क्या इनफर्टिलिटी का कारण भी बन सकता है डायबिटीज, हेल्थ एक्सपर्ट्स ने बताया इसके पीछे का कारण

डायबिटीज एक क्रॉनिक डिजीज है इस बारे में तो काफी लोग जानते हैं, लेकिन बहुत ही कम लोगों को इस बारे में जानकारी है कि यह इनफर्टिलिटी जैसी समस्याओं का कारण भी बन सकती है, जिसके बारे में हेल्थ एक्सपर्ट्स ने जानकारी दी।

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Written By: Mukesh Sharma | Published : December 7, 2024 6:31 PM IST

Diabetes and Infertility: मधुमेह (डायबिटीज) ऐसी क्रोनिक कंडीशन है जिससे आज दुनियाभर में लाखों लोग पीड़ित हैं। इसका आमतौर पर संबंधी हाइ ब्लड शूगर लेवल से होता है और इसके साथ ही, हृदय रोगों से जुड़ी जटिलताएं, न्यूरोपैथी तथा गुर्दों की समस्याएं भी पैदा हो जाती हैं। लेकिन, अक्सर इस बात को नजरंदाज कर दिया जाता है कि मधुमेह (डायबिटीज़) का असर फर्टिलिटी पर भी पड़ता है और यह प्रजनन स्वास्थ्य (रिप्रोडक्टिव हेल्थ) को नुकसान पहुंचाने वाला रोग है। महिलाओं और पुरुषों दोनों के मामलों में, डायबिटीज़ (टाइप 1 एवं टाइप 2 दोनों प्रकार की डायबिटीज़) से फर्टिलिटी काफी हद तक प्रभावित होती है और यह गर्भधारण तथा गर्भावस्था दोनों के लिए जोखिम बढ़ाने वाला रोग है। डॉ. राखी गोयल, बिरला फर्टिलिटी ऐंड आईवीएफ इस बारे में काफी महत्वपूर्ण जानकारियां दी जो आप इस लेख में पढ़ सकते हैं।

डायबिटीज से महिलाओं की फर्टिलिटी

मधुमेह (डायबिटीज) से ग्रस्त महिलाओं को रिप्रोडक्टिव हेल्थ के मामले में काफी चुनौतियां पेश आती हैं। इस कंडीशन के चलते शरीर में हार्मोनल बैलेंस बिगड़ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मासिक चक्र अनियमित होने लगता है और फर्टिलिटी भी कमजोर पड़ती है। इंसुलिन रेजिस्टेंस से, जो कि टाइप 2 डायबिटीज की प्रमुख विशेषता है, महिलाओं के शरीर में डिंब निर्माण की सामान्य प्रक्रिया के साथ छेड़छाड़ होती है जिसके कारण डिंबस्राव (ओवुलेशन) पर असर पड़ता है और गर्भधारण की संभावना घट जाती है। इसके अलावा, मोटापा और पोलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस), टाइप 2 डायबिटीज़ से जुड़ी कंडीशंस भी इंफर्टिलिटी का कारण बनती हैं। डायबिटीज़ से ग्रस्त महिलाओं की यौन उत्तेजना और लुब्रिकेशन में कमी आ सकती है, और इस वजह से भी गर्भधारण करना मुश्किल होता है।

रिप्रोडक्टिव ट्रीटमेंट्स पर प्रभाव

मधुमेह (डायबिटीज) के कारण रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी जैसे कि इन-विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ) के परिणामों पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। अध्ययनों से यह बात सामने आयाी है कि मधुमेह (डायबिटीज) रोगियों की डिंबग्रंथि (ओवरी) में डिंबों की संख्या कम हो सकती है और इस वजह से भी आईवीएफ ट्रीटमेंट की सफलता दर पर खराब असर पड़ता है। ऐसी महिलाओं की एम्ब्रयो क्वालिटी (भ्रूण की गुणवत्ता) भी कम होती है और इंप्लांटेशन रेट पर असर पड़ता है, जो प्रेग्नेंसी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है, यहां तक की मेडिकल सहायता से भी गर्भधारण में चुनौतियां पेश आ सकती हैं।

