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Written By: Yogita Yadav | Published : September 17, 2018 11:29 AM IST
अगर माता-पिता को फूलों से एलर्जी है तो बच्चों में भी बढ़ जाती है इसकी संभावना। © Shutterstock
ये छोटे-छोटे पराग, नाक में घुसकर उसके अंदर की श्लेष्मा (mucus) की परत से चिपक जाते हैं। इसके बाद ये नाक से गले तक पहुँच जाते हैं, जहाँ इन्हें या तो निगल लिया जाता है या फिर खाँसकर बाहर निकाल दिया जाता है। इससे कोई नुकसान नहीं होता। लेकिन कभी-कभी पराग, रोग-प्रतिरक्षा तंत्र (बीमारियों से लड़ने की शरीर की ताकत) पर असर करता है।
समस्या है प्रोटीन
दरअसल, समस्या की जड़ पराग में पायी जानेवाली प्रोटीन है। जिन लोगों को पराग से ऐलर्जी होती है, उनके शरीर का रोग-प्रतिरक्षा तंत्र कुछ खास किस्म के पराग की प्रोटीन को खतरा समझने लगता है। इसलिए जब उनके शरीर में ये पराग घुस आते हैं, तो ऐसा चक्र शुरू हो जाता है जिससे शरीर के ऊतकों में पायी जानेवाली मास्ट कोशिकाएँ फट जाती हैं और ये बड़ी तादाद में हिस्टामीन नाम का पदार्थ छोड़ती हैं।
नुकसान पहुंचाता है हिस्टामीन
हिस्टामीन की वजह से खून की नलियाँ फैल जाती हैं और उनमें से पदार्थों के आर-पार जाने का रास्ता खुल जाता है। इस वजह से बीमारियों से लड़नेवाली कोशिकाओं से भरा द्रव्य बहकर ज़ाया हो जाता है। आम तौर पर, जब शरीर को कोई चोट लगी होती है या संक्रमण रहता है, तो ये कोशिकाएँ शरीर की उस जगह पर पहुँच जाती हैं और वहाँ से वे नुकसान पहुँचानेवाले दुश्मनों को खत्म कर देती हैं। लेकिन जिन लोगों को ऐलर्जी होती है, उनमें पराग खतरे की गलत सूचना देता है। नतीजा, नाक बहने लगती है और उसमें खुजली होने लगती है, ऊतक फूल जाते हैं और आँखों से पानी आने लगता है।
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क्या कहता है शोध
खोजकर्ताओं का मानना है कि अगर माता-पिता को ऐलर्जी है, तो बच्चों को भी ऐलर्जी हो सकती है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि उन्हें एक ही तरह के पराग से ऐलर्जी हो। एक इंसान को प्रदूषण की वजह से भी पराग से ऐलर्जी हो सकती है। जापान में देखा गया है कि ऐलर्जी ज़्यादातर ऐसे इलाकों में रहनेवालों को होती है, जहाँ की हवा में भारी तादाद में डीज़ल के कण पाए जाते हैं। जानवरों पर किया गया अध्ययन ज़ाहिर करता है कि इन कणों की वजह से ऐलर्जी होने की गुंजाइश बढ़ जाती है।
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प्रकृति की सौगात है पराग
लेकिन ऐलर्जी के शिकार बहुत-से लोग ऐंटीहिस्टामीन नाम की दवाइयों के लिए एहसानमंद हैं जिनसे उन्हें काफी राहत मिलती है। दवाइयों के नाम से ही पता चलता है कि ये हिस्टामीन के असर को बेअसर कर देती हैं। सच है कि पराग, इंसान की नाक में दम कर देता है, लेकिन जीवन के लिए ज़रूरी इन छोटे-छोटे कणों की रचना और इन्हें बिखेरने का तरीका देखकर हमें मानना पड़ेगा कि यह किसी बुद्धिमान रचनाकार के हाथ का करिश्मा है। इन परागकणों के बिना तो हमारी पृथ्वी बिलकुल बंजर ज़मीन होती।