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एड्स/एचआईवी (AIDS/HIV)

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Medically Verified By: Dr. Sachin Shelke

एचआईवी से होने वाले वायरल संक्रमण की गंभीरता के अंतिम चरण को एड्स (Acquired immunodeficiency syndrome) के नाम से जाना जाता है। एचआईवी से संक्रमित हर व्यक्ति को एड्स होना जरूरी नहीं होता है।

क्‍या होता है एड्स/एचआईवी?



एचआईवी (HIV) यानि ह्यूमन इम्यूनोडिफिशिएंसी वायरस एक विशेष वायरल इन्फेक्शन  है, जो ह्यूमन इम्यूनोडिफिशिएंसी वायरस नामक एक विशेष वायरस से ही होता है। ह्यूमन इम्यूनोडिफिशिएंसी वायरस शरीर की विशेष सफेद रक्त कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है, जिससे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ने लगती है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ने के कारण गंभीर संक्रमण व कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। एचआईवी से होने वाले वायरल संक्रमण की गंभीरता के अंतिम चरण को एड्स (Acquired immunodeficiency syndrome) के नाम से जाना जाता है। एचआईवी से संक्रमित हर व्यक्ति को एड्स होना जरूरी नहीं होता है।

यह वायरल संक्रमण विशेष रूप से यौन मार्गों से फैलता है, हालांकि, इसके अलावा यह संक्रमित व्यक्ति को लगाई गई सुई का इस्तेमाल करने या संक्रमित व्यक्ति का रक्त चढ़ाने से भी हो सकता है। एचआईवी के लक्षण आमतौर पर संक्रमण के संपर्क में आने के दो से चार हफ्तों बाद विकसित हो जाते हैं। हांलाकि, कुछ लोगों में इसके लक्षण विकसित होने में लगभग दस महीनों तक का समय भी लग सकता है।

एचआईवी संक्रमण को पूरी तरह से खत्म करने के लिए अभी तक कोई इलाज नहीं मिल पाया है। लेकिन उचित एंटीरेट्रोवायरल दवाएं (Antiretroviral drugs) और जीवनशैली में बदलाव करके इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। इस से संक्रमित व्यक्ति को कई प्रकार की जटिलताएं विकसित हो जाती हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होने के कारण उसे बार-बार अन्य संक्रमण भी होते रहते हैं, जो अक्सर जानलेवा स्थिति पैदा कर देते हैं। इसीलिए एचआईवी संक्रमित मरीज के लक्षणों को नियंत्रित रखना बेहद आवश्यक होता है।

एचआईवी संक्रमण के प्रकार

एचआईवी आमतौर पर दो प्रकार से होता है, जिन्हें एचआईवी-1 और एचआईवी-2 के नाम से जाना जाता है। इन दोनों के गंभीर होने पर एड्स हो सकता है। हालांकि, फिर भी ये एक दूसरे से काफी अलग हो सकते हैं, जो निम्न प्रकार से हैं -


  1. एचआईवी-1 - यह एचआईवी संक्रमण का सबसे आम प्रकार है। एचआईवी-1 आमतौर पर दुनिया के सभी हिस्सों में पाया जाता है।

  2. एचआईवी-2 - यह एचआईवी संक्रमण का एक दुर्लभ प्रकार है, जो अधिकतर पश्चिमी अफ्रीका में पाया जाता है।

एचआईवी के चरण

एचआईवी संक्रमण के कई अलग-अलग चरण होते हैं, जो कुछ इस प्रकार हैं -


  1. शुरुआती चरण - इसे अंग्रेजी भाषा में एसिंप्टोमेटिक स्टेज कहा जाता है, क्योंकि इसमें मरीज को कोई प्रमुख लक्षण महसूस नहीं होता है। हालांकि, अलग ध्यान दिया जाए तो प्रतिरक्षा प्रणाली में होने वाले बदलावों की पहचान की जा सकती है। शुरुआती चरण लगभग 3 महीनों तक रहता है और इसके बाद प्राथमिक संक्रमण चरण की शुरुआत होती है।

  2. प्राथमिक संक्रमण - यह एचआईवी संक्रमण का दूसरा चरण है, जिसमें वायरस व्यक्ति के रक्त के साथ प्रवाहित हो जाता है। इस स्टेज में वायरस शरीर के सभी हिस्सों तक पहुंच जाता है और लक्षण पैदा होने लग जाते हैं।

