
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Medically Verified By: Dr. Malini Saba
mental health (Image Credit- Gemini)
कुछ उद्योगों और कंपनियों में लागत कम करने के लिए कर्मचारियों की संख्या घटाई गई है और कुछ में छटनी जारी भी है, जिससे कई कर्मचारियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां आ गई हैं। जो काम 2-3 अलग-अलग लोगों द्वारा किया जाता था, अब वही काम एक व्यक्ति को करना पड़ रहा है। अगर इसे पॉजीटिव तरीके से देखें तो काम करने वाले व्यक्ति का कौशल बढ़ रहा है और वह मल्टीटास्कर बन रहा है। लेकिन बढ़ते टार्गेट, डेडलाइन पर काम देने, एक्स्ट्रा काम करना, की KRA (Key Result Area) में शामिल नहीं होने वाले काम और जो काम पद के अनुसार भी नहीं है, ऐसे काम करने से व्यक्ति के मन में दबाव पैदा होता है।
कई बार ऐसी स्थिति में एम्प्लॉयी न अपने डेली के टार्गेट पूरे कर पाता है और न ही सिर पर थोपा गया एक्स्ट्रा काम। हर काम में परफेक्ट बनने की कोशिश में कुछ नहीं हो पाता। क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट मालिनी सबा इस विषय पर सहमति भरते हुए कहती हैं कि "जी हां, कर्मचारी के सिर पर थोपा गया जबरदस्ती का काम मेंटल हेल्थ खराब होने का बड़ा कारण बन सकता है।" कैसे? आइए विस्तार से जानते हैं।
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की स्विचिंग कॉस्ट पर आधारित स्टडी कहती है कि जब कोई इंसान एक काम से दूसरे काम पर स्विच करता है, तो दिमाग को अपने नियमों और लक्ष्यों को फिर से सेट (Reboot) करना पड़ता है। इससे कार्यक्षमता घटती है और दिमाग जल्दी थकता है।
वहीं यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की 'Cost of Interrupted Work' रिसर्च के अनुसार, किसी काम में ध्यान भटकने या स्विच करने के बाद दोबारा उसी गहराई के साथ काम पर लौटने में औसतन 23 मिनट और 15 सेकंड का समय लगता है।
डॉक्टर कहती हैं, "इससे प्रोडक्टिविटी 40% तक गिरती है और साथ में मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन बढ़ता है। आप काम ज्यादा करते हैं, लेकिन दिन के अंत में लगता है "कुछ हुआ ही नहीं"।"
जब हर काम की जिम्मेदारी भी आपकी है और गलती की जिम्मेदारी भी आपकी होती है, तो ऐसे में दिमाग लगातार फाइट ऑर फ्लाइट मोड में रहता है। डॉ. सबा के अनुसार "लगातार मल्टी-टास्किंग करने वाले लोगों में कोर्टिसोल यानी स्ट्रेस हार्मोन का लेवल हाई रहता है। नतीजा यह होता है कि एम्प्लॉयी को नींद न आना, घबराहट, छोटी बात पर गुस्सा और काम से बोरियत होने लगती है। इसे ही बर्नआउट कहते हैं।" इससे वर्कर सही तरीके से काम नहीं कर पाते हैं और अपनी जॉब से फ्रस्ट्रेट हो जाते हैं।
ऑलराउंडर बनने की सबसे बड़ी समस्या यह है कि आप हर काम करते हैं, लेकिन किसी में भी एक्सपर्ट फील नहीं पाते हैं। जब लिखने का काम करने वाला सोशल मीडिया हैंडल करे, वीडियोज भी बनाए, मार्केटिंग का काम भी देखे और डेटा भी वही कलेक्ट करे। ऐसे में यह बहुत मुश्किल होता है कि सभी काम पूरे किए जा सकें। ऐसे में डॉक्टर कहती हैं, “हर जगह 70% देने से दिमाग को लगता है 'मैं कहीं का नहीं रहा'।" इससे सेल्फ-डाउट और इम्पोस्टर सिंड्रोम बढ़ते हैं। धीरे-धीरे आत्मविश्वास गिरने लगता है।
डॉक्टर कहती हैं कि मेंटल हेल्थ सिर्फ दिमाग का मुद्दा नहीं है। इसमें लगातार तनाव से सिरदर्द, गर्दन का दर्द, हाई BP और इम्यूनिटी कमजोर होती रहती है। वहीं घर आकर भी दिमाग "काम मोड" में रहता है। ऐसे में परिवार के साथ चिड़चिड़ापन और बात न करने का मन करता है। थका हुआ दिमाग गलत फैसले लेता है और एक गलती से पूरा दिन खराब लग सकता है।
डिस्क्लेमर: ऑलराउंडर बनना बुरी बात नहीं है। लेकिन अगर हर काम का ठेका आपने ले लिया है तो कीमत आपकी मेंटल हेल्थ चुका रही है। काम बांटना कमजोरी नहीं, समझदारी है। अगर आपको लगता है कि तनाव बहुत बढ़ गया है, तो देर न करें। अपने मैनेजर, एचओडी, डॉक्टर या मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल से सलाह लें।