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Written By: Anshumala | Updated : April 23, 2018 12:26 PM IST
पार्किंसंस डिजीज केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का लगातार गंभीर होता डिसऑर्डर है, जो शरीर की गतिविधियों को प्रभावित करता है। बीमारी की शुरुआत में कई ऐसे लक्षण होते हैं, जिनपर ध्यान नहीं जाता, लेकिन धीरे-धीरे यह बीमारी गंभीर होती जाती है। कई सप्ताह और महीनों के बाद लक्षण पकड़ में आते हैं। आमौतर, पर इसमें शरीर के अंग कंपन करते रहते हैं। हाथों में कंपकंपी ही पर्याप्त है, यह समझने के लिए कि कोई व्यक्ति पार्किंसंस रोग से पीड़ित है। इस बीमारी की शुरुआत में चेहरे पर बहुत कम या फिर कोई भाव दिखाई नहीं देते हैं। साथ ही चलते समय हाथ नहीं हिलते हैं, बोलते समय आवाज बिल्कुल धीमी हो जाती है। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, ये लक्षण गंभीर होते जाते हैं। इस प्रकार की स्थितियों से बचने के लिए तुरंत किसी अनुभवी न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए।
लक्षणों को पहचानें
गुरुग्राम स्थित आर्टेमिस हॉस्पिटल के न्यूरोसर्जरी विभाग के डायरेक्टर डॉ. आदित्य गुप्ता का कहना है कि अलग-अलग व्यक्तियों में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। प्रारंभिक लक्षण बिल्कुल सामान्य हो सकते हैं। संभव है कि उनपर ध्यान भी न जाए। अक्सर लक्षण शरीर के एक ओर दिखाई देने शुरू होते हैं और सामान्यतः दूसरी ओर लक्षण दिखाई देने से पहले ही गंभीर हो जाते हैं। पार्किंसंस के संकेत और लक्षण इस प्रकार हैं:
कपकपी या कंपन
कपकपी या हिलना, अक्सर हाथों या उंगलियों में शुरू होता है। इसमें आप अपने अंगूठे और तर्जनी उंगली में रगड़ महसूस करते हैं, जिसे पिल-रोलिंग ट्रेमर कहा जाता है। इस बीमारी का एक लक्षण यह भी है कि जब आपका हाथ रिलैक्स (जब आप कोई काम नहीं कर रहे होते हैं) होता है, तब भी उसमें कपकपी होती है। पार्किंसंस रोग के होने में कई कारक भूमिका निभाते हैं, जिनमें आनुवांशिक कारक, पर्यावरण से संबंधित ट्रिगर, लेवी बॉडी (Levy bodies) आदि शामिल हैं।
कैसे करें जांच
यदि आपमें उपरोक्त कोई भी लक्षण नजर आए, तो किसी अच्छे न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें। वह आपकी मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक परीक्षण और संकेतों एवं लक्षणों की समीक्षा के आधार पर जांच करेगा।
कैसे-कैसे टेस्ट
एमआरआई, अल्ट्रा साउंड, एसपीईसीटी और पीईटी स्कैन के जरिए इस रोग का पता लगाया जाता है। दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का पता लगाने के लिए भी इनका इस्तेमाल किया जाता है। कई बार इस बीमारी की जांच करने में काफी समय लग जाता है।
कैसे होता है उपचार
डॉ. आदित्य गुप्ता कहते हैं कि डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन (डीबीएस) में सर्जन मस्तिष्क के विशेष भाग में इलेक्ट्रॉड आरोपित करते हैं। इन इलेक्ट्रॉड को कॉलर बोन के पास छाती में आरोपित जनरेटर से जोड़ा जाता है, जो मस्तिष्क को विद्युतीय स्पंदन भेजता है। इससे पार्किंसन रोग के लक्षणों को कम किया जा सकता है। डीबीएस उन लोगों को दिया जाता है, जिनकी बीमारी एडवांस स्टेज तक पहुंच गई है। डीबीएस कपकपी और मांसपेशियों के कड़ेपन को कम कर सकता है। चलने में हो रही समस्या को ठीक करता है।
डीबीएस को दवाइयों से अधिक दी जाती है प्राथमिकता
डॉ. आदित्य गुप्ता का कहना है कि दवाइयां पार्किंसंस रोग के लक्षणों को कम करने के अस्थायी प्रभाव के लिए दी जाती हैं। जब व्यक्ति दवाइयों के प्रभाव का आनंद लेता है, तो इसे “ऑन-फेज’’ के नाम से जाना जाता है और जब यह कम हो जाता है, तो उसे “ऑफ-फेज” कहते हैं। समय के साथ शरीर पर दवाइयों का प्रभाव समाप्त होने लगता है, इसलिए दवाइयों का सेवन बढ़ जाता है। डीबीएस का मरीज पर 24 घंटे लगातार प्रभाव होता है। यह अनैच्छिक रूप से होने वाले कपकपी को रोक सकता है। साथ ही डीबीएस कपकपी में जो उतार-चढ़ाव आते हैं, उसे भी नहीं होने देता है जैसा कि दवाइयों के साथ होता है। दवाइयों का प्रभाव कब खत्म हो जाएगा इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। ऐसे में अगर पार्किंसन से पीड़ित व्यक्ति यदि कोई काम करने घर से बाहर जाता है, तो यह एक बड़ा जोखिम हो सकता है।
चित्रस्रोत-Shutterstock.