Advertisement

बढ़ते वजन पर रखें कंट्रोल वरना इस बामारी के होने पर करवाना पड़ सकता है लीवर ट्रांसप्लांट

लीवर की सबसे बड़ी खासियत या सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह जब तक 80 प्रतिशत तक क्षतिग्रस्त नहीं हो जाता, तब तक इसके लक्षण दिखाई नहीं देते हैं।

Written By Anshumala
Published : July 25, 2018 7:03 PM IST

Try these tips to keep your liver healthy. © Shutterstock

लीवर शरीर का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा जटिल अंग है। यह हमारे पाचन तंत्र का एक प्रमुख अंग हैं। हम जो कुछ भी खाते या पीते हैं, वह लिवर से होकर ही गुजरता है। लीवर संक्रमण और बीमारियों से लड़ता है। रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है। शरीर से विषैले तत्व को बाहर निकालता है। कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करता है। रक्त के जमने में सहायता करता है और बाइल का स्राव करता है। लीवर शरीर का एक ऐसा अंग है, जिसके उचित देखभाल की जरूरत हमेशा पड़ती है। ऐसा न होने पर यह बेहद आसानी से क्षतिग्रस्त हो सकता है। आजकल की बदलती जीवनशैली के कारण हमारे लीवर के बीमार होने की आशंका बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि आज लीवर से जुड़ी कई बीमारियां हमें अपने चपेट में लेने लगी हैं। इन बीमारियों में प्रमुख है फैटी लीवर की समस्या, लेकिन जीवनशैली में बदलाव लाकर इस बीमारी से बचा जा सकता है।

क्या है फैटी लीवर और इससे जुड़े तथ्य

Advertisement

नई दिल्ली स्थित हेल्दी ह्यूमन क्लीनिक के सेंटर फॉर लीवर, किडनी ट्रांसप्लांट के डायरेक्टर एवं एचओडी डॉ. रविंदर पाल सिंह मल्होत्रा का कहना है कि जब लीवर में चर्बी जमा हो जाती तो इसे ही फैटी लीवर कहते हैं। जिस तरह मोटे होने पर हमारे शरीर के बाकी हिस्सों पर चर्बी चढ़ जाती है, ठीक उसी तरह हमारे लीवर में भी चर्बी जमा होनी शरू हो जाती है। ऐसी स्थिति में लीवर में एकत्रित हुआ फैट लीवर के नॉर्मल सेल्स को खत्म करना शुरू कर देता है। नॉर्मल सेल्स के धीरे-धीरे कर खत्म होने और लीवर में फैट जमा होने के कारण लीवर बीमार हो जाता है। यह स्थिति आगे चलकर हेपेटाइटिस, सिरोसिस, फाइब्रोसिस और कैंसर में भी बदल सकती है।

यह भी पढ़ें- विश्व लीवर दिवस: लीवर को रखना है स्वस्थ, तो डायट में शामिल करें ये चीजें

Advertisement

मोटापा है कारण

इस बीमारी के होने का मुख्य कारण मोटापा है। बहुत ज्यादा खाना, जंक फूड का सेवन, बैलेंस्ड डायट न लेना, एक्सरसाइज न करना आदि कारणों से हमारे शरीर में फैट जमा होने लगता है, जिससे वजन बढ़ने लगता है। इसके अलावा, डायबिटीज होने पर भी फैटी लीवर की समस्या हो सकती है। सच तो यह है कि डायबिटीज के कारण फैटी लीवर होने के मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं। थायरॉइड होने पर भी फैटी लीवर का खतरा बढ़ जाता है। डॉ. मल्होत्रा कहते हैं कि फैटी लीवर एक ही प्रकार का होता है, लेकिन इसकी अवस्था अलग-अलग होती है। इसकी समस्या सबसे ज्यादा एल्कोहल का सेवन करने वालों में या फिर यह मोटे लोगों में होती है।

नैश, ऐश, कैश

मोटापे के कारण होने वाले फैटी लीवर को नैश बोलते हैं यानी नॉन अल्कोहलिक स्टेट ऑफ हेपेटाइटिस। इसकी दूसरी अवस्था को ऐश यानी अल्कोहलिक स्टेट ऑफ हेपेटाइटिस कहते हैं। ऐश उन्हें होता है, जो शराब पीते हैं। इसकी तीसरी अवस्था वह होती है या उन लोगों में होती है जो कैंसर होने पर कीमोथेरेपी ट्रीटमेंट लेते हैं। चूंकि इस तरह का इलाज कराने से लीवर डैमेज होता है और उसमें फैट जमा होना शुरू हो जाता है। इस अवस्था को कैश कहते हैं। तो इस प्रकार फैटी लीवर की कुल तीन अवस्थाएं होती हैं।

