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Written By: Anshumala | Published : February 14, 2020 12:05 PM IST
Having severe pre-existing medical problems is also a risk factors for postoperative death.
19 वर्षीय मुकुल की छाती में लोहे की रॉड घुस गई थी, जिसके कारण उसकी पोस्टिरियर चेस्ट वॉल पंक्चर हो चुकी थी। इलाज के लिए उसे तुरंत इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स के एमरजेन्सी विभाग में लाया गया। उसका बहुत ज्यादा खून बह गया था। मीडियास्टिनल ब्लीडिंग के ऐसे मामलों में कार्डियोपल्मोनरी बाइपास जैसे कार्डियक ऑपरेशन (Cardiac operation) की जरूरत होती है। ऐसे मामलों में कार्डियक फेलियर (Cardiac failure), डिसरिदमिया और इन्फेक्शन की संभावना बहुत अधिक होती है। शुरुआती सीटी में पाया गया कि छाती के दायीं ओर खून जमा था। लोहे की रॉड आर्योटा के बहुत नजदीक थी, जो दिल से खून को शरीर तक पहुंचाने वाली मुख्य वाहिका होती है। उसे तुरंत कार्डियक आईसीयू में भर्ती किया गया।
इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स (Apollo hospital) की हेड ऑफ डिपार्टमेन्ट- एमरजेन्सी डॉ. प्रियदर्शिनी सिंह ने कहा, ‘ऐसे मामलों में ‘गोल्डन आवर या ‘प्लैटिनम टेन मिनट्स’ बहुत अधिक मायने रखते हैं। एमरजेन्सी में मरीज के भर्ती होने के बाद मरीज को जल्द से जल्द सबसे अच्छा इलाज देना शुरू किया गया। सबसे बड़ी चुनौती थी कि हमें सभी प्रक्रियाएं मरीज को पेट के बल लेटाकर करनी थीं, क्योंकि उसकी पीठ में लोहे की रॉड थी। ऐसे मामलों में बाहरी चीज को तब तक नहीं छुआ जा सकता, जब कि मरीज ओटी में न पहुंच जाए, क्योंकि वास्तव में यह बाहरी चीज ही ब्लीडिंग को रोक कर रखती है। अगर इसे निकाल दिया जाए, तो बहुत अधिक खून बहने के कारण मिनटों में मरीज की मौत हो सकती है।’
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सर्जरी के बारे में बताते हुए हॉस्पिटल के सीनियर कन्सलटेन्ट, पीडिएट्रिक कार्डियो थोरेसिक सर्जन डॉ. मुथु जोथी ने कहा, ‘‘जांच के बाद हमने थोरेकोटोमी करने का फैसला लिया। सातवें इंटरकोस्टल को भेद कर रॉड शरीर में घुस गई थी, जो आर्योटा के बहुत नजदीक थी और आर्योटा पर बड़ा खून का थक्का था। इसके लिए आर्योटा को रिपेयर किया गया। इसके अलावा फेफड़े के बाएं कोने में भी चोट थी। इसे सावधानी से रिपेयर किया यगा। छाती की दीवार में पसलियों के बीच चीरा लगाया गया। दो पसलियों के बीच सामने से पिछले हिस्से तक यह चीरा लगाया गया। इसके बाद हमने चेस्ट ट्यूब डाली ताकि खून या हवा छाती में जमा न हो।’
इसके बाद मरीज को ऑक्सीजन पर रख गया। डायफ्राम के एल डोम पर लिनीयर टियर था, जिसे रिपेयर किया गया। छाती में 800 सीसी खून था, जिसे निकालने के लिए A R ICD डाली गई। ब्लीडिंग के सभी रास्ते बंद किए गए और छाती की पर्तों को बंद किया गया। इसके बाद मुकुल धीरे-धीरे दवाओं से ठीक होने लगा और सर्जरी के तीसरे दिन उसे छुट्टी दे दी गई।
मुकुल के पिता ने कहा, ''मुकुल को तुरंत इलाज की जरूरत थी। डॉ. प्रियदर्शिनी सिंह और डॉ. मुथु जोथी ने तुरंत उसकी देखभाल की। जब हमें बताया कि सर्जरी सफल हुई है, तो हमारे पास डॉक्टरों का आभार व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं थे। इस हॉस्पिटल्स के डॉक्टरों ने मेरे बेटे को नया जीवन दिया है।''