
मुकेश शर्मा
मुकेश शर्मा दिल्ली यूनिर्विसिटी से जर्नलिज्म डिग्री होल्डर हैं और पिछले 8 साल से Health Journalism से जुड़े हुए ... Read More
Written By: Mukesh Sharma | Published : June 13, 2022 11:37 AM IST
हर साल 13 जून को विश्व अंतर्राष्ट्रीय रंगहीनता जागरूकता दिवस यानी इंटरनेशनल एल्बिनिज्म अवेयरनेस डे (Albinism Awareness Day) के रूप में मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस बीमारी के बारे में जानकारी देना होता है, ताकि इससे ग्रस्त लोगों की परेशानियों को दूर किया जा सके। दरअसल एल्बिनिज्म एक ऐसी बीमारी है, जिसमें त्वचा का रंग सफेद पड़ जाता है और इसलिए हिंदी में इस रोग को रंगहीनता और धवलता रोग भी कहा जाता है। एल्बिनिज्म के रोगियों को कई बार पक्षपात व भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। काफी लोग इसे छूआछूत का रोग मान लेते हैं और उन्हें लगता है कि यदि उन्होंने किसी ऐसे व्यक्ति को छू लिया तो उनकी त्वचा भी सफेद पड़ने लग जाएगी। हालांकि यह पूरी तरह से एक मिथक है और ऐसे ही मिथकों को दूर करने के लिए हर साल एल्बिनिज्म अवेयरनेस डे मनाया जाता है, ताकि इसके रोगियों को किसी प्रकार के मानसिक दबाव का सामना न करना पड़े। चलिए जानते हैं कि क्यों एल्बिनिज्म में स्किन का रंग सफेद पड़ जाता है (Albinism causes in hindi)।
हमारी त्वचा को रंग प्रदान करना मेलेनिन का काम होता है। मेलेनिन हमारे शरीर में पाया जाने वाला एक प्रकार का अमीनो एसिड होता है, जो त्वचा, बाल और आंखों को रंग प्रदान करता है (Melenin functions)। इसलिए आपके शरीर में मेलेनिन जितना अधिक होता आपकी त्वचा, बाल और आंखों का रंग उतना ही गहरा होगा। एल्बिनिज्म के मरीजों की उन जीन में गड़बड़ी होती है, जो शरीर में मेलेनिन के उत्पादन को कंट्रोल करती है। इस कारण से मेलेनिन ठीक से बन नहीं पाता है और त्वचा रंगहीन हो जाती है।
एल्बिनिज्म कोई फैलने वाली बीमारी नहीं बल्कि सिर्फ एक जेनेटिक कंडीशन है, जिसका मतलब है कि यह सिर्फ उसी व्यक्ति तक सीमित रहती है, जो इसके साथ ही जन्म लेते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि एल्बिनिज्म के रोगी की त्वचा को छूने पर या उसके इस्तेमाल किए गए कपड़ों को पहनने पर उन्हें भी यह बीमारी लग सकती है, जो की एक मिथक है। एल्बिनिज्म संक्रामक नहीं है।
एल्बिनिज्म के रोगी की त्वचा पूरी तरह से सफेद पड़ जाती है और इस कारण से उन्हें कई बार भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। स्कूल से लेकर ऑफिस तक कई बार उसे सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। दरअसल, इस रोग के बारे में संपूर्ण जानकारी न होने के कारण लोग एल्बिनिज्म से ग्रस्त रोगियों संपर्क करने से बचते हैं।
भारत में लगभग 1 लाख से भी ऊपर एल्बिनिज्म के रोगी रहते हैं, जिन्हें काफी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। भारत में भी इस रोग की प्रति जागरूकता की काफी कमी देखी गई है और यही कारण है कि इसके रोगी कई बार समाज में अलग-थलग पड़ जाते हैं।
इन स्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही एल्बिनिज्म अवेयरनेस डे मनाया जाता है, ताकि लोगों को इस रोग की पूर्ण जानकारी मिल पाए। अगर आपके आसपास कोई एल्बिनिज्म रोगी रहता है, तो आपको उससे अच्छे संबंध बनाकर रखने चाहिए और आवश्यकता में उसकी मदद करनी चाहिए।