
रश्मि उपाध्याय
रश्मि उपाध्याय साल 2014 से मीडिया क्षेत्र से जुड़ी हैं और TheHealthSite.Com में बतौर एडिटर काम कर रही हैं। इन्हें ... Read More
कहते हैं कि कुछ लोग इस दुनिया से जाने के बाद भी हमेशा जिंदा रहते हैं। हेमंत कुमार अग्रवाल भी ऐसे ही इंसान थे। परिवार के लिए जीने वाले, दोस्तों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहने वाले और हर पल को खुलकर जीने वाले हेमंत ने अपनी जिंदगी में कई सपने देखे थे। मेरठ से दिल्ली तक का रोज का लंबा सफर हो या बच्चों का बेहतर भविष्य, उन्होंने हर जिम्मेदारी को दिल से निभाया। करीब 10 साल पहले उन्होंने अपने परिवार के लिए दिल्ली के द्वारका में एक खूबसूरत घर बनवाया था। लेकिन किसे पता था कि जिस घर को उन्होंने अपने परिवार के साथ खुशियां बिताने के लिए बनाया है, उसमें रहने का समय उन्हें इतना कम मिलेगा। लेकिन जाते-जाते भी वे ऐसा काम कर गए कि आज कई परिवार उनकी वजह से मुस्कुरा रहे हैं।
29 फरवरी 2020 वो दिन था जिसने सब कुछ हमेशा के लिए बदल दिया। हेमंत को अचानक उल्टी, तेज बुखार और मानसिक स्थिति में अचानक बदलाव महसूस हुआ। पहले उन्हें स्थानीय आकाश हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां सीटी स्कैन से पता चला कि उन्हें इंट्रावेंट्रिकुलर हैमरेज हुआ है। स्थिति गंभीर होने के कारण उन्हें तुरंत आर्टेमिस हॉस्पिटल शिफ्ट किया गया। डॉक्टरों ने हर मुमकिन कोशिश की, एक सफल प्रोसीजर भी हुआ, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 12 मार्च 2020 को डॉक्टरों ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया।
जब आर्टेमिस हॉस्पिटल के डॉक्टरों और मोहन फाउंडेशन (MOHAN Foundation) के काउंसलर ने परिवार से बात की, तो हेमंत जी के साले ने स्थिति को समझा। बेटी अपूर्वा पहले ही अपने पिता के अंगों को दान करने की इच्छा जता चुकी थी। पत्नी बरखा ने भारी मन लेकिन जबरदस्त हौसले के साथ सहमति दी। हेमंत जी की दोनों किडनियां और लिवर डोनेट किए गए। उनके लिवर को स्प्लिट करके एक मासूम बच्चे और एक वयस्क को नया जीवन दिया गया। उनके बेटे आर्यन कहते हैं "मैनें सिर्फ अपने पापा नहीं बल्कि अपने मेंटर, गाइड और सबसे अच्छे दोस्त को खोया है।"
हेमंत जी ने कभी अपनी पत्नी से कहा था कि रिटायरमेंट के बाद वे एक ऐसी लॉन्ग ड्राइव पर जाएंगे, जिसकी कोई मंजिल नहीं होगी। किसे पता था कि जिंदगी का सफर इतनी जल्दी थम जाएगा, लेकिन उनकी यह विदाई दूसरों के सफर को खूबसूरत बना गई। ZeeMedia की टीम ने जब पत्नी बरखा से बात की तो उनकी आंखों में आंसू तो थे, पर साथ ही गर्व भी था। वे बताती हैं कि हेमंत को कोई बीमारी नहीं थी, वे पूरी तरह स्वस्थ थे। बरखा ने कहा "मैंने आज तक अपने पति की तस्वीर पर फूलों की माला नहीं चढ़ाई है। क्योंकि मेरे और मेरे बच्चों के लिए वो आज भी मरे नहीं हैं बल्कि किसी और के रूप में आज भी इस दुनिया में जिंदा हैं, सांस ले रहे हैं।"
वे याद करती हैं कि हेमंत जी अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा हमेशा दान करते थे। वे कहती हैं कि लोग अक्सर अंगदान करने से डरते हैं क्योंकि समाज में सही जानकारी नहीं है। लोगों को लगता है कि डॉक्टर मिले हुए होते हैं और अंगों को बेच देते हैं। लेकिन बरखा अपने अनुभव से बताती हैं, "ऐसा बिल्कुल नहीं होता। मुझे मेरे पति की देह बेहद सम्मान और आदर के साथ सौंपी गई थी।"

बरखा का एक बहुत ही जरूरी सवाल था, वो चाहती हैं कि हम के माध्यम से इसका जवाब दें। सवाल है "अंगदान करने वाले परिवार को कैसे भरोसा हो कि उनका दान सही जगह जा रहा है और इसमें कोई धांधली नहीं हो रही है?" तो इसका जवाब ये है:
NOTTO: भारत सरकार की एक संस्था है जिसे NOTTO (National Organ and Tissue Transplant Organisation) कहा जाता है। देश में जब भी कोई अंगदान होता है, तो उसका पूरा रिकॉर्ड इस सरकारी नेटवर्क पर ऑनलाइन दर्ज होता है।
