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रश्मि एक एक्सिडेंट में बाल-बाल बच गई लेकिन उसके साथ के बाकी यात्रियों को काफी चोटें आयी। इस दुर्घटना में बच जाने के बावजूद रश्मि की मुश्किलें कम नहीं हुई। घटना के कई हफ्तों बाद वह चिंता, बुरे स्वप्न, डिप्रेशन और डर का शिकार हो गई। यह सभी पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के क्लासिक लक्षण थे। उसका पति अविनाश, जो कि उसका अच्छी तरह से देखभाल करने में लगा था उसे इस हालत में नहीं देख पाता था। इस हालत से रश्मि को बाहर निकालने के लिए वह उसे यह सोचकर एक फैमिली फंक्शन में ले गया कि वह लोगों के बीच वह खुश रहेगी। हालांकि उसका यह प्लान उल्टा पड़ गया और वह इस फंक्शन में और ज्यादा डर का शिकार हो गई। अविनाश के अच्छे इरादों के बावजूद वह अपनी पत्नी को पहले की अपेक्षा और ज्यादा तनावग्रस्त हालत में देखा।
ऊपर बतायी गयी कहानी पूरी तरह से एक बीमारी की ओर संकेत करती है, पोस्ट ट्रॉमैटिक स्टेस डिसऑर्डर (Post Traumatic Stress Disorder) या पीटीएसडी एक मानसिक बीमारी है। यह व्यक्ति में किसी हादसे जैसे एक्सीडेंट, टेररिस्ट अटैक, लड़ाई, भूकंप, रेप या सेक्सुअल उत्पीड़न के बाद पैदा होती है। हालांकि शारीरिक रूप से तो वे ठीक दिखते हैं लेकिन मानसिक रूप से वे काफी लंबे समय तक इस घटना से उबर नहीं पाते हैं और वे पहले की तरह नहीं जी पाते। पीटीएसडी एक ऐसी समस्या है जिससे व्यक्ति के जीवन का हर एक पहलू प्रभावित होता है। वह हादसा व्यक्ति के दिमाग में किसी बुरे सपने और फ्लैश बैक की तरह चलता रहता है। इसके अलावा वह अपनी देखभाल करने वालों और करीबियों को भी काफी नुकसान पहुंचा सकता है और उसे ठीक होने में काफी लंबा समय लगता है। खासतौर से इंडिया में लोग इस बात से अनजान है कि पीटीएसडी क्या है और यह कैसे प्रभावित करता है।
अक्सर घरवालों को इस बात की खुशी होती है कि उसका चहेता उस हादसे में बच गया लेकिन वह इस बात को नहीं समझ पाते कि बुरे सपने और फ्लैशबैक के जरिए लगातार वह हादसा उसके दिमाग में उभरता रहता है। यह बात समझ में न आने के कारण पीड़ित डिप्रेस्ड, चिड़चिड़ा और चिंतित महसूस करता है। रोजाना ऐसे मरीजों का इलाज करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति के साथ सहानुभूति उसे पीटीएसडी के मुंह से बाहर निकालने में काफी हद तक मदद करती है। अगर आपका भी कोई करीबी पीटीएसडी की समस्या से पीड़ित है तो इन दस बातों का ध्यान रखें
धैर्य रखें- नवी मुंबई में प्रैक्टिस कर रहे मनोचिकित्सक डॉ. विकास देशमुख कहते हैं कि डिनायल, गुस्सा, बारगेनिंग, डिप्रेशन और एक्सेप्टेंस इसके पांच चरण है। उनके मुताबिक पीटीएसडी से ग्रसित व्यक्ति में ये स्टेजेज पाए जाते हैं। घरवाले पीड़ित व्यक्ति को डिप्रेशन या डेनियल स्टेज से एक्सेप्टेंस स्टेज में लाने की जल्दी में रहते हैं। पीड़ित व्यक्ति पर बिना किसी तरह का दबाव बनाए उसे अपने आप धीरे-धीरे ठीक होने के लिए छोड़ देना चाहिए। घरवालों के लिए इतना धैर्य रखना काफी महत्वपूर्ण है।
उससे बात करें और उसे भी बोलने दें- पीटीएसडी से पीड़ित व्यक्ति से बात करते रहने से उसे तेजी से उस हादसे से बाहर निकलने में मदद मिलती है। उससे बात करते समय किसी दर्दनाक हादसे का जिक्र ना करें और ना ही मरीज पर बात करने के लिए किसी तरह का दबाव बनाएं। डॉक्टर के अनुसार यहां भी धैर्य रखना काफी जरूरी है। पीड़ित व्यक्ति को अपनी बात कहने दें।
उसकी बातों से सहमत हों- मनोचिकित्सक डॉ. अमिताभ घोष का मानना है कि पीड़ित व्यक्ति की देखभाल करने वाले लोगों को उससे बहस नहीं करनी चाहिए वरना मरीज और ज्यादा उत्तेजित हो सकता है। इसके बजाय उन्हें मरीज की बातों से सहमत होना चाहिए। सेक्सुअल असॉल्ट और रेप पीड़ित अक्सर यह महसूस करते हैं कि इस घटना के लिए खुद को जिम्मेदार ठहराते हैं और अपने भाग्य को कोसते हैं। अंत में आपको यह करना है कि उन्हें जितना चाहें कोसने दें। यह आपको अगले प्वाइंट तक ले आता है।
