उदासी के लिए दिल नहीं मस्तिष्क है कसूरवार, जानें कैसे निकलेंगे इस अवस्था से!

ये एक्सपर्ट टिप्स मदद करेंगे डिप्रेशन के अवस्था से बाहर निकलने में!

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Written By: Agencies | Updated : January 5, 2017 8:31 AM IST

मूल स्रोत: IANS Hindi

मन उदास है तो इसमें आपके दिल का कसूर नहीं, बल्कि मस्तिष्क का है। जी हां, अक्सर उदास होने पर हम मन बहलाने के लिए सिनेमा, शॉपिंग का सहारा लेते हैं और कभी-कभी तो इससे पीछा छुड़ाने के लिए शराब और जुए के भी आदी हो जाते हैं। अपनी उदासी के लिए अक्सर हम किस्मत को जिम्मेदार ठहराते हैं, लेकिन हकीकत में इसके पीछे कोई और नहीं बल्कि मस्तिष्क में मौजूद दो रसायन- डोपामिन और सेरोटोनिन जिम्मेदार हैं।

डोपामिन रसायन जहां हमारे मूड के स्तर को संतुलित रख हमें अवसाद से बचाता है, वहीं सेरोटोनिन शांति और भावनात्मक स्तर पर ठीक रहने के लिए महत्वपूर्ण है। यह हमारे आत्मविश्वास के स्तर को भी बढ़ाता है। यही महत्वपूर्ण रसायन हमारे शरीर की प्रतिकूल स्थितियों के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। इनके स्तर में उतार-चढ़ाव ही हमारे स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव के लिए जिम्मेदार होता है। अवसाद के कारण चिंता, तनाव, भ्रम, माया और कभी-कभी आत्महत्या के विचार वाली स्थितियां भी उत्पन्न हो जाती हैं।

मुंबई के नानावती सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के निदेशक और न्यूरोसर्जन मोहिनीश भतजीवाले ने आईएएनएस को बताया, 'ये महत्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमीटर जब अस्थिर हो जाते हैं तो इससे मूड में तेजी से असंतुलन आता है। यही असतुंलन अवसाद की वृद्धि करता है, जो लंबे समय तक रहने पर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है।' वसंतकुंज स्थित फोर्टिस हॉस्पिटल में तंत्रिका विज्ञान (न्यूरोलॉजी) विभाग की निदेशक डॉ. माधुरी बेहारी के अनुसार, सेरोटोनिन एक हैपी न्यूरोट्रांसमीटर है। यानी यह हमें सुख और दुख की अनुभूति कराने के लिए यह महत्वपूर्ण रसायन होता है। अगर इसका स्तर गिरता है तो हम दुख और उदासी महसूस करते हैं।

बेहारी ने बताया, डोपामिन रिसेप्टर दो तरह के होते हैं- क्लास 1 और क्लास 2। क्लास 1 (डी1, डी2, डी3) रिसेप्टर्स का स्तर कम होने पर पार्किन्सन रोग की संभावना होती है। क्लास 2 (डी5 और डी5) रिसेप्टर्स का स्तर उच्च होने पर मनोविकृति के लक्षण देखने को मिलते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अनिद्रा, उत्तेजना का शिकार होता है। इसके अलावा उसे हर वक्त महसूस होता है कि कोई उसे हानि पहुंचाना चाहता है।

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में रॉब रटलेज द्वारा किए गए अध्ययन में पता चला था कि स्वस्थ्य वयस्कों में डोपामिन का अधिक स्तर उन्हें जुआ खेलते वक्त अधिक जोखिम उठाने को प्रेरित करता है। डोपामिन रसायन सेरोटोनिन के साथ मिलकर मूड, भूख, नींद, सीखने की प्रवृत्ति और याददाश्त संबंधी कार्यो को नियंत्रित करता है। इसकी वृद्धि से हाई ब्लड प्रेशर और माइग्रेन हो सकता है।

इन दोनों रसायनों का असंतुलित स्तर हमारी लगातार परिवर्तित होती जीवनशैली की ही देन है। हमारी जीवनशैली इन दोनों रसायनों को प्रभावित करती है और इन रसायनों का असंतुलन हमें प्रभावित करता है। अगर हम अपने जीने के तरीकों में थोड़ा बदलाव करते हैं तो इससे हमें मदद मिल सकती है। प्राणायाम, योग से इन रसायनों के सही स्तर में मदद मिल सकती है।

बीएलके सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजिस्ट राजीव आनंद कहते हैं, 'विज्ञान ने इस बात की पुष्टि की है कि हमारी नकारात्मक सोच हमारे लिए हानिकारक है। सुख और दुख हमारे दिमाग की ही उपज है। शांति हमारे अंदर है। ध्यान और सकारात्मक जीवनशैली से हम अपने इन विचारों पर नियंत्रण कर सकते हैं।' विशेषज्ञों के अनुसार, कार्बोहाइड्रेट, विटमिन बी, और ओमेगा-3 फैटी एसिड में ये रसायन प्रचूर मात्रा में होते हैं। इसके अलावा गेहूं के ब्रेड, पास्ता, आलू, अनाज और ब्राउन राइस में ट्रिप्टोफैन होते हैं, जो मस्तिष्क में जाकर सेरोटोनिन में परिवर्तित हो जाता है।"

रसायनों की प्रचूर मात्रा वाले इन खाद्य पदार्थो का सेवन हमारे लिए लाभदायक होता है। बेहारी ने बताया, 'शिक्षा, आध्यात्म, व्यायाम, उचित खानपान और दूसरों की मदद करने से हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का समावेश होता है और यही ऊर्जा हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। अगर अपने अंदर इस ऊर्जा को बनाए रखते हैं तो इससे हमारे अंदर हमेशा खुशी का संचार होता रहेगा।'

अगर फिर भी कभी उदासी से सामना होता है तो देर न लगाएं तुरंत डॉक्टर के पास जाएं। डॉक्टर के पास जाकर अपनी परेशानी साझा करें। इन दोनों रसायनों का संतुलन करने की कोशिश करें। यकीनन आपकी उदासी आपसे कोसों दूर चली जाएगी।

चित्र स्रोत: Shutterstock 


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