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प्रेगनेंसी हर महिला के लिए एक विशेष पल होता है लेकिन गर्भ के विकास में किसी प्रकार की त्रुटि, विशेष रूप से जब यह हृदय को लक्षित करती है, तो एक दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति बन जाती है। इस वजह से शिशु के लिए विभिन्न समस्याएं उत्पन्न हो सकती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रत्येक सौ शिशुओं में से लगभग एक शिशु के हृदय रोग के साथ जन्म लेता है। साल 2018 तक, भारत में प्रति वर्ष जन्म लेने वाले 2 करोड़ जीवित बच्चों में से लगभग 2,40,000 बच्चे जन्मजात हृदय रोग (सीएचडी) के साथ जन्म लेते हैं। इसके अतिरिक्त सीएचडी वाले प्रत्येक चार शिशुओं में से एक नवजात शिशु 'गंभीर' सीएचडी के साथ जन्म लेता है। इस स्थिति से कैसे निपटा जा सकता है बता रही हैं छत्तीसगढ़ के नया रायपुर स्थित श्री सत्य साईं संजीवनी हॉस्पिटल की पीडियाट्रिक कार्डियक सर्जरी की एचओडी (HOD) डॉ. रागिनी पाण्डेय ।
जबकि बात बाल हृदय चिकित्सा सेवा की होती है तो सुविधाएं पूर्णतया अपर्याप्त हैं और अगर उपलब्ध हैं भी, तो सामान्यतया पहुंच से परे हैं। इसलिए जरूरी है कि भारत के अधिकांश निजी चिकित्सालयों में इसके खर्च में कमी आए। ओपन हार्ट सीएचडी सर्जरीकी लागत लगभग 3,00,000 – 5,00,000 लाख रुपये है। आज, सीएचडी शल्य चिकित्सा की आवश्यकता वाले शिशुओं में से मात्र 2-3% को ही यह सुविधा प्राप्त होती है, और शेष शिशुओं की स्थिति या तो ज्ञात नहीं हो पाती है और सुविधाएं अनुपलब्ध होती हैं अथवा उनके सामर्थ्य से परे होती हैं, जिसके परिणामस्वरूप निर्दोष जीवन अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
विगत वर्षों में, चिकित्सालयों में होने वाले प्रसव की दर उल्लेखनीय रूप से बढ़कर 70% से अधिक हो गई है। विशेषकर ग्रामीण और अर्ध-नगरीय केंद्रों में, नवजात शिशुओं की चिकित्सालय से छुट्टी के समय उनका सीएचडी पल्स ऑक्सीमेट्री परीक्षण बहुत ही कम किया जाता है। गंभीर सीएचडी पीड़ित ये नवजात शिशु अधिकांशतः निदान रहित ही घर चले जाते हैं।3
भारत में 139 करोड़ की जनसंख्या के लिए केवल 300 बाल्य हृदय रोग विशेषज्ञ हैं, जिनका अनुपात प्रति 45,00,000 जनसंख्या पर एक है। बाल्य हृदय शल्य चिकित्सकों के लिए तुलना और भी निराशाजनक है। बाल्य हृदय गहन चिकित्सकों के रूप में योग्य कर्मी बहुत कम हैं, और उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए कोई स्वदेशी प्रणाली भी नहीं है।
भारत में बाल्य हृदय चिकित्सा केंद्रों का असमान भौगोलिक वितरण भी दृष्टिगोचर होता है। विगत 15 वर्षों में जो केंद्र स्थापित किए गए हैं, वे भारत के दक्षिणी राज्यों में हैं। लेकिन, भारत के मध्य और पूर्वी भू-भागों में इसकी आवश्यकता अधिक है, जहां जन्म दर अधिक है और घरेलू उत्पाद कम हैं। गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य संरक्षण केंद्रों की कमी वाले भारत के उत्तरी भू-भागों (जैसे कि उत्तर प्रदेश और बिहार) की अपेक्षा भारत के दक्षिणी भू-भागों में 60 से अधिक केंद्र हैं, जहां रोग की प्रबलता कम है।
भारत की लगभग 30% अथवा 42 करोड़ जनसंख्या किसी भी प्रकार के स्वास्थ्य बीमा से वंचित है। बाल हृदय चिकित्सा में इस विशाल अंतर को सामंजस्य रूप से संबोधित करने के लिए हमें निवारक तथा निर्देशित चिकित्सा एवं शल्य-चिकित्सा तथा दीर्घकालीन के साथ अनेक गुणवत्ता युक्त संस्थान स्थापित करने की आवश्यकता होगी, जो वहनीय एवं गुणवत्ता युक्त हृदय चिकित्सा प्रदान करने के उत्कृष्ट केंद्र होंगे।