hamburger icon
A
Read in English

मां खाने का इंतजार करती रही लेकिन फोन पर आई मौत की खबर, फिर भी किया अंगदान

अंगदान को लेकर हमारे समाज में आज भी जागरूकता की भारी कमी है। हर साल भारत में लाखों लोग सिर्फ इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें समय पर ऑर्गन नहीं मिल पाते। Zee Media के जागरूकता अभियान 'जिंदगी के बाद भी' का हिस्सा बनें, अंगदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करें और अंगदान करने का संकल्प लें।

WrittenBy

Written By: Rashmi Upadhyay | Published : June 19, 2026 6:08 PM IST

कहते हैं कि इंसान की उम्र इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितने साल जिए, बल्कि इस बात से आंकी जाती है कि उसने अपनी जिंदगी में कितने लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरी। मुंबई के मलाड में रहने वाले 19 साल के कॉलेज छात्र राज गांधी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह उम्र और रिश्ते में अपने परिवार में सबसे छोटा था, लेकिन उसका दिल और उसकी सोच परिवार में सबसे बड़ी थी। साल 2017 में एक दर्दनाक लोकल ट्रेन हादसे ने भले ही राज को उन्हें इस दुनिया और अपने परिवार से अलग कर दिया लेकिन जाते-जाते भी वह एक ऐसा नेक काम कर गया जो आज भी समाज के लिए एक मिसाल है। अंगदान के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए Zee Media के इस विशेष अभियान के तहत, जब हमारी टीम ने राज गांधी के बड़े भाई मितेन गांधी से बात की, तो उनका दर्द और अपने भाई के प्रति गर्व उनकी आंखों से आंसुओं के रूप में छलक पड़ा।

जब एक झटके में थम गईं खुशियां

वह 18 मई 2017 की शाम थी। रोज की तरह पूरा गांधी परिवार घर पर बैठा राज का इंतजार कर रहा था। रात के करीब 8 बज चुके थे और डाइनिंग टेबल पर रात के खाने की तैयारियां चल रही थीं। मितेन गांधी ने उस खौफनाक रात को याद करते हुए बेहद भावुक होकर बताया "हम सब घर पर एक साथ बैठकर रात के खाने का इंतजार कर रहे थे। राज को घर पहुंचने में थोड़ी देर हो रही थी, इसलिए हमने उसे फोन मिलाना शुरू किया। लेकिन कई बार रिंग जाने के बाद भी राज फोन नहीं उठा रहा था। दिल में एक अजीब सी घबराहट होने लगी थी। हमने फोन मिलाना जारी रखा। तभी अचानक राज का फोन उठा लेकिन वो आवाज राज की नहीं बल्कि पुलिस की थी। पुलिस ने जो कहा, उसने हमारे पैरों तले से जमीन खिसका दी। उन्होंने बेहद ठंडे शब्दों में हमें सूचना दी कि- 'राज अब इस दुनिया में नहीं रहा।' वह एक ट्रेन हादसे का शिकार हो चुका है।"

Organ Donation

ICU में भी राज की हालत बिगड़ती गई

राज उस शाम मुंबई के मस्जिद स्टेशन के पास स्थित अपने चाचा के ऑफिस से काम खत्म करके लोकल ट्रेन से घर लौट रहा था। ट्रेन में भारी भीड़ थी, और धक्का-मुक्की के कारण अचानक राज का संतुलन बिगड़ गया और वह चलती हुई भीड़भाड़ वाली ट्रेन से नीचे गिर गया। इस भयानक हादसे में राज के सिर पर गंभीर चोटें आईं और उसे तुरंत मुंबई के लीलावती अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने रात-दिन एक कर दिए, लेकिन राज की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।

"घर में सबसे छोटा था, पर उसका दिल सबसे बड़ा था"