  3. अंतिम चरण - अंग्रेजी भाषा में इसे सिंप्टोमेटिक स्टेज कहा जाता है। यह एचआईवी संक्रमण का सबसे गंभीर चरण है जिसे एड्स के नाम से भी जाना जाता है। इस चरण में व्यक्ति को अन्य प्रकार के संक्रमण होने का खतरा भी बढ़ जाता है, जैसे टीबी और कैंडिडायसिस आदि।

एचआईवी संक्रमण के लक्षण

एचआईवी संक्रमण के लक्षण मुख्य रूप से उसकी स्टेज पर निर्भर करते हैं। शुरुआत में मरीज को कोई मुख्य लक्षण दिखाई नहीं देता है। इसके लक्षण आमतौर पर संक्रमण शुरू होने के दो से तीन हफ्तों बाद विकसित होने लगते हैं। हालांकि, कुछ लोगों में एचआईवी संक्रमण के लक्षण पूरी तरह से विकसित होने में लगभग दस महीनों का समय लग जाता है। एचआईवी संक्रमण के शुरुआती चरणों में भी कुछ सामान्य (गैर-विशिष्ट) लक्षण महसूस हो सकते हैं, जिनमें निम्न शामिल हैं -


  • सिरदर्द

  • दस्त

  • लिम्फ नोड में सूजन

  • थकान

  • त्वचा पर चकत्ते होना

  • रात के समय पसीने आना

  • गले में दर्द

  • जोड़ों में दर्द

  • मांसपेशियों में दर्द


हालांकि, एचआईवी संक्रमण के बाद के चरणों में अन्य विशिष्ट लक्षण विकसित होने लग जाते हैं, जिनमें निम्न शामिल हैं -

  • लंबे समय से एचआईवी संक्रमण रहना (और एड्स न होना)

  • वेजाइनल कैंडिडायसिस

  • हर्पीज जोस्टर

  • थ्रश

  • सर्वाइकल डिस्प्लेसिया

  • बेसिलरी एन्जियोमेटोसिस

  • सर्वाइकल कार्सीनोमा

  • एड्स

  • कैंडिडायसिस

  • बार-बार निमोनिया होना

  • लंबे समय से छाले रहना

  • हर्पीज सिंप्लेक्स संक्रमण

  • एचआईवी से संबंधित एन्सेफैलोपैथी

एचआईवी के कारण

एचआईवी एक विशेष प्रकार का वायरस है, जो अफ्रीका के चिंपैंजी बंदरों से मानव शरीर में आया है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह मनुष्यों के शरीर में संक्रमित बंदरों का मांस खाने के दौरान पहुंचा है।

जब एक स्वस्थ व्यक्ति एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले द्रव या पदार्थ के संपर्क में आता है, तो वह भी संक्रमित हो जाता है। एचआईवी विशेष रूप से निम्न की मदद से फैलता है -


  • रक्त

  • वीर्य

  • वीर्य से पहले निकलने वाला द्रव

  • योनि से निकलने वाले द्रव

  • गुदा से निकलने वाले द्रव व पदार्थ

  • स्तन का दूध


संक्रमित व्यक्ति से असुरक्षित यौन संबंध बनाना एचआईवी के सबसे मुख्य कारणों में से एक माना गया है। जबकि थूक या लार से यह वायरस नहीं फैलता है।

एचआईवी संक्रमण होने के जोखिम कारक

निम्न कुछ स्थितियों के बारे में बताया गया है, जो एचआईवी संक्रमण होने के खतरे को बढ़ा देती हैं -


  • एक से अधिक यौन साथी होना

  • बार-बार रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ना

  • अन्य लोगों के साथ बार-बार एक ही सुई का इस्तेमाल करना

  • संक्रमित मां के गर्भ में बच्चे को वायरस का संचरण

एचआईवी संक्रमण की रोकथाम

एचआईवी एक वायरल इन्फेक्शन है, जिसे विशेष बातों का ध्यान रखकर और कुछ नियमों का पालन करके फैलने से रोका जा सकता है। नीचे बताए दिशानिर्देशों का पालन करके आप एचआईवी संक्रमण के फैलाव को रोक सकते हैं -


  • किसी अन्य व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल की गई सीरिंज या सुई का इस्तेमाल न करें और अपनी सुई का इस्तेमाल करने के बाद उसे फेंक दें।

  • यौन संबंध बनाते समय नए कंडोंम का इस्तेमाल करें और इस्तेमाल के साथ उसका अच्छे से निपटान कर दें

  • यदि कोई गर्भवति महिला संक्रमित है, तो बच्चे तक संक्रमण फैलने से रोकने के लिए उसका इलाज किया जाना चाहिए। महिला को इस दौरान डॉक्टर द्वारा दिए गए सभी निर्देशों का ध्यानपूर्वक पालन करना चाहिए।


