Immunization कितना जरूरी है? एक्सपर्ट से जानिए किस उम्र में हो सकता है इम्यूनाइजेशन

इम्यूनाइजेशन एक काफी जरूरी प्रक्रिया है क्योंकि यह आपको कई खतरनाक बीमारियों के रिस्क से बचाता है।

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Written By: Atul Modi | Published : April 24, 2023 9:10 PM IST

इम्यूनाइजेशन (टीकाकरण) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आपको कुछ संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए वैक्सीन लगाई जाती है। इस प्रक्रिया के द्वारा आपको संक्रमण फैलाने वाले एजेंट जैसे वायरस, बैक्टीरिया और प्रोटोजाआ आदि से सुरक्षित रखा जाता है। आपने अक्सर देखा होगा कि बचपन में हमें कई बीमारियों के टीके लगते हैं। किसी में एक टीका लगता है तो किसी में दो। यह प्रक्रिया ही इम्यूनाइजेशन कहलाती है। इन्हें लगवाना काफी जरूरी होता है।

इम्यूनाइजेशन क्यों जरूरी है?

इम्यूनाइजेशन एक काफी जरूरी प्रक्रिया है क्योंकि यह आपको कई खतरनाक बीमारियों के रिस्क से बचाता है। WHO के आंकड़ों के मुताबिक इस प्रक्रिया के द्वारा हर साल लगभग 3.5 से 5 मिलियन लोगों की जान कुछ बीमारियों से कारण जाने से बच जाती है। ऐसी बीमारियों में टेटनस, इन्फ्लूएंजा और मीजल्स आदि शामिल हैं। इसे एक बेसिक मानव अधिकार कहा जा सकता है और यह प्रक्रिया हर मनुष्य तक उपलब्ध होनी काफी जरूरी होती है। यह हेल्थ केयर को लेकर एक प्राथमिक जरूरत मानी जाती है।

किस उम्र में इम्युनाइजेशन हो सकता है?

  • इम्यूनाइजेशन के लिए हर वैक्सीन के लिए अलग से उम्र ग्रुप और डोज तय किया जाता है। कई बार कुछ वैक्सीन के एक से अधिक डोज भी होते हैं जिसे एक न्यूनतम समय पूरा होने के बाद ही लगाया जाता है। इम्यूनाइजेशन में अलग अलग वर्ग के लोग शामिल होते हैं।
  • कुछ वैक्सीन बच्चे के पैदा होने से और उसके 18 महीने तक के होने की उम्र के बीच लगाया जाता है। इसमें हेपेटाइटिस बी, टेटनस, मीजल्स आदि जैसी बीमारी शामिल होती हैं।
  • इसके बाद कुछ वैक्सीन 18 महीने से लेकर 18 साल के बच्चों तक लगाई जाती है। इसमें अधिकतर पहली लगाई गई वैक्सीन के तीसरे या दूसरे डोज को शामिल किया जाता है।
  • रोटा वायरस और इन्फ्लूएंजा टाइप बी जैसी बीमारियों से बचाने वाली वैक्सीन इसी उम्र वर्ग के लोगों को दी जाती है। इस उम्र वर्ग को पोलियो वायरस की भी तीसरी डोज दी जाती है। इसमें अधिकतर वैक्सीन 16 साल के बच्चों तक को ही दी जाती है।

क्या ओवर इम्यूनाइजेशन आपकी सेहत के लिए हानिकारक है?

ओवर इम्यूनाइजेशन का मतलब है कि जब जरूरत से ज्यादा वैक्सीन के डोज हम ले लेते हैं तो इससे ओवर इम्यूनिटी का खतरा होता है जो शरीर के लिए हानिकारक है। जैसा कि हम जानते हैं कि बचपन में बच्चों को कई सारी बिमारियों से बचाने के लिए उन्हें कई तरह की वैक्सीन दी जाती हैं। इतनी ज्यादा वैक्सीन का विकास होना भी हमारे लिए खतरनाक होता है। इस तरह की वैक्सीन लगवाने के कारण हमें ओवर इम्यूनाइजेशन का खतरा रहता है। बार-बार एंटी जेनिक चैलेंज का रिपीट होना हाइपर सेंसटिविटी रिएक्शन का कारण बन सकता है जो किसी भी व्यक्ति के लिए खतरनाक हो सकता है। हर वैक्सीन के लिए एक निर्धारित समय और उम्र के साथ साथ डोज की निर्धारण किया जाता है। डोज के बीच में एक न्यूनतम समय भी मेंटेन करना पड़ता है। 7 संक्रामक बीमारियों से बचाने के लिए नियमित रूप से एक्टिव इम्यूनाइजेशन किया जाता है। इससे हाइपर इम्यूनाइजेशन का खतरा बढ़ सकता है।

वैक्सीन कैसे काम करती है?

टीकों में एक खास तरह के एंटीजन के कमजोर या बेकार हिस्से होते हैं जो शरीर के अंदर इम्यूनिटी को ट्रिगर करते हैं। नए टीकों में एंटीजन बनाने का ब्लूप्रिंट होता है। यह रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली को उतनी ही प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित करता है जिससे रोग से लड़ा जा सके। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए कई तरह की वैक्सीन होती हैं जो साप्ताहिक या मासिक रूप से दी जाती हैं।

वैक्सीन के प्रकार

अलग-अलग तरह के टीके उपलब्ध है जो कीटाणुओं से लड़ने की क्षमता और बीमारी की गंभीरता के आधार पर दिए जाते हैं। इन टीकों को बनाने के लिए बॉडी की प्रतिरोधक क्षमता किस प्रकार काम करती है, किस तकनीक से बनाया जा रहा है, किन कारकों पर आधारित है, ध्यान में रखते हुए टीके बनाए जाते हैं। जो इस प्रकार हैं

  • इन एक्टिव वैक्सीन
  • लाइव अटैंयूएटेड वैक्सीन
  • मैसेंजर आरएनए
  • पॉलीसेट राइड वैक्सीन
  • वायरल वेक्टर वैक्सीन
  • टॉक्सोइड वैक्सीन
  • रिकांबिनेंट

(Inputs By: Dr Vikramjeet Singh- Senior Consultant, Internal Medicine, Aakash Healthcare, New Delhi)