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Written By: Anshumala | Updated : November 1, 2021 8:32 PM IST
Every year, so many people get injured in the eyes due to the crackers. Since our eyes are our window to the world, they require special attention. This season, do remember the following by Dr Poonam Yadav, Consultant - Opthalmology, Manipal Hospital, Sarjapur.
Diwali 2021: दिवाली 4 नवंबर को है। हर किसी को रोशनी और खुशियों के इस त्योहार (Diwali) का बेसब्री से इंतजार होता है। लेकिन, कोरोना महामारी (Corona Pandemic) के दौर में हर त्योहार फीका बीत रहा है। हालांकि, कोरोना के मामले पहले से काफी कम हुए हैं, जिसके बाद लोगों में दिवाली को सेलिब्रेट करने का उत्साह अभी से ही मार्केट में नजर आने लगा है। लॉकडाउन के कारण लगे झटके के बाद अब अर्थव्यवस्था भी पटरी पर आ रही है, जिसके साथ ही अब उत्साह भी बढ़ रहा है। हालांकि, कोरोना के मामले इस त्योहार को सेलिब्रेट करने में बढ़े ना, इसके लिए सभी कोविड प्रोटोकॉल को फॉलो करना भी जरूरी है। यशोदा ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स (दिल्ली-एनसीआर) और सीड्स ऑफ इनोसेंस एंड जेनेस्ट्रिंग डायग्नोस्टिक सेंटर्स (दिल्ली-एनसीआर) में ग्रुप डायरेक्टर और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. रजत अरोड़ा बता रहे हैं दिवाली पर किस तरह से पटाखे पहुंचाते हैं पर्यावरण और सेहत को नुकसान...
दीवाली पर बच्चे तो क्या कुछ बड़े भी पटाखे फोड़े बिना नहीं रहते हैं। ऐसे में सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को होता है। हालांकि, हाल के वर्षों में कुल वायु प्रदूषण का मात्र 5 % होने के बावजूद हवा में धातुओं, धुएं और धूल का गुबार एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। वाहनों के उत्सर्जन, औद्योगिक गतिविधियों और निर्माण के कारण प्रदूषण का स्तर पहले से ही बहुत अधिक होने के कारण पटाखे फोड़ने की कोई जगह नहीं बचती है।
पटाखों में कई तरह के जहरीले पदार्थ होते हैं, जो सेहत को नुकसान (Diwali-crackers side effects) पहुंचाते हैं। इनके जलने पर 2.5 पीएम उत्पन्न होता है और पटाखों से पैदा होने वाला प्रदूषण हवा को जहरीला बना देता है, जिससे शुद्ध हवा के अभाव में पर्यावरण कुछ समय तक सांस लेने लायक नहीं रहता है। ऐसे में दिवाली के दिन वायु की गुणवत्ता और खराब हो जाती है। पराली जलाने से भी हवा की गुणवत्ता खराब होती है। पटाखे से होने वाले वायु प्रदूषण और कृषि अवशेष जलाने से वायु की गुणवत्ता गंभीर और खतरनाक स्तर तक खराब हो जाती है, जिससे आबो-हवा गैस चैंबर में परिवर्तित हो जाती है।
अधिकांश लोगों के फेफड़े पहले से ही जहरीली हवा में सांस लेने से कमजोर हो गए हैं। उसके बाद कोविड-19 महामारी के कारण भी खतरनाक वायरस ने फेफड़ों पर ही अटैक किया। उसका परिणाम ये है कि अभी भी जो कोरोना से ठीक हो चुके हैं कोविड के बाद की जटिलताओं (Post-Covid Complications) से जूझ रहे हैं, जबकि अस्थमा, ब्रोंकाइटिस (कंठ की सूजन), सीओपीडी और अन्य श्वसन संबंधी रोग वाले लोग स्वच्छ हवा की हर छोटी मात्रा के लिए हांफ रहे हैं, जैसा पहले नहीं था।
हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि विश्व स्तर पर 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 11 भारत में हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि दुनिया के इस हिस्से में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या 20 लाख है। इस जहरीली आबो-हवा में सांस लेने के लिए हांफते हुए, हमें वायु प्रदूषण नियंत्रण नीति में बदलाव की सख्त जरूरत है। इस बीच, जिस तरह से बाजारों में उत्सव के मौके पर भीड़ उमड़ रही है, बिना मास्क वाले चेहरे नजर आ रहे हैं, वह आशंकित करने वाले हैं। दुनिया भर में रूस में कोरोनावायरस के कारण मौतें रिकॉर्ड तोड़ रही हैं। ब्रिटेन में कोविड-19 का डेल्टा-प्लस वेरिएंट कहर बरपा रहा है। क्या यह तीसरी लहर का संकेत है? यह तो केवल समय ही बताएगा।