
रश्मि उपाध्याय
रश्मि उपाध्याय साल 2014 से मीडिया क्षेत्र से जुड़ी हैं और TheHealthSite.Com में बतौर एडिटर काम कर रही हैं। इन्हें ... Read More
कहते हैं कि इंसान की उम्र इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितने साल जिए, बल्कि इस बात से आंकी जाती है कि उसने अपनी जिंदगी में कितने लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरी। मुंबई के मलाड में रहने वाले 19 साल के कॉलेज छात्र राज गांधी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह उम्र और रिश्ते में अपने परिवार में सबसे छोटा था, लेकिन उसका दिल और उसकी सोच परिवार में सबसे बड़ी थी। साल 2017 में एक दर्दनाक लोकल ट्रेन हादसे ने भले ही राज को उन्हें इस दुनिया और अपने परिवार से अलग कर दिया लेकिन जाते-जाते भी वह एक ऐसा नेक काम कर गया जो आज भी समाज के लिए एक मिसाल है। अंगदान के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए Zee Media के इस विशेष अभियान के तहत, जब हमारी टीम ने राज गांधी के बड़े भाई मितेन गांधी से बात की, तो उनका दर्द और अपने भाई के प्रति गर्व उनकी आंखों से आंसुओं के रूप में छलक पड़ा।
वह 18 मई 2017 की शाम थी। रोज की तरह पूरा गांधी परिवार घर पर बैठा राज का इंतजार कर रहा था। रात के करीब 8 बज चुके थे और डाइनिंग टेबल पर रात के खाने की तैयारियां चल रही थीं। मितेन गांधी ने उस खौफनाक रात को याद करते हुए बेहद भावुक होकर बताया "हम सब घर पर एक साथ बैठकर रात के खाने का इंतजार कर रहे थे। राज को घर पहुंचने में थोड़ी देर हो रही थी, इसलिए हमने उसे फोन मिलाना शुरू किया। लेकिन कई बार रिंग जाने के बाद भी राज फोन नहीं उठा रहा था। दिल में एक अजीब सी घबराहट होने लगी थी। हमने फोन मिलाना जारी रखा। तभी अचानक राज का फोन उठा लेकिन वो आवाज राज की नहीं बल्कि पुलिस की थी। पुलिस ने जो कहा, उसने हमारे पैरों तले से जमीन खिसका दी। उन्होंने बेहद ठंडे शब्दों में हमें सूचना दी कि- 'राज अब इस दुनिया में नहीं रहा।' वह एक ट्रेन हादसे का शिकार हो चुका है।"

राज उस शाम मुंबई के मस्जिद स्टेशन के पास स्थित अपने चाचा के ऑफिस से काम खत्म करके लोकल ट्रेन से घर लौट रहा था। ट्रेन में भारी भीड़ थी, और धक्का-मुक्की के कारण अचानक राज का संतुलन बिगड़ गया और वह चलती हुई भीड़भाड़ वाली ट्रेन से नीचे गिर गया। इस भयानक हादसे में राज के सिर पर गंभीर चोटें आईं और उसे तुरंत मुंबई के लीलावती अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने रात-दिन एक कर दिए, लेकिन राज की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।
अपने छोटे भाई को याद करते हुए मितेन की आवाज भारी हो गई। उन्होंने बताया कि राज स्वभाव से बहुत दयावान था। मितेन कहते हैं "राज हमारे घर में सबसे छोटा और सबका लाडला था। लेकिन उसकी सोच बहुत बड़ी थी। वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता था। कई बार तो वह चुपचाप लोगों की मदद कर आता था और हमें पता भी नहीं चलता था। जब हमें बाद में बाहर के लोगों से पता चलता कि राज ने उनकी इस तरह मदद की है, तो हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। वह भले ही उम्र में छोटा था, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। और देखिए, उसकी यही फितरत उसके जाने के बाद भी नहीं बदली। जाते-जाते भी वह दुनियाका सबसे नेक काम कर गया और छह लोगों को नई जिंदगी दे गया।"
21 मई 2017 को डॉक्टरों ने तमाम कोशिशों के बाद आखिरकार गांधी परिवार को वो कड़वी सच्चाई बताई जिसे कोई भी माता-पिता नहीं सुनना चाहते। डॉक्टरों ने घोषित किया कि राज 'ब्रेन डेड' हो चुका है, यानी अब उसका दिमाग पूरी तरह काम करना बंद कर चुका है और वहां से वापस लौट पाना नामुमकिन है। इस गहरे दुख की घड़ी में, परिवार के एक करीबी दोस्त ने 'मोहन फाउंडेशन' (MOHAN Foundation) की हेल्पलाइन पर संपर्क किया। चूंकि अंगदान को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां और अफवाहें फैली होती हैं, इसलिए परिवार के मन में भी कुछ शंकाएं थीं। दोस्त ने मोहन फाउंडेशन के मुंबई ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर से सीधा सवाल पूछा कि क्या राज के अंगों का सही इस्तेमाल होगा? क्या वे किसी जरूरतमंद को ही मिलेंगे या उन्हें बेच दिया जाएगा?
