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Written By: Yogita Yadav | Published : August 3, 2019 9:29 PM IST
डिजिटल डिटॉक्स से हुए फायदे के बाद अब ज्यादातर देशों में लोग इसे फॉलो कर रहे हैं। इसमें सर्वाधिक लोकप्रिय है वीकली डिजिटल डिटॉक्स। © Shutterstock
अगर आपका सोना, जागना, खाना पीना सब कुछ मोबाइल या लेपटॉप के साथ हो रहा है तो यह तय मान कर चलिए कि आप नोमोफोबिया के शिकार हो गए हैं। इसमें व्यक्ति सबकुछ डिजिटल (digital detox) करना चाहता है। यानी हंसना, खेलना, कुछ नया खरीदना आदि सब कुछ डिजिटल मीडिया पर शेयर करता है। पर बीमारी यह नहीं है। बीमारी वह तब बनता है जब मोबाइल या लेपटॉप न मिलने पर आप तनाव ग्रस्त हो जाते हैं। चिढ़चिढ़ाने लगते हैं। कोई आपके मोबाइल को छू भी दे तो आप उतावले हो जाते हैं। यह बीमारी दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है। जिसने लोगों को अपनों से दूर कर दिया है।
डिजिलट डिटॉक्स (digital detox) शब्द डिजिटल एडिक्शन से ही निकाला गया है। इसमें वही चीज छुड़वानी है जिसकी आपको लत लग चुकी है। एक शोध के तहत तंत्रिका तंत्र वैज्ञानिकों ने मोरक्को के रेगिस्तान में 35 लोगों को बिना उन के स्मार्टफोन इत्यादि उपकरणों के छोड़ दिया। कुछ ही समय बाद उन की जिंदगी बदल गई।
विकसित देशों की कंपनियां डिजिटल डिटॉक्स या डिजिटल विषाक्तता को दूर करने के इलाज का कारोबार कर रही हैं। फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग की बहन रैंडी जुकरबर्ग भी डिजिटल डिटॉक्स के बिजनैस में हैं। इन का कारोबार बढ़ रहा है। जाहिर है, इस के मरीज भी मिल रहे हैं।
डिजिटल डिटॉक्स से हुए फायदे के बाद अब ज्यादातर देशों में लोग इसे फॉलो कर रहे हैं। इसमें सर्वाधिक लोकप्रिय है वीकली डिजिटल डिटॉक्स। इसमें आप अपने वीकेंड पर ऐसी किसी भी चीज का इस्तेमाल नहीं करते, जो आपको अपनी वास्तविक दुनिया से तोड़कर डिजिटल दुनिया से जोड़ती है। फिर चाहें वह मोबाइल हो या लैपटॉप। इस दिन वे प्रकृति और परिवार के साथ समय बिताकर खुद को रिफ्रेश करते हैं।