जानिये क्या है नोसेबो इफ़ेक्ट और इससे जुड़े कुछ तथ्य

कई बार इसी नोसेबो इफ़ेक्ट के कारण दवाइयां आप पर ठीक से असर नहीं करती हैं!

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Written By: Editorial Team | Published : May 16, 2017 2:02 PM IST

एक 26 वर्षीय व्यक्ति ने एक बार 29 शुगर पिल्स खा ली, जो कि रासायनिक रूप से निष्क्रिय थीं लेकिन उसे यह यकीन था कि ये एंटीडिप्रेसेंट दवाइयां असर करेंगी। सामान्य परिस्थितियों में इन गोलियों को खाने से मानव शरीर में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि केमिकली इनएक्टिव दवाइयां थीं। लेकिन इसे खाने से उस मरीज का ब्लड प्रेशर बढ़ने लगा और उसकी हालत खराब होने लगी। उसे वास्तव में विश्वास था कि उसने एंटीडिप्रेसेंट की ओवरडोज ली है। लेकिन जब उसे बताया गया कि गोलियां निष्क्रिय या बेकार थीं तो उसकी हालत में सुधार शुरू हो गया । यह एक वास्तविक केस स्टडी है जो 2007 में शोधकर्ताओं द्वारा यह साबित करने के लिए किया गया कि नोसेबो इफेक्ट  (Nocebo effect) कितना शक्तिशाली है।

हर कोई प्लेसीबो इफ़ेक्ट (placebo effect) से परिचित है जहां एक मरीज का इलाज में विश्वास उसके स्वास्थ्य में सकारात्मक प्रभाव ला सकता है। इसका इलाज की दक्षता से कम और मरीज के गहरे विश्वास से ज्यादा लेना देना होता है। लेकिन अगर मरीज को एक बार यह यकीन हो जाये कि हानिरहित शुगर पिल्स जहरीले या खतरनाक होते है तो इसका उस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और वह उल्टी करना भी शुरू कर सकता है। विज्ञान के अनुसार,नोसेबो वास्तविक है और इसका आपके स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है। आइये जानते हैं इससे जुड़ी कुछ और बातें।

नोसेबो इफेक्ट पिछले अनुभवों से प्रभावित होता है: प्लेसबो की ही तरह नोसेबो भी कई कारकों से प्रभावित होता है जैसे कि मौखिक सुझाव और व्यक्ति के अपने पिछले अनुभव। इसलिए यदि पहले कभी किसी ख़ास दवा के प्रति आपका अनुभव काफी बेकार है तो इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि जब इस बार आप इस दवा को खाएं तो इसका आप पर कोई असर ही ना पड़े। कई बार तो ये दवाइयां फायदा करने की बजाय आपको नुकसान पहुंचा सकती हैं।

नोसेबो से जान भी जा सकती है : कई होम्योपैथ डॉक्टर मरीजो को उनकी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में कुछ भी नेगेटिव बताने से बचते हैं क्योंकि वे मरीज के ठीक होने की संभावनाओं को प्रभावित नहीं करना चाहते हैं। एक रोगी को यह बताना कि उसकी हालत 'लाइलाज' या 'घातक' है उसे मानसिक रूप से और परेशान कर देती है और इससे उसपर दवाइयों का असर कम होता है। यह नोसेबो इफ़ेक्ट की तरह काम करता है जिससे किसी व्यक्ति की ठीक होने की संभावना कम हो जाती है। गंभीर मामलों मेंनोसेबो-इफ़ेक्ट के कारण मरीज की मृत्यु तक हो सकती है।

नोसेबो नैतिक दुविधा का कारण बना है : कई डॉक्टरों और चिकित्सकों के लिए यह एक मुसीबत है क्योंकि एक तरफ वे रोगी को यह बताने के लिए बाध्य हैं कि उपचार के कारण साइड इफेक्ट हो सकता है और दूसरी तरफ वे चिंतित हैं कि बीमारी या इलाज का नेगेटिव साइड बताने से रोगी के ठीक होने की संभावना पर असर पड़ेगा।

जब डाक्टर कठोर शब्दों का प्रयोग करते हैं तो इससे अधिक तकलीफ होती है: नोसेबो प्रभाव मरीजों के दर्द को और बढ़ा सकता है। 2010 में किए गए एक अध्ययन में डॉक्टरों ने बेहोशी वाले इंजेक्शन देने से पहले रोगियों से कठोरता से बात की। जब डॉक्टर ने मरीज से कहा कि इंजेक्शन लगने पर आप मधुमक्खी के डंक जैसा महसूस करेंगे तो ऐसा पाया गया कि मरीज को दर्द का ज्यादा अनुभव हुआ। इसके बाद से ही यह डिसाइड किया गया कि मरीज के साथ काफी नम्रता से बात करनी चाहिए।

नोसेबो पुरुष और महिलाओं को अलग तरह से प्रभावित करता है: एक अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार नोसेबो इफ़ेक्ट के पुरुष और महिलाओं पर अलग-अलग प्रभाव पाए गए। जैसे कि जब महिलाओं को यह बताया गया कि उनके शरीर में कोई दिक्कत हुई है और उनको मिचली आ सकती है लेकिन इन बातों का उन पर उतना नेगेटिव  प्रभाव नहीं पड़ा। वहीं दूसरी तरफ पुरुषों का रिएक्शन उम्मीद के मुताबिक ही था।

मीडिया के कारण नोसेबो इफेक्ट : नोसेबो इफ़ेक्ट का सबसे ज्यादा असर मीडिया के कारण होता है। जैसे कि रोज अखबारों में या टीवी पर यह बताया जाये कि नारियल तेल का इस्तेमाल करना आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तो धीरे धीरे पढ़ पढ़ कर आप इस पर भरोसा कर लेते हैं। इसके बाद जब अगली बार आप इसका सेवन करते हैं तो सच में आपको इससे दिक्कतें होने लगती हैं।

आपकी दवाओं के कुछ साइड इफेक्ट्स नोसेबो प्रभाव के कारण हैं : अध्ययनों से पता चलता है कि आपकी दवा के कुछ साइड इफेक्ट उस दवा से नहीं बल्कि नोसेबो प्रभाव से भी हो सकते हैं। अगर आप जो दवा खा रहे हैं उसे लेकर आपके मन में कोई शक या संदेह है तो इस बात की बहुत संभावना है कि आपको इसका साइड इफ़ेक्ट होने लगे।

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अनुवादक: Anoop Singh

चित्र स्रोत: Shutterstock

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