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नेपाल में कुष्ठ रोग के फिर से बढ़ने का मंडरा रहा है खतरा, जानें क्या है यह बीमारी

काठमांडू पोस्ट की गुरुवार की रिपोर्ट के मुताबिक, 2009 में हिमालय राष्ट्र द्वारा बीमारी को जड़ से खत्म करने की घोषणा के बाद नेपाल को कुष्ठ मुक्त देश का दर्जा दिया गया था।

Written By Anshumala
Updated : March 7, 2019 6:56 PM IST

नेपाल में कुष्ठ रोग के फिर सिर उठाने का डर। © Shutterstock.

नेपाल में स्वास्थ्य अधिकारियों को कुष्ठ रोग के फिर से सिर उठाने का डर सताने लगा है। 2018 में इसकी प्रसार दर 0.94 पहुंच जाने के बाद अधिकारी चिंतित हैं। काठमांडू पोस्ट की गुरुवार की रिपोर्ट के मुताबिक, 2009 में हिमालय राष्ट्र द्वारा बीमारी को जड़ से खत्म करने की घोषणा के बाद नेपाल को कुष्ठ मुक्त देश का दर्जा दिया गया था। हालांकि, अगर प्रसार दर कुल आबादी के एक फीसदी तक पहुंच जाती है तो देश से यह दर्जा छिन सकता है।

विशेषज्ञों को डर है कि इससे नेपाल में इस बीमारी के पुनरुत्थान का पता चलता है। एक अधिकारी ने कहा कि इसकी दर बढ़ सकती है क्योंकि वर्तमान आकंड़े प्रारंभिक डाटा से लिए गए हैं। समाचार रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य सेवा विभाग के महामारी विज्ञान एवं रोग नियंत्रण प्रभाग (ईपीसीडी) के कुष्ठ रोग नियंत्रण एवं अक्षमता (एलसीडी) खंड ने कहा कि प्रसार दर 2017 में 0.92 फीसदी और 2016 में 0.89 फीसदी रही थी।

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चिकित्सक और एलसीडी खंड के प्रमुख रबिंद्र बसकोटा ने कहा, "अगर देश यह दर्जा खोता है तो उसके लिए यह एक तगड़ा झटका होगा।" उन्होंने कहा, "कुष्ठ रोग की ऊष्मायन अवधि एक से 20 वर्ष तक भिन्न-भिन्न होती है और इसके अधिक से अधिक रोगियों का इलाज कर इसके प्रसार को रोकने में मदद मिल सकती है। अगर यह चलन जारी रहा तो मात्र दो वर्षों में प्रसार दर एक फीसदी पर पहुंच जाएगी।"

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क्या है कुष्ठ रोग

कुष्ठ रोग (Leprosy) या हान्सेंस डिजीज’ (Hansen’s Disease) से पीड़ित मरीज समाज से अलग और अकेले रहने के लिए मजबूर हो जाते हैं। आज भी रोग के बारे में इतनी जानकारी बढ़ने के बावजूद कुष्ठ रोगियों को समाज में अकेलेपन से जूझना पड़ता है, यहां तक कि उन्हें सार्वजनिक सुविधाओं से भी वंचित कर दिया जाता है। कुष्ठ रोग एक जीर्ण, प्रगतिशील संक्रमण है, जिसका असर व्यक्ति की त्वचा, आंखों, श्वसन तंत्र एवं परिधीय तंत्रिकाओं पर पड़ता है। यह एक प्रकार के जीवाणु मायकोबैक्टीरियम लैप्री के कारण होता है। हालांकि, यह बीमारी बहुत ज्यादा संक्रामक नहीं है, लेकिन मरीज के साथ लगातार संपर्क में रहने से संक्रमण हो सकता है।

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क्या हैं इसके लक्षण

यह बीमारी पांच साल तक इन्क्यूबेशन पीरियड में रहती है। हालांकि, कई बार 20 साल तक भी रोग के लक्षण दिखाई नहीं देते। त्वचा पर घाव, दानेदार उभार, उंगुलियों के पोरों का सुन्न होना, मांसपेशियों में कमजोरी आदि रोग के आम लक्षण हैं। रोग के संक्रमण, इसके प्रकार एवं अवस्था की जांच के लिए लेप्रोमाइन स्किन टेस्ट किया जाता है। संक्रमण की शुरुआती अवस्था में सही निदान होना इलाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

इलाज कैसे हो

कुष्ठ रोग का इलाज संभव है। भारत सरकार कुष्ठ रोग का निःशुल्क इलाज उपलब्ध कराती है। आपको संक्रमित व्यक्ति के साथ लंबे समय तक संपर्क में नहीं रहना चाहिए, लेकिन कुष्ठ रोग के मरीज को बिल्कुल अलग करना भी जरूरी नहीं है। साथ ही सही इलाज के बाद मरीज संक्रमण से मुक्त हो सकता है और इसके बाद वह बिल्कुल संक्रामक नहीं रहता। कुष्ठ रोगी ठीक होने के बाद समाज के उत्पादक सदस्य के रूप में अपना जीवन जी सकता है लेकिन समाज में कुष्ठ रोग के बारे में फैली गलत अवधारणाओं के कारण अक्सर ऐसा नहीं हो पाता।

इनपुट: (आइएएनएस हिंदी)

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