रमज़ान में डायबिटीज़ के मरीज़ रखें इन बातों का ध्यान

अगर मधुमेह के मरीज की शूगर 70 से कम हो जाए या 300 तक पहुंच जाए तो उसे तुरंत रोजा खोल लेना चाहिए।

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Written By: Agencies | Updated : January 5, 2017 8:38 AM IST

मूल स्रोत: IANS Hindi

रमजान का महीना आध्यात्मिक चिंतन, सुधार और मुस्लिम धर्म के प्रति और अधिक श्रद्धा प्रकट करने का महीना है। इस पूरे महीने के दौरान इस्लाम के सिद्धांतों पर मन लगाना और सूर्य उदय से लेकर सूर्यास्त तक उपवास करना होता है। सूर्य निकलने से पहले के आहार को सुहूर और सूर्यास्त के बाद के आहार को इफ्तार कहा जाता है। कुरान के मुताबिक, रोजे के जरिए दुनियावीं चीज़ों से मन को दूर कर अपनी रूह को शुद्ध करने के लिए हानिकारक अशुद्धियों से मुक्त होना है।

हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ के के अग्रवाल ने बताया कि महीने भर के लिए उपवास करना हमारे शारीरिक प्रणाली के शुद्धिकरण और तन व मन को संतुलित करने के लिए एक अच्छा तरीका है। मधुमेह  जैसी बीमारियों से पीड़ित लोगों की सेहत के लिए भूखा रहना खतरनाक हो सकता है। यह बात मधुमेह पीड़ितों के मन से यह सवाल पैदा करती है कि रोजे रखें या न रखें। अपने धार्मिक अकीदे और भावनाओं को तरजीह दें या अपनी सेहत को। पढ़े- रोज़े रखने से आपकी सेहत हो सकती है बेहतर! जानिये कैसे

मेडिकल पहलुओं के आधार पर हम निम्नलिखित सलाह दे रहे हैं-

जिन्हें टाइप 1 डायबिटीज़ है उन्हें बिल्कुल भी भूखा नहीं रहना चाहिए क्योंकि उन्हें हाईपोग्लेसीमिया यानी लो ब्लड शूगर होने का खतरा रहता है।

आम तौर पर पाई जाने वाली टाइप 2 डायब्टीज वाले लोग रोजा रख सकते हैं लेकिन उन्हें नीचे दी गई बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए ताकि उनकी सेहत खराब ना हो-

1. स्लफोनाइल्योरियस और क्लोरप्रोप्माइड जैसी दवाएं रोजे के वक्त नहीं लेनी चाहिए क्योंकि इससे लंबे समय के लिए अवांछित लो ब्लड शूगर हो सकती है।

2. मैटफोरमिन, प्योग्लिटाजोन, रिपैग्लिनायड रोजे के दौरान ले सकते हैं।

3. लंबी अवधि की इनसूलिन की दवा जरूरत के अनुसार कर लेनी चाहिए और शाम के खाने से पहले लेनी चाहिए।

4. छोटी अवधि की इन्सुलिन सुरक्षित होती हैं।

5. अगर मरीज की शूगर 70 से कम हो जाए या 300 तक पहुंच जाए तो उसे तुरंत रोजा खोल लेना चाहिए।

डायबिटीज़ के सभी मरीज जो रमजान के दौरान रोजे रखने जा रहे हैं उन्हें शुरूआत में अपना चेकअप जरूर करवा लेना चाहिए और पूरे महीने में भी नियमित जांच करवाते रहना चाहिए। इससे ना सिर्फ उन्हें आवश्यक सावधानियों के बारे में जानकारी मिलती रहेगी बल्कि उन्हें अपनी रूटीन बनाने में भी मदद मिलेगी ताकि उनकी सेहत पर इसका कोई प्रभाव ना पड़े।

चित्र स्रोत: Shutterstock


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