वेटिंग लिस्ट: अंग अमीर-गरीब के हिसाब से नहीं मिलता बल्कि वेटिंग लिस्ट के आधार पर तय होता है। जिसमें मरीज की बीमारी की गंभीरता, ब्लड ग्रुप और ऑर्गन मैचिंग के आधार पर कंप्यूटर खुद तय करता है कि अंग किसे मिलेगा। इसमें इंसानी दखल नामुमकिन है।
अंगों की बिक्री कानूनन अपराध: 'ट्रांसप्लांटेशन ऑफ ह्यूमन ऑर्गन्स एक्ट' (THOA) के तहत अंगों की खरीद-फरोख्त पूरी तरह से गैर-कानूनी और एक गंभीर अपराध है। कोई भी अस्पताल या डॉक्टर अपनी मर्जी से अंग किसी को नहीं दे सकता।
गोपनीयता: अंग देने वाले और लेने वाले परिवार की पहचान को पूरी तरह गुप्त रखा जाता है ताकि किसी भी प्रकार का अनुचित दबाव या कमर्शियल लेनदेन न हो सके।

अंगदान को लेकर हमारे समाज में आज भी जागरूकता की भारी कमी है। हर साल भारत में लाखों लोग सिर्फ इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें समय पर ऑर्गन नहीं मिल पाते। हेमंत कुमार अग्रवाल और उनके परिवार की यह कहानी हमें सिखाती है कि जब दुख का पहाड़ टूटा हो, तब भी हम अपनी सोच को बड़ा रखकर किसी के घर का बुझता हुआ चिराग रोशन कर सकते हैं। आइए, Zee Media के जागरूकता अभियान 'जिंदगी के बाद भी' का हिस्सा बनें, अंगदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करें और अंगदान करने का संकल्प लें। क्योंकि आपके एक फैसले से किसी को दूसरी जिंदगी मिल सकती है। हेमंत कुमार अग्रवाल और उनके पूरे परिवार के इस जज्बे को ZeeMedia कोटि-कोटि नमन करता है।
अंगदान दो तरह से होता है- पहला 'लिविंग डोनेशन' (जीवित रहते हुए किडनी या लिवर का एक हिस्सा देना) और दूसरा 'डिसीज्ड डोनेशन' (ब्रेन डेड घोषित होने के बाद आंखें, दिल, लिवर, किडनी आदि दान करना)। मेडिकल टीम जांच के बाद ही तय करती है कि कौन से अंग दान किए जा सकते हैं।
NOTTO या किसी संस्था द्वारा जारी किया गया एक पहचान पत्र होता है, जो यह बताता है कि आपने अपनी मृत्यु के बाद अपने अंग दान करने का संकल्प लिया है। यह कार्ड आपकी इच्छा का प्रमाण तो है, लेकिन आपके जाने के बाद अंगदान तभी हो सकता है जब आपका परिवार इसके लिए अंतिम लिखित अनुमति देता है।
| भ्रम (Myths) | सच (Facts) |
| अगर मैं अंगदान के लिए साइन करूंगा, तो डॉक्टर अस्पताल में मुझे बचाने की कोशिश नहीं करेंगे। | डॉक्टर का पहला काम आपकी जान बचाना होता है, अंगदान की बात सिर्फ तब शुरू होती है जब मरीज 'ब्रेन डेड' घोषित हो जाए। |
| घर पर सामान्य मौत होने के बाद भी शरीर के सारे अंग दान किए जा सकते हैं। | घर पर प्राकृतिक मौत होने पर सिर्फ आंखें दान हो सकती हैं, बाकी अंग नहीं। |
| अंगदान करने से मृत व्यक्ति का शरीर पूरी तरह से खराब हो जाता है। | अंगों को एक सामान्य ऑपरेशन की तरह बेहद सम्मान से निकाला जाता है, जिससे शव पर बाहर से कोई खराबी या दाग न दिखे। |
| अंगदान के लिए परिवार को अस्पताल को बहुत सारे पैसे देने पड़ते हैं। | अंगदान पूरी तरह से मुफ्त और एक नेक काम है, डोनर के परिवार से पैसा नहीं लिया जाता। |
| मैं बहुत बूढ़ा हूं या मुझे बीमारी है, इसलिए मेरे अंग किसी काम के नहीं हैं। | उम्र मायने नहीं रखती, मौत के वक्त डॉक्टर्स मेडिकल जांच करके खुद तय करते हैं कि आपके कौन से अंग स्वस्थ हैं और जान बचा सकते हैं। |
| अगर अंगदान किए तो अगले जन्म में उस अंग के बिना पैदा होना पड़ेगा। | यह सिर्फ एक अंधविश्वास है। |
| अंगदान करने से भगवान नाराज होते हैं। | सभी प्रमुख धर्मों में अंगदान को इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा और एक पुण्य का काम माना जाता है। |
| अंगदान के बाद डॉक्टर पूरी बॉडी को कांट छांट पर परिवार को देते हैं। | अंगों को एक सामान्य और बेहद साफ-सुथरे सर्जिकल ऑपरेशन की तरह निकाला जाता है। |