मोहन फाउंडेशन ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर ने परिवार को पूरी पारदर्शिता के साथ विश्वास दिलाया कि भारत में अंगदान की प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी है। अंग केवल उन्हीं मरीजों को दिए जाते हैं जो जोनल ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन सेंटर (ZTCC), मुंबई की आधिकारिक वेटिंग लिस्ट में शामिल होते हैं। इस निष्पक्ष संस्था के आश्वासन ने गांधी परिवार को एक संबल दिया।
Organ donation
अस्पताल के ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर और मोहन फाउंडेशन की टीम ने मिलकर माता-पिता को ब्रेन डेथ की स्थिति के बारे में विस्तार से समझाया। पहले और दूसरे कड़े मेडिकल टेस्ट के बाद जब राज को पूरी तरह ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया, तब पिता नवीनचंद्र गांधी, मां नीला एन. गांधी और भाई मितेन ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए राज के अंगदान करने का साहसिक फैसला लिया।
चूंकि यह एक ट्रेन दुर्घटना थी, इसलिए यह मामला एक मेडिको-लीगल केस (MLC) था। इसके लिए स्थानीय पुलिस अधिकारियों से तुरंत मंजूरी की आवश्यकता थी। दुःख की इस घड़ी में भी कानून और अस्पताल प्रशासन ने तेजी से काम किया। पुलिस क्लीयरेंस मिलते ही राज के अंगों को निकालने की प्रक्रिया शुरू हुई। हार्ट, लिवर और किडनी समेत उनकी आंखें भी डोनट की गईं।
लेख के अंत में, मितेन गांधी के शब्द हर उस इंसान की आंखें नम कर देते हैं जो इस कहानी को सुनता है। मितेन ने कहा "हमने अंगदान का फैसला सिर्फ इसलिए लिया क्योंकि हम जानते थे कि राज भी शायद यही चाहेगा। वह हमेशा दूसरों के काम आता था। आज भले ही राज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं है, लेकिन हमें तसल्ली है कि किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का पिता आज राज के दिल की बदौलत धड़क रहा है। वह उन लोगों के भीतर आज भी जिंदा है और मुस्कुरा रहा है।"
अंगदान को लेकर हमारे समाज में आज भी जागरूकता की भारी कमी है। हर साल भारत में लाखों लोग सिर्फ इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें समय पर ऑर्गन नहीं मिल पाते। राज गांधी और उनके परिवार की यह कहानी हमें सिखाती है कि जब दुख का पहाड़ टूटा हो, तब भी हम अपनी सोच को बड़ा रखकर किसी के घर का बुझता हुआ चिराग रोशन कर सकते हैं। आइए, Zee Media के जागरूकता अभियान 'जिंदगी के बाद भी' का हिस्सा बनें, अंगदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करें और अंगदान करने का संकल्प लें। क्योंकि आपके एक फैसले से किसी को दूसरी जिंदगी मिल सकती है। राज गांधी और उनके पूरे परिवार के इस जज्बे को ZeeMedia कोटि-कोटि नमन करता है।

अंगदान दो तरह से होता है- पहला 'लिविंग डोनेशन' (जीवित रहते हुए किडनी या लिवर का एक हिस्सा देना) और दूसरा 'डिसीज्ड डोनेशन' (ब्रेन डेड घोषित होने के बाद आंखें, दिल, लिवर, किडनी आदि दान करना)। मेडिकल टीम जांच के बाद ही तय करती है कि कौन से अंग दान किए जा सकते हैं।
NOTTO या किसी संस्था द्वारा जारी किया गया एक पहचान पत्र होता है, जो यह बताता है कि आपने अपनी मृत्यु के बाद अपने अंग दान करने का संकल्प लिया है। यह कार्ड आपकी इच्छा का प्रमाण तो है, लेकिन आपके जाने के बाद अंगदान तभी हो सकता है जब आपका परिवार इसके लिए अंतिम लिखित अनुमति देता है।
| भ्रम (Myths) | सच (Facts) |
| अगर मैं अंगदान के लिए साइन करूंगा, तो डॉक्टर अस्पताल में मुझे बचाने की कोशिश नहीं करेंगे। | डॉक्टर का पहला काम आपकी जान बचाना होता है, अंगदान की बात सिर्फ तब शुरू होती है जब मरीज 'ब्रेन डेड' घोषित हो जाए। |
| घर पर सामान्य मौत होने के बाद भी शरीर के सारे अंग दान किए जा सकते हैं। | घर पर प्राकृतिक मौत होने पर सिर्फ आंखें दान हो सकती हैं, बाकी अंग नहीं। |
| अंगदान करने से मृत व्यक्ति का शरीर पूरी तरह से खराब हो जाता है। | अंगों को एक सामान्य ऑपरेशन की तरह बेहद सम्मान से निकाला जाता है, जिससे शव पर बाहर से कोई खराबी या दाग न दिखे। |
| अंगदान के लिए परिवार को अस्पताल को बहुत सारे पैसे देने पड़ते हैं। | अंगदान पूरी तरह से मुफ्त और एक नेक काम है, डोनर के परिवार से पैसा नहीं लिया जाता। |
| मैं बहुत बूढ़ा हूं या मुझे बीमारी है, इसलिए मेरे अंग किसी काम के नहीं हैं। | उम्र मायने नहीं रखती, मौत के वक्त डॉक्टर्स मेडिकल जांच करके खुद तय करते हैं कि आपके कौन से अंग स्वस्थ हैं और जान बचा सकते हैं। |
| अगर अंगदान किए तो अगले जन्म में उस अंग के बिना पैदा होना पड़ेगा। | यह सिर्फ एक अंधविश्वास है। |
| अंगदान करने से भगवान नाराज होते हैं। | सभी प्रमुख धर्मों में अंगदान को इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा और एक पुण्य का काम माना जाता है। |
| अंगदान के बाद डॉक्टर पूरी बॉडी को कांट छांट पर परिवार को देते हैं। | अंगों को एक सामान्य और बेहद साफ-सुथरे सर्जिकल ऑपरेशन की तरह निकाला जाता है। |