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Medically Verified By: Dr. Shailly Kapur
How Many Ultrasound Scans Are Needed in Pregnancy?
Pregnancy Sonograpghy : हर एक महिला के लिए प्रेग्नेंसी एक खास सफर होता है। इस सफर में मां और शिशु दोनों की सेहत पर लगातार नजर रखना जरूरी होता है। इसके लिए डॉक्टर नियमित रूप से सोनोग्राफी यानी अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह देते हैं। यह एक अहम जांच मानी जाती है। यह जांच गर्भ में पल रहे शिशु की ग्रोथ, पोजिशन और किसी भी संभावित समस्या का समय रहते पता लगाने में मदद करती है।अब सवाल यह उठता है कि प्रेगनेंसी के दौरान सोनोग्राफी कितनी बार कराना चाहिए और कौन सा अल्ट्रासाउंड सबसे जरूरी होता है। इसे आसान भाषा में समझा जा सकता है। इस विषय को अच्छे से समझने के लिए हमने गुरुग्राम स्थित नारायणा हॉस्टिल की ऑब्ट्रिट्रिस्ट एंड गायनोकॉलोजिस्ट, सीनियर कंसल्टेंट डॉत्टर शैली कपूर से बातचीत की है। आइए डॉक्टर से जानते हैं प्रेग्नेंसी में कब और कितनी बार सोनोग्राफी की जरूरत होती है?
प्रेग्नेंसी के दौरान कुछ सोनोग्राफी बहुत ही जरूरी होती है। मुख्य रूप से 4 सोनोग्राफी की जरूरत होती है। इसके अलावा गर्भवती महिला की स्थिति और भ्रूण में पल रहे बच्चे की स्थिति के आधार पर भी सोनोग्राफी की संख्या निर्भर करती है। कुछ विशेष स्थितियों में अतिरिक्त सोनोग्राफी की जरूरत हो सकती है। ऐसे में हर गर्भवती महिला की सोनोग्राफी कितनी होगी, यह कहना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। क्योंकि हर प्रेग्नेंसी की स्थिति अलग हो सकती है।
डॉक्टर शैली का कहना है कि गर्भावस्था के शुरुआती 6 से 9 हफ्तों के बीच पहली सोनोग्राफी कराई जाती है। इसे डेटिंग स्कैन (What is Dating Scan) भी कहा जाता है। इस जांच से यह कन्फर्म किया जाता है कि प्रेगनेंसी सही जगह पर है और भ्रूण की हार्टबीट आ रही है या नहीं। इस समय शिशु की उम्र यानी गर्भकाल का सही अनुमान भी लगाया जाता है। अगर किसी महिला को ब्लीडिंग या दर्द की शिकायत होती है, तो यह स्कैन और भी जरूरी हो जाता है।
पहली तिमाही के अंत में 11 से 14 हफ्तों के बीच एक खास सोनोग्राफी की जाती है, जिसे NT स्कैन कहा जाता है। यह जांच शिशु में किसी तरह की क्रोमोसोमल असामान्यता जैसे डाउन सिंड्रोम के जोखिम का आकलन करने में मदद करती है। इस स्कैन में शिशु की गर्दन के पीछे फ्लूइड की मोटाई मापी जाती है। यह छोटा सा टेस्ट भविष्य की बड़ी समस्याओं का संकेत दे सकता है, इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जाता है। यह बहुत ही जरूरी स्कैन मानी जाती है।
प्रेगनेंसी के 18 से 22 हफ्तों के बीच किया जाने वाला एनोमली स्कैन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान शिशु के शरीर के हर अंग की बारीकी से जांच की जाती है। दिल, दिमाग, रीढ़ की हड्डी, किडनी और हाथ-पैर जैसे सभी अंगों की संरचना को देखा जाता है। अगर किसी तरह की जन्मजात समस्या होती है, तो इसका पता इसी स्कैन में चलता है। इस स्कैन के जरिए यह सुनिश्चित होता है कि शिशु की ग्रोथ सही तरीके से हो रही है या नहीं।
28 से 32 हफ्तों के बीच एक और सोनोग्राफी की जाती है, जिसे ग्रोथ स्कैन कहा जाता है। इसमें शिशु का वजन, पोजिशन और प्लेसेंटा की स्थिति देखी जाती है। अगर मां को हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या अन्य कोई जोखिम होता है, तो डॉक्टर अतिरिक्त स्कैन की सलाह देते हैं। इससे डिलीवरी की प्लानिंग में मदद मिलती है।
हर प्रेगनेंसी अलग होती है, इसलिए कुछ मामलों में डॉक्टर ज्यादा सोनोग्राफी कराने की सलाह देते हैं। जैसे-
कब-कब अतिरिक्त सोनोग्राफी की जरूरत पड़ती है?
इन स्थितियों में नियमित जांच के अलावा अतिरिक्त अल्ट्रासाउंड जरूरी हो जाता है।
डॉक्टर कहती हैं कि अक्सर यह चिंता रहती है कि बार-बार सोनोग्राफी कराने से शिशु को नुकसान तो नहीं होता? मेडिकल साइंस के अनुसार, अल्ट्रासाउंड एक सुरक्षित प्रक्रिया मानी जाती है। यह एक्स-रे की तरह रेडिएशन का इस्तेमाल नहीं करता है, बल्कि साउंड वेव्स के जरिए इमेज बनाता है। इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार कराई गई सोनोग्राफी सुरक्षित रहती है।
प्रेगनेंसी के दौरान सोनोग्राफी सिर्फ एक जांच नहीं, बल्कि मां और शिशु की सुरक्षा का अहम हिस्सा होती है। सही समय पर कराई गई जांच कई संभावित समस्याओं को पहले ही पहचानने में मदद करती है। इसलिए जरूरी होता है कि हर गर्भवती महिला अपनी जांच का शेड्यूल डॉक्टर की सलाह के अनुसार फॉलो करे। समय पर किया गया हर अल्ट्रासाउंड एक स्वस्थ और सुरक्षित डिलीवरी की दिशा में एक मजबूत कदम साबित होता है।
Disclaimer : प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।