पीड़ित व्यक्ति को दोषी न ठहराएं- भारतीय समाज में रेप और सेक्सुअल असॉल्ट से पीड़ित व्यक्ति को ही लोग इसका जिम्मेदार ठहराते हैं। वे मानते हैं कि इस घटना को उन्होंने खुद ही दावत दिया है। इस हादसे के शिकार व्यक्ति अपराधबोध से ग्रसित हो जाते हैं। अगर इस हादसे में कोई मर जाता है तो वे खुद को भी जिंदा नहीं रखना चाहते हैं। यहां तक कि वे किसी और की मृत्यु के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हैं। डॉ. घोष कहते हैं कि ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए। लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि पीड़ित व्यक्ति पर आरोप लगाकर और उसे दोषी ठहराना समस्या का समाधान नहीं है। इससे पीड़ित व्यक्ति के आत्मविश्वास को चोट पहुंचती है।
मदद करें : उन्हें मनोचिकित्सक या काउंसलर के मदद की जरूरत पड़ सकती है क्योंकि कुछ मामलों में भावनात्मक रूप से उन्हें इनकी मदद की जरूरत होती है। डा. देशपांडे कहते हैं कि यदि आपका करीबी किसी मनोचिकित्सक के पास जाना चाहता है तो उसकी पूरी मदद करें। उसे मेडिकल सहायता देना बेहद जरूरी है खासतौर से तब जब वह रेप का शिकार हुआ हो। इस बात का ध्यान रखें उसे साइकोलॉजिस्ट और साइकियाट्रिस्ट के अलावा गायनेकोलॉजिल्ट को भी दिखाएं।
उस टॉपिक का ज़िक्र ना करें - हादसे के हफ्तों बाद पीटीएसडी पीड़ित व्यक्ति बुरे सपने का शिकार होता है। उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बारे में बात करके आप उसके जख्मों को न कुरेदें। डॉ. घोष कहते हैं कि व्यक्ति के सामने उस घटना का जिक्र न करें और उसे सब कुछ भूलने के लिए समय दें।
बच्चों से सतर्क रहें- बच्चों का दिमाग नाजुक और प्रभावशाली होता है। इसलिए माता-पिता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे बच्चों के सामने इस घटना के बारे में बात न करें। एक ऐसा भी मामला है जिसमें एक बच्चा पीटीएसडी के लक्षणों का शिकार हो गया क्योंकि उसके माता-पिता ने उसकी दादी के साथ हुई दुर्घटना का जिक्र बच्चे के सामने किया था। इसके बाद बच्चे को भी बुरे सपने आने लगे और वह डरने लगा। डॉ. घोष कहते हैं कि वह खेलते समय भी उस घटना से जुड़ी अजीब हरकतें करता था।
न्यूट्रीशन का ख्याल रखें- ज्यादा स्ट्रेस होने की हालत में हार्मोन्स का असंतुलन और इम्युनिटी कम होने के कारण पीड़ित व्यक्ति का कॉर्टिसोल लेवल खत्म होना नैचुरल है। इससे उनमें पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। डॉ. घोष कहते हैं कि ऐसे मरीजों की डायट के प्रति ध्यान देना चाहिए औऱ नियमित उन्हें संतुलित भोजन देना चाहिए। उन्हें भरपूर पानी पिलाएं और ध्यान रखें कि वे पूरा खाना खाएं। इसके लिए डायटिशियन की मदद भी ली जा सकती है।
उनकी देखभाल करते समय शांत रहें- नाजुक स्थिति में पीड़ित व्यक्ति बस यही चाहता है कि उसके बीमारी में उसके साथ कोई रहे। उसकी देखभाल करने वाले व्यक्ति को शांतिपूर्वक उससे बातें करते रहना चाहिए। डॉ. देशपांडे कहते हैं कि ऐसे लोगों के सामने अगर कोई बुरी खबर सुनानी हो तो अपनी भावनाओं पर कंट्रोल रखें।
उन्हें बिना शर्त स्वीकारें और मदद करें- पीटीएसडी पीड़ित व्यक्ति भावनात्मक रूप से नाजुक होता है और डिप्रेशन, अपराधबोध तथा खुद को असहाय महसूस करता है। यही मौका होता है जब वे लोगों से बातचीत करने और सामाजिक संबंधों से बचने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति की देखभाल करने वाले लोगों को उसे असहाय महसूस नहीं होने देना चाहिए और उसकी मदद करनी चाहिए।
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अनुवादक: Sadhana Tiwari.
चित्र स्रोत: Shutterstock