित्सकों ने साफ कह दिया था कि ऑपरेशन के दौरान बच्ची की जान जा सकती है। वहीं आंख बचने का तो सवाल ही नहीं है। लेकिन शुक्रवार को हुए ऑपरेशन में बच्ची की जान भी बच गई और आंख भी सुरक्षित है। आईजी पीड़ित के पड़ोसी गांव पचनेही के रहने वाले हैं। जिन्होंने ऑपरेशन का पूरा खर्च उठाया।
आंख के कैंसर के बारे में हमारे देश में जागरुकता बहुत कम है। अकसर इसमें बहुत देर से पता चलता है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। ज्यादा देर होने से आंखों की रोशनी जाने के साथ-साथ जान को भी खतरा पैदा हो जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि शरीर के अन्य अंगों की तरह आंखों में भी कैंसर हो सकता है। यही नहीं अन्य अंगों के कैंसर से आंखों पर भी असर पड़ सकता है।
पांच साल से कम उम्र के बच्चों में रेटिनोब्लास्टोमा यानी रेटिना का कैंसर सामान्य है। इसमें भेंगापन व आंखों की पुतली के भीतर सफेद दाग रहता है। यह रोग 20 हजार में एक बच्चे में देखने को मिलता है। शुरुआती चरण में रोग का पता चलने पर बच्चे व उनकी दोनों आंखों की रोशनी बचाई जा सकती है।