
विद्या शर्मा
विद्या शर्मा को डिजिटल मीडिया में लगभग 3 साल का अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता ... Read More
Medically Verified By: Dr Samir Kubba
national doctor's day (Image Credit- ChatGPT)
National Doctors' Day 2026: जब भी हम डॉक्टर के क्लीनिक या बड़े अस्पतालों में जाते हैं तो वहां लंबी भीड़ लगी होती है। डॉक्टर आए दिन सैकड़ों नए चेहरे देखते हैं। कोई अपनी बीमारी लेकर आता है तो कोई दर्द की शिकायत। वहीं अगर हम साइकोलॉजिस्ट्स की बात करें तो वह न जाने कितने लोगों की जिंदगी के दुख, स्ट्रेस और अन्य परेशानियों को सुलझाते हैं। डॉक्टर हर मरीज की बात बड़े ही ध्यान से सुनते हैं। मरीज को उम्मीद देते हैं कि वह ठीक हो जाएगा। लेकिन इन सबसे इतर, क्या आपने कभी सोचा है कि रोजाना नए केस देखने वाले और लोगों का इलाज करने वाले डॉक्टर अपनी मेंटल हेल्थ का ख्याल कैसे रखते होंगे?
पूरे दिन लगातार मरीजों को देखना, कभी एमरजेंसी में इलाज के लिए जाना, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को ठीक करना, कई घंटों की ड्यूटी, नींद भी पूरी न होना और हर समय सही फैसला लेने का प्रेशर डॉक्टरों पर बना रहता है। यह सब डॉक्टरों की मानसिक सेहत पर गहरा असर डाल सकता है। सफेद कोट पहनने वाले और लोगों की जान बचाने वाले डॉक्टरों को अक्सर मजबूत समझ लिया जाता है, जबकि हम इस बात को अनदेखा ही कर देते हैं कि वह भी इंसान हैं, उनकी भी फीलिंग्स हैं और वह भी स्ट्रेस, टेंशन और खुद को इमोशनली वीक महसूस कर सकते हैं।
हाल के वर्षों में मेंटल हेल्थ पर काफी जोर दिया जा रहा है, तो क्यों न डॉक्टर्स की मेंटल हेल्थ पर भी बात की जाए। आइए जानें कि वह अपनी मेंटल हेल्थ का ख्याल कैसे रखते हैं।
डॉक्टर सिर्फ मरीजों का इलाज ही नहीं करते हैं, बल्कि उन्हें इमोशनली और मेंटली भी सपोर्ट करते हैं। लेकिन जब बात उनकी मेंटल हेल्थ की आती है तो चीजों को अनदेखा कर दिया जाता है। ऐसे कई कारण हैं, जो डॉक्टरों की मेंटल हेल्थ को प्रभावित करते हैं, जैसे-
कई डॉक्टर बताते हैं कि कुछ केस ऐसे होते हैं जो लंबे समय तक उनके दिमाग में बने रहते हैं। जैसे इलाज के दौरान किसी युवा मरीज को खो देना, किसी बच्चे की गंभीर बीमारी या किसी परिवार की बेबसी को देखना उन्हें इमोशनली झकझोर कर रख सकता है।
डॉक्टर जैस्मीन अरोड़ा
आर्टेमिस हॉस्पिटल्स की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर जैस्मीन अरोड़ा ने रोजाना की थकान, स्ट्रेस और वर्क प्रेशर से मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने के लिए 5 तरीके बताए हैं। इन्हें वह अपनी मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाए रखने के लिए अपनाती हैं।
पिंकी प्रॉमिस में कंसल्टेंट गायनेकोलॉजिस्ट और हार्मोनल हेल्थ एक्सपर्ट, डॉक्टर यश बहुगुणा कहते हैं कि: "डॉक्टर्स डे न सिर्फ समाज में डॉक्टरों के योगदान को पहचानने का मौका है, बल्कि यह उनकी अपनी सेहत और भलाई के महत्व को समझने का भी अवसर है। क्लिनिकल प्रैक्टिस में, हम अक्सर मरीजों को प्रिवेंटिव केयर को प्राथमिकता देने, समय पर इलाज कराने और बीमारी के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। मैं मानता हूं कि हम सभी डॉक्टरों को भी इसी सलाह का पालन करना चाहिए। इस पेशे की मांगों के कारण अक्सर लंबे समय तक काम करना, तनाव और थकान दिनचर्या का हिस्सा बन जाते हैं, जिससे हम अपनी सेहत को नजरअंदाज करना आसान हो जाता है।"
डॉक्टर यश बहुगुणा: डॉक्टरों का समर्थन करें, सिर्फ तारीफ नहीं
वह आगे कहते हैं कि "हम डॉक्टरों का समर्थन करने का मतलब सिर्फ उनकी तारीफ करना नहीं है। इसके लिए ऐसे कार्यस्थल बनाने की जरूरत है जो शारीरिक और मानसिक सेहत को बढ़ावा दें, बर्नआउट को कम करें और हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स के लिए जरूरत पड़ने पर मदद मांगना आसान बनाएं। बेहतर देखभाल प्रदान करने के लिए एक स्वस्थ मेडिकल वर्कफोर्स बहुत जरूरी है और जैसे-जैसे हेल्थकेयर का दायरा बढ़ रहा है, दूसरों की देखभाल करने वालों की अपनी सेहत का ध्यान रखना भी उतनी ही महत्वपूर्ण प्राथमिकता होनी चाहिए।'
धर्मशिला नारायणा अस्पताल के कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर समीर कुब्बा अपना एक्सपीयरेंस शेयर करते हुए कहते हैं कि "डॉक्टर के तौर पर हम रोजाना कई मरीजों का इलाज करते हैं। मरीजों के इलाज के बाद जो भी नतीजे आते हैं, वो हमें प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में, भगवद गीता का यह श्लोक हमारे लिए एक सुरक्षा-कवच की तरह काम करता है: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
हमें अपने काम और फर्ज को निभाने का अधिकार है, लेकिन नतीजों पर हमारा कोई कंट्रोल नहीं होता। हमें अपना फर्ज पूरी ईमानदारी से निभाना चाहिए और काम से जी नहीं चुराना चाहिए। कई बार मरीज ठीक हो जाते हैं, तो कई बार वे ठीक नहीं हो पाते।
डॉक्टर समीर कुब्बा
"इसलिए, जब भी मुझे कोई अच्छी या बुरी भावना महसूस होती है तो मैं जल्द से जल्द उस भावना से बाहर निकलकर पूरी तरह न्यूट्रल हो जाता हूं। यानी कि खुद को भावनात्मक रूप से संतुलित करने की कोशिश करता हूं। इसमें समय, कोशिश, एनर्जी और अनुभव की जरूरत होती है। और मुझे लगता है कि अपनी और अपने मरीजों की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए रोजाना ऐसा करना जरूरी है।"
डॉक्टरों की मानसिक सेहत पर बात करना सिर्फ बहुत जरूरी है। जिस तरह डॉक्टर हमारी फिजीकल और मेंटल हेल्थ का ख्याल रखते हैं, उसी तरह हमें भी यह समझना होगा कि उन्हें भी आराम, भावनात्मक समर्थन और मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल की जरूरत होती है।