अपने छोटे भाई को याद करते हुए मितेन की आवाज भारी हो गई। उन्होंने बताया कि राज स्वभाव से बहुत दयावान था। मितेन कहते हैं "राज हमारे घर में सबसे छोटा और सबका लाडला था। लेकिन उसकी सोच बहुत बड़ी थी। वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता था। कई बार तो वह चुपचाप लोगों की मदद कर आता था और हमें पता भी नहीं चलता था। जब हमें बाद में बाहर के लोगों से पता चलता कि राज ने उनकी इस तरह मदद की है, तो हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था। वह भले ही उम्र में छोटा था, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। और देखिए, उसकी यही फितरत उसके जाने के बाद भी नहीं बदली। जाते-जाते भी वह दुनियाका सबसे नेक काम कर गया और छह लोगों को नई जिंदगी दे गया।"

जब जिंदगी की उम्मीद टूटी, तो दूसरों को जिंदगी देने का फैसला लिया

21 मई 2017 को डॉक्टरों ने तमाम कोशिशों के बाद आखिरकार गांधी परिवार को वो कड़वी सच्चाई बताई जिसे कोई भी माता-पिता नहीं सुनना चाहते। डॉक्टरों ने घोषित किया कि राज 'ब्रेन डेड' हो चुका है, यानी अब उसका दिमाग पूरी तरह काम करना बंद कर चुका है और वहां से वापस लौट पाना नामुमकिन है। इस गहरे दुख की घड़ी में, परिवार के एक करीबी दोस्त ने 'मोहन फाउंडेशन' (MOHAN Foundation) की हेल्पलाइन पर संपर्क किया। चूंकि अंगदान को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां और अफवाहें फैली होती हैं, इसलिए परिवार के मन में भी कुछ शंकाएं थीं। दोस्त ने मोहन फाउंडेशन के मुंबई ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर से सीधा सवाल पूछा कि क्या राज के अंगों का सही इस्तेमाल होगा? क्या वे किसी जरूरतमंद को ही मिलेंगे या उन्हें बेच दिया जाएगा?

मोहन फाउंडेशन ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर ने परिवार को पूरी पारदर्शिता के साथ विश्वास दिलाया कि भारत में अंगदान की प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी है। अंग केवल उन्हीं मरीजों को दिए जाते हैं जो जोनल ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन सेंटर (ZTCC), मुंबई की आधिकारिक वेटिंग लिस्ट में शामिल होते हैं। इस निष्पक्ष संस्था के आश्वासन ने गांधी परिवार को एक संबल दिया।

Organ donation Organ donation

माता पिता को नहीं पता था क्या होता है ब्रेन डेड

अस्पताल के ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर और मोहन फाउंडेशन की टीम ने मिलकर माता-पिता को ब्रेन डेथ की स्थिति के बारे में विस्तार से समझाया। पहले और दूसरे कड़े मेडिकल टेस्ट के बाद जब राज को पूरी तरह ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया, तब पिता नवीनचंद्र गांधी, मां नीला एन. गांधी और भाई मितेन ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए राज के अंगदान करने का साहसिक फैसला लिया।

चूंकि यह एक ट्रेन दुर्घटना थी, इसलिए मामला बना पुलिस केस

चूंकि यह एक ट्रेन दुर्घटना थी, इसलिए यह मामला एक मेडिको-लीगल केस (MLC) था। इसके लिए स्थानीय पुलिस अधिकारियों से तुरंत मंजूरी की आवश्यकता थी। दुःख की इस घड़ी में भी कानून और अस्पताल प्रशासन ने तेजी से काम किया। पुलिस क्लीयरेंस मिलते ही राज के अंगों को निकालने की प्रक्रिया शुरू हुई। हार्ट, लिवर और किडनी समेत उनकी आंखें भी डोनट की गईं।

