आर्टिफि‍शियल इंटेलीजेंस से रोका जा सकेगा किडनी फेलियर, जानें क्‍या है यह

अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ वेटरन्स अफेयर्स के साथ काम कर रहे डीपमाइंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लैब ने वैज्ञानिकों ने स्‍वास्‍थ्‍य जगत की उम्‍मीद बढ़ा दी है, जिसमें किडनी की समस्‍या में हालत गंभीर होने से 48 घंटे ही स्थिति के बारे में पता लगाया जा सकेगा।

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Written By: Yogita Yadav | Updated : August 6, 2019 11:02 AM IST

हाल ही में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि आर्टिफि‍शियल इंटेलीजेंस (Artificial intelligence) के जरिए किडनी फेलियर के बारे में 48 घंटे पहले ही पता लगाया जा सकेगा। जिससे तकरीबन 80 फीसदी मरीजों को समय पर सहायता देकर उनकी जान बचाई जा सकेगी। हर साल दुनिया भर में तकरीबन 2 मिलियन लोगों की मौत किडनी फेलियर की वजह से होती है। अगर वाकई ऐसा हुआ तो यह चिकित्‍सा क्षेत्र के लिए बड़ी कामयाबी होगी।

जानलेवा होते हैं गंभीर किडनी रोग

गंभीर किडनी रोग में अकसर डायलिसिस या किडनी प्रत्‍यारोपण की आवश्‍यकता होती है। हर साल 2 मिलियन लोग दुनिया भर में अचानक किडनी फेल होने से मौत के शिकार हो जाते हैं। अस्‍पताल पहुंचने वाला पांच में से एक मरीज गंभीर किडनी रोग का शिकार होता है, जिसके बारे में पता बहुत देर से चल पाता है। इसके विपरीत, यदि स्थिति का पता काफी पहले लग जाता है, तो ऐसे मरीजों की जान बचाई जा सकती है।

कैसे बचाएगी आर्टिफि‍शियल इंटेलीजेंस

अमेरिका के वेटर्न अफेयर में आए 703,000  रोगियों पर हुए गहन शोध के बाद डीप माइंड एल्‍गोरिदम (Artificial intelligence) को प्रशिक्षित करने का सिस्‍टम विकसित किया गया है। जिससे यह दावा किया गया है कि आर्टिफि‍शियल इंटेलीजेंस (Artificial intelligence) तकरीबन 48 घंटे पहले ही किडनी फे‍लियर की जानकारी दे सकेगी। डीप माइंड एल्‍गोरिदम 90 फीसदी मामलों में सही और समय रहते जानकारी दे सकने मे सक्षम रहा है। अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ वेटरन्स अफेयर्स के साथ काम कर रहे डीपमाइंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लैब ने वैज्ञानिकों ने स्‍वास्‍थ्‍य जगत की उम्‍मीद बढ़ा दी है, जिसमें किडनी की समस्‍या में हालत गंभीर होने से 48 घंटे ही स्थिति के बारे में पता लगाया जा सकेगा।

क्‍या है आर्टिफि‍शियल इंटेलीजेंस (Artificial intelligence)

असल में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंप्यूटर साइंस एंड टेक्नोलॉजी से सम्बंधित टर्म है जिसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई। असल में कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक ऐसी स्टडी है जिसमें ऐसा सॉफ्टवेयर डवलप किया जाता है जिससे एक कंप्यूटर इंसान की तरह और इंसान से भी बेहतर रेस्पॉन्स दे सके। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में कई सब्जेक्ट्स शामिल होते हैं जिनमें गणित, समाजशास्त्र, दर्शन के अलावा भाषा का ज्ञान भी शामिल होता है। अब इसमें मेडिकल फील्ड  को भी शामिल किया गया है। ताकि मनुष्यभ का जीवन बचाने के लिए इसका इस्ते माल किया जा सके।

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