क्या हैं लक्षण

आमतौर पर एशियाई लोगों में फैटी लीवर के शुरुआती लक्षणों का पता नहीं चल पाता है। असल में लीवर की सबसे बड़ी खासियत या फिर सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह जब तक 80 प्रतिशत तक क्षतिग्रस्त नहीं हो जाता, तब तक इसके लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। जब तक लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। ऐसे में फैटी लीवर की वजह से दूसरी गंभीर बीमारियां रोगी को हो चुकी होती है। ज्यादातर मामलों में फैटी लीवर की पहचान तब हो पाती है, जब वह सिरोसिस में बदल चुका होता है। पीलिया, भूख न लगना, पेट के अंदर पानी भर जाना आदि फैटी लीवर के लक्षण होते हैं। फैटी लीवर के एडवांस स्टेज में पहुंच जाने पर मरीज के दिमाग पर भी असर पड़ने लगता है। उसका दिमाग काम नहीं करता है, मरीज अपना होश खोने लगता है। उसे खून की उल्टियां होने लगती हैं। ये सारे लक्षण फैटी लीवर के ही होते हैं।

यह भी पढ़ें- ब्लड प्रेशर करना है कंट्रोल, तो खाएं बासी रोटी, जानें और भी कई फायदे

दो प्रकार के टेस्ट

फैटी लीवर टेस्ट दो प्रकार का होता है। नॉन इन्वेसिव और इन्वेसिव टेस्ट। नॉन इन्वेसिव टेस्ट में रोगी का रूटीन चेकअप किया जाता है। इस दौरान सबसे पहले रोगी के मोटापे की जांच होती है यानी बॉडी मास इंडेक्स कितना है, इसे चेक करते हैं। डायबिटीज या थायरॉइड की प्रॉब्लम है या नहीं इसकी जांच की जाती है। इसके अतिरिक्त लीवर फंक्शन टेस्ट होता है। इतनी चांज करने के बाद यदि पता चलता है कि फैटी लीवर काफी एडवांस स्टेज में पहुंच चुका है, तो रोगी का फाइब्रोस्कैन किया जाता है। इससे पता चल जाता है कि लीवर में कितना स्कार टिश्यू विकसित हो चुका है यानी लीवर कितना चोटिल हो चुका है। इन्वेसिव टेस्ट में इन सभी जांच के अलावा, यह सुनिश्चित करने के लिए कि रोगी के लीवर में फैट की कितनी मात्रा जमा हो चुकी है और फैटी लीवर किस स्टेज तक पहुंच चुका है, पेशेंट की लीवर बायोप्सी की जाती है। यह फाइनल टेस्ट है। इसे इन्वेसिव टेस्ट बोलते हैं, क्योंकि इस टेस्ट के लिए लीवर के अंदर नीडल डाली जाती है और उसके बाद लीवर की जांच की जाती है।

इलाज

ट्रीटमेंट में रोगी से मोटापे के साथ-साथ जितने भी रिस्क फैक्टर्स हैं, उन्हें कम करने को कहा जाता है। डायबिटीज है तो उसे कंट्रोल करने ही जरूरत होती है। थायरॉइड अगर अनकंट्रोल्ड है तो उसे कंट्रोल करने को कहते हैं। वजन कम करने के लिए रोगी को डायट सुधारने और एक्सरसाइज करने की सलाह दी जाती है। अर्ली स्टेज में फैटी लीवर का पता लगने पर इन सभी उपायों को अपनाने से लीवर में फैट की मात्रा कम हो जाती है। अगर इन सभी उपायों को अपनाने के बाद भी फैट की मात्रा कम नहीं होती है तो फिर मरीज को दवाई दी जाती है। वहीं, लेट स्टेज यानी सिरोसिस या कैंसर की स्टेज में पता चलने पर लीवर ट्रांसप्लांट करना पड़ता है।

चित्रस्रोत: Shutterstock.

About the Author

... Read More