राज तो चला गया, पर वह आज भी जिंदा है

लेख के अंत में, मितेन गांधी के शब्द हर उस इंसान की आंखें नम कर देते हैं जो इस कहानी को सुनता है। मितेन ने कहा "हमने अंगदान का फैसला सिर्फ इसलिए लिया क्योंकि हम जानते थे कि राज भी शायद यही चाहेगा। वह हमेशा दूसरों के काम आता था। आज भले ही राज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं है, लेकिन हमें तसल्ली है कि किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का पिता आज राज के दिल की बदौलत धड़क रहा है। वह उन लोगों के भीतर आज भी जिंदा है और मुस्कुरा रहा है।"

Zee Media की अपील: अंगदान महादान

अंगदान को लेकर हमारे समाज में आज भी जागरूकता की भारी कमी है। हर साल भारत में लाखों लोग सिर्फ इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें समय पर ऑर्गन नहीं मिल पाते। राज गांधी और उनके परिवार की यह कहानी हमें सिखाती है कि जब दुख का पहाड़ टूटा हो, तब भी हम अपनी सोच को बड़ा रखकर किसी के घर का बुझता हुआ चिराग रोशन कर सकते हैं। आइए, Zee Media के जागरूकता अभियान 'जिंदगी के बाद भी' का हिस्सा बनें, अंगदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करें और अंगदान करने का संकल्प लें। क्योंकि आपके एक फैसले से किसी को दूसरी जिंदगी मिल सकती है। राज गांधी और उनके पूरे परिवार के इस जज्बे को ZeeMedia कोटि-कोटि नमन करता है।

Organ Donation

आर्गन डोनेशन के बारे में 6 सबसे काम की जानकारियां

कौन कर सकता है अंगदान?

अंगदान दो तरह से होता है- पहला 'लिविंग डोनेशन' (जीवित रहते हुए किडनी या लिवर का एक हिस्सा देना) और दूसरा 'डिसीज्ड डोनेशन' (ब्रेन डेड घोषित होने के बाद आंखें, दिल, लिवर, किडनी आदि दान करना)। मेडिकल टीम जांच के बाद ही तय करती है कि कौन से अंग दान किए जा सकते हैं।

कैसे कर सकते हैं अंगदान?

  • जब किसी अपने की मृत्यु होने वाली हो या डॉक्टर उसे 'ब्रेन डेड' घोषित कर दें, तो बिना समय गंवाए तुरंत अस्पताल के डॉक्टर को बताएं कि आप अंगदान करना चाहते हैं, या सरकारी हेल्पलाइन 1800-11-4770 पर फोन करें।
  • डॉक्टर आपसे एक फॉर्म पर साइन करवाएंगे। इसमें कोई पैसा नहीं लगता और न ही इलाज का कोई खर्च परिवार से लिया जाता है।
  • अंग निकालने का ऑपरेशन बेहद सम्मान के साथ किया जाता है, शरीर पर कोई दाग या खराबी बाहर से नहीं दिखती और ऑपरेशन के तुरंत बाद शव परिवार को सम्मान समेत अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया जाता है।

कहां होता है अंगदान?

  • आप सीधे notto.mohfw.gov.in पर जाकर 'Register' बटन पर क्लिक करें और एक साधारण फॉर्म भरकर अपना डोनर कार्ड पा सकते हैं।
  • NOTTO के अलावा आप MOHAN Foundation या Organ India जैसी संस्थाओं की वेबसाइट पर जाकर भी ऑनलाइन फॉर्म भर सकते हैं।

NOTTO की वेबसाइट पर फॉर्म कैसे भरते हैं?

