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कुछ दिनों पहले ही एक स्टडी में यह बात सामने आयी कि ब्रेस्ट एक्ज़ामिनेशन की मदद से महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर से होने वाली लगभग 50% मौतें रोकी जा सकती हैं। टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई (Tata Memorial Hospital, Mumbai) की यह स्टडी बीएमजे (BMJ) में प्रकाशित की गयी। लगभग 20 वर्षों तक चली इस स्टडी में पाया गया कि, अगर ट्रेनिंग प्राप्त और सही तकनीकों की मदद से क्लिनिकल ब्रेस्ट एक्जामिनेशन (Clinical Breast Exams) किए जाते हैं तो इससे 50 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर से बचाव की संभावना 30% तक बढ़ सकती है। यही नहीं एडवांस स्टेज वर कैंसर का पता लगने के बाद सर्वाइवल के चांस भी काफी अधिक देखे गए।
ब्रेस्ट कैंसर केवल भारत ही नही बल्कि दुनियाभर में महिलाओं में पाया जाने वाला सबसे कॉमन प्रकार का कैंसर है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 में वैश्विक स्तर पर ब्रेस्ट के 2.3 मिलियन नये मामले सामने आए थे वहीं, 685,000 महिलाओं की मृत्यु ब्रेस्ट कैंसर की वजह से हो गयी थी। ब्रेस्ट कैंसर से बचाव के लिए जहां जल्द से जल्द बीमारी का पता लगाना महत्वपूर्ण है। लेकिन, दुनियाभर में 90 प्रतिशत से अधिक महिलाओं को अभी तक ब्रेस्ट कैंसर के निदान के लिए सही सुविधाएं उपलब्ध नहीं है या समय पर उनका डायग्नोसिस नहीं हो पाता।
मैमोग्राफी (Mammography) ब्रेस्ट कैंसर की जल्द पहचान और ब्रेस्ट कैंसर से बचाव का सबसे अच्छा तरीकाहै। अमेरिका जैसे विकसित और अमीर देशों में मैमोग्राफी करानेवाली महिलाओं की संख्या 39 मिलियन सालाना तक होती है।
मैमोग्राफी महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण टेस्ट है लेकिन, फिर भी अधिकांश महिलाएं रेग्यूलर मैमोग्राफी नहीं करातीं। इसके पीछे कई कारण देखे गए हैं। महिलाओं में जहां मैमोग्राफी से जुड़ी सही जानकारी की कमी है वहीं, एडवांस और ट्रेनिंग प्राप्त टेक्निशियन्स और मैमोग्राफी सेंटर्स की कमी भी एक बड़ा कारण है। नियमित मैमोग्राफी कराना महिलाओं के लिए कई लिहाज से फायदेमंद साबित हो सकता जैसे-
मैमोग्राफी कराने सेब्रेस्ट कैंसर का पता जल्द से जल्द लग सकता है।
ब्रेस्ट में गांठ, फ्लूइड बढ़ने या माइक्रोकैल्सीफिकेशन का पता लगाने में भी मैमोग्राफी बहुत मददगार है।
मैमोग्राफी की प्रक्रिया में केवल 10 मिनट का समय लगता है और इसमें रेडिएशन की मदद से ब्रेस्ट में होने वाले बदलावों को समझने और ट्यूमर जैसी समस्याओं का पता लगाने में मदद हो सकती है।
मैमोग्राफी के दौरान मशीन में दो चपटी प्लेट्स की मदद से जांच की जाती है। टेस्ट के दौरान जांच के लिए ब्रेस्ट को निचली प्लेट पर रखा जाता है। उसके बाद दूसरी प्लेट को नीचे ले आकर टेस्ट पूरा किया जाता है। इस दौरान मैमोग्राफर या टेक्निशियन मरीज को गहरी सांस लेने की सलाह देता है। स्क्रीनिंग की प्रक्रिया में दोनों ब्रेस्ट के एक्स-रे निकाले जाते हैं और इन्हीं एक्स-रे रिपोर्ट्स के आधार पर मरीज में ट्यूमर और ब्रेस्ट कैंसर होने का पता चलता है।
40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को साल में एक बार और 50 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को हर 6 महीने बाद मैमोग्राफी कराने की सलाह दी जाती है।