यदि आप एचआईवी संक्रमित हैं, तो यौन संबंध बनाने से पहले अपने साथी को इस बारे में बता दें।

एचआईवी संक्रमण का निदान

एचआईवी संक्रमण का निदान करने के लिए उसकी जांच करना आवश्यक होता है। एचआईवी संक्रमण का निदान करने के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट और कन्फर्मेटरी टेस्ट मुख्य माने गए हैं। थ्रोम्बोसाइटोपेनिया, ल्यूकोपेनिया या एनीमिया की जांच करने के लिए कंप्लीट ब्लड काउंट (सीबीसी) टेस्ट किया जाता है। एचआईवी संक्रमण के निदान में सीडी4 सेल काउंट और वायरल लोड भी आवश्यक हैं। यहां तक कि कुछ मामलों में एचआईवी संक्रमण की पुष्टि करने के लिए डिफ्रेंशियल डायग्नोसिस किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए हृदय संबंधी रोगों का पता लगाने के लिए कार्डियक बायोमार्कर टेस्ट करना।

एड्स के मामलों में निमोनिया को एक प्रमुख जटिलता के रूप में देखा गया है, इसलिए डॉक्टर अक्सर चेस्ट एक्स रे भी करवाने की सलाह देते हैं। छाती का एक्स रे करने से निमोनिया के कारण फेफड़ों में होने वाली समस्याओं का पता लगाया जा सकता है। आर्टरियल ब्लड गैस टेस्ट की मदद से एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं। टीबी का पता लगाने के लिए कई ट्यूबरकुलोसिस टेस्ट किए जाते हैं और स्प्यूटम कल्चर भी किया जाता है जो बैक्टीरियल इन्फेक्शन से संबंधित जानकारियां देता है। यदि टेस्ट के दौरान टीबी के संकेत मिलते हैं, तो सीटी स्कैन किया जाता है ताकि स्थिति की पुष्टि की जा सके और उससे निपटने के लिए उचित उपचार प्रणाली तैयार की जा सके। जिन लोगों को एड्स है और उनकी सीडी4 कोशिकाओं की संख्या कम हो गई है उन्हें अग्नाशयशोथ और कोलेसिस्टाइटिस होने का खतरा बढ़ जाता है। आवश्यकता पड़ने पर मरीज के बिलीरुबिन, ट्रांसमिनेज और लाइट बेस टेस्ट भी किए जा सकते हैं।

एचआईवी संक्रमित जिन लोगों को निगलने में कठिनाई जैसी समस्याएं होने लगी हैं, उनके लिए  इसोफेगोगैस्ट्रोड्यूडेनोस्कोपी टेस्ट किया जाता है। एड्स से ग्रस्त लोगों को आमतौर पर दस्त की शिकायत रहती हैं, ऐसे मरीजों में बैक्टीरिय व पैरासाइट इन्फेक्शन का पता लगाने के लिए कुछ विशेष टेस्ट किए जाते हैं। कई बार आवश्यकता पड़ने पर कोलोनोस्कोपी भी की जा सकती है। यदि डॉक्टर को लगता है कि एचआईवी संक्रमण से मरीज को न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी हो रही हैं, तो ऐसी स्थितियों का पता लगाने के लिए सीटी स्कैन, सेरिब्रोस्पाइनल द्रव की जांच और लंबर पंक्चर जैसे टेस्ट किए जा सकते हैं।

जीवनशैली में सुधार

एचआईवी संक्रमण के लक्षणों को गंभीर होने से रोकने के लिए जीवनशैली में कुछ सुधार करना महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए आपको निम्न बातों का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है -


  • यदि आप एचआईवी संक्रमित हैं, तो अपने यौन साथी को इस बारे में बता दें

  • इंजेक्शन आदि के लिए हर बार नई व साफ सुई का इस्तेमाल करें और उसके बाद सावधानीपूर्वक उसका निपटान कर दें।

  • लिंग का खतना करवा लें जिससे एचआईवी संक्रमण फैलने का खतरा कम हो जाता है।

  • यौन संबंध बनाते समय ऐसे कंडोम का इस्तेमाल करें, जिसमें पानी से बने चिकनाई वाले पदार्थ शामिल हों


एचआईवी से ग्रस्त गर्भवती महिलाएं डॉक्टर के संपर्क में रहें और सभी निर्देशों का ध्यानपूर्वक पालन करें।

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