  • Notto.mohfw.gov.in वेबसाइट खोलें और होमपेज पर ऊपर दिख रहे "Register for Organ Donation" बटन पर क्लिक करें।
  • अब आपके सामने एक फॉर्म खुलेगा। इसमें अपना नाम, जन्मतिथि (DOB), जेंडर, मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी और अपना पूरा पता सही-सही भरें।
  • फॉर्म में अपना ब्लड ग्रुप सिलेक्ट करें। इसके बाद आपसे पूछा जाएगा कि आप कौन से अंग दान करना चाहते हैं—आप चाहें तो 'All Organs' (सभी अंग) चुन सकते हैं या अपनी मर्जी से कुछ खास अंग (जैसे सिर्फ आंखें या किडनी) पर टिक कर सकते हैं।
  • कानूनी तौर पर आपको दो गवाहों (Witness) के नाम और उनके फोन नंबर भरने होते हैं। इसमें आप अपने परिवार के किसी भी दो सदस्यों की डिटेल डाल सकते हैं।
  • आखिर में आपके मोबाइल नंबर पर एक OTP आएगा, उसे बॉक्स में डालकर 'Submit' कर दें। रजिस्ट्रेशन पूरा होते ही स्क्रीन पर आपका 'Organ Donor Card' आ जाएगा, जिसे आप डाउनलोड करके अपने पास रख सकते हैं।
  • फॉर्म भरने के लिए कोई फीस देनी पड़ती।
  • फॉर्म भरने के बाद अपने परिवार को इस फैसले के बारे में जरूर बताएं, क्योंकि आपके जाने के बाद उनकी कानूनी अनुमति अनिवार्य होती है।

डोनर कार्ड क्या होता है?

NOTTO या किसी संस्था द्वारा जारी किया गया एक पहचान पत्र होता है, जो यह बताता है कि आपने अपनी मृत्यु के बाद अपने अंग दान करने का संकल्प लिया है। यह कार्ड आपकी इच्छा का प्रमाण तो है, लेकिन आपके जाने के बाद अंगदान तभी हो सकता है जब आपका परिवार इसके लिए अंतिम लिखित अनुमति देता है।

अंगदान के बारे में 5 बड़ी अफवाहें

भ्रम (Myths)सच (Facts)
अगर मैं अंगदान के लिए साइन करूंगा, तो डॉक्टर अस्पताल में मुझे बचाने की कोशिश नहीं करेंगे।डॉक्टर का पहला काम आपकी जान बचाना होता है, अंगदान की बात सिर्फ तब शुरू होती है जब मरीज 'ब्रेन डेड' घोषित हो जाए।
घर पर सामान्य मौत होने के बाद भी शरीर के सारे अंग दान किए जा सकते हैं।घर पर प्राकृतिक मौत होने पर सिर्फ आंखें दान हो सकती हैं, बाकी अंग नहीं।
अंगदान करने से मृत व्यक्ति का शरीर पूरी तरह से खराब हो जाता है।अंगों को एक सामान्य ऑपरेशन की तरह बेहद सम्मान से निकाला जाता है, जिससे शव पर बाहर से कोई खराबी या दाग न दिखे।
अंगदान के लिए परिवार को अस्पताल को बहुत सारे पैसे देने पड़ते हैं।अंगदान पूरी तरह से मुफ्त और एक नेक काम है, डोनर के परिवार से पैसा नहीं लिया जाता।
मैं बहुत बूढ़ा हूं या मुझे बीमारी है, इसलिए मेरे अंग किसी काम के नहीं हैं।उम्र मायने नहीं रखती, मौत के वक्त डॉक्टर्स मेडिकल जांच करके खुद तय करते हैं कि आपके कौन से अंग स्वस्थ हैं और जान बचा सकते हैं।
अगर अंगदान किए तो अगले जन्म में उस अंग के बिना पैदा होना पड़ेगा।यह सिर्फ एक अंधविश्वास है।
अंगदान करने से भगवान नाराज होते हैं।सभी प्रमुख धर्मों में अंगदान को इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा और एक पुण्य का काम माना जाता है।
अंगदान के बाद डॉक्टर पूरी बॉडी को कांट छांट पर परिवार को देते हैं।अंगों को एक सामान्य और बेहद साफ-सुथरे सर्जिकल ऑपरेशन की तरह निकाला जाता है।