प्रेगनेंसी के दौरान जटिलताएं

मधुमेह (डायबिटीज़) से पीड़ित महिलाओं की समस्याएं केवल गर्भधारण तक ही सीमित नहीं रहतीं। प्रेग्नेंसी के दौरान उनके गर्भपात की आशंका और आगे चलकर प्रीटर्म लेबर, गेस्टेशनल डायबिटीज़ तथा सीज़ेरियन डिलीवरी भी हो सकती है। डायबिटीज रोगी मांओं के नवजात सामान्य से कम या अधिक वज़न के हो सकते हैं और इसके अलावा भी वे कई किस्म की जटिलताओं से ग्रस्त होते हैं। इस प्रकार के जोखिमों को कम करने के लिए ब्लड शूगर लेवल का सही तरीके से मैनेजमेंट और मेडिकल निगरानी में रहना बेहद महत्वपूर्ण होता है।

पुरुषों की फर्टिलिटी से जुड़ी पहेलीः डायबिटीज व स्पर्म  हेल्थ

मधुमेह (डायबिटीज़) का पुरुषों के रिप्रोडक्टिव स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है। अध्ययनों से यह बात सामने आयी है कि इंफर्टाइल पुरुषों में डायबिटीज़ की दर 0.7% से 1.4% तक है, जबकि डायबिटीज़ से पीड़ित पुरुषों में इंफर्टिलिटी 35% से 51% तक हो सकती है। ये आंकड़ें पुरुषों में बांझपन की समस्या के मामले में डायबिटीज की भूमिका की ओर इशारा करते हैं।

डायबिटीज व स्पर्म क्वालिटी

मधुमेह (डायबिटीज़) के कारण स्पर्म क्वालिटी (शुक्राणुओं की गुणवत्ता) पर भी कई तरह से असर पड़ता है। इसके कारण शुक्राणुओं की सांद्रता कम होती है, उनकी गतिशीलता और बनावट भी प्रभावित होती है, जबकि शुक्राणुओं में डीएनए विखंडन की प्रक्रिया बढ़ती है। डीएनए विखंडन से न सिर्फ प्राकृतिक रूप से गर्भधारण पर असर पड़ता है और भ्रूण की सेहत भी प्रभावित होती है और इनके चलते सफल प्रेग्नेंसी की संभावना कम होती है।

सेक्सुअल डिस्फंक्शन

सेक्सुअल डिस्फंक्शन भी मधुमेह (डायबिटीज़) से जुड़ी फर्टिलिटी संबंधी समस्या है। मधुमेह रोगियों में स्नायुओं और रक्तवाहिकाओं को नुकसान पहुंचने की वजह से स्तंभन दोष (इरेक्टाइल डिस्फंक्शन), प्रतिगामी स्खलन (रेट्रोग्रेड इजेक्युलेशन), या यौनेच्छा में कमी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।

डायबिटीज तथा इंफर्टिलिटी का भावनात्मक प्रभाव

मधुमेह (डायबिटीज) और फर्टिलटी के बीच केवल शारीरिक नाता ही नहीं है, बल्कि इसके भावनात्मक आयाम भी हैं। इंफर्टिलिटी से जूझने वाले कपल्स अक्सर तनावग्रस्त, चिंताग्रस्त और अवसादग्रस्त भी होते हैं जिसके परिणामस्वरूप उनकी सेहत और आपसी संबंधों पर भी असर पड़ता है। मधुमेह (डायबिटीज़) प्रबंधन के लिए भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्तरों पर भी सहायता की जरूरत होती है, खासतौर से उन कपल्स को जो गर्भधारण की कोशिश कर रहे होते हैं।

फर्टिलिटी पर डायबिटीज के प्रभावों को कम करना

हालांकि चुनौतियां अनेक हैं, लेकिन मधुमेह (डायबिटीज) रोगी अपने प्रजनन स्वास्थ्य की सुरक्षा और उसमें सुधार करने के लिए कुछ उपाय कर सकते हैं।

1.लाइफस्टाइल में सुधार

स्वास्थ्यवर्धक खानपान कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला संतुलित खानपान लें जिससे आपकी ब्लड शुगर को रेग्युलेट करने और हार्मोनल बैलेंस बनाने में मदद मिलती है।

नियमित व्यायामः शारीरिक गतिविधियों से इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार होता है और आपका वजन भी सामान्य बना रहता है, जो कि फर्टिलिटी के लिए महत्वपूर्ण है।

धूम्रपान छोड़ें तथा शराब का सेवन सामान्य मात्रा में करेंः रिप्रोडक्टिव हेल्थ की दृष्टि से लाइफस्टाइल में इन बदलावों को लाना जरूरी है।

2. मेडिकल मैनेजमेंट

ग्लाइसेमिक कंट्रोलः गर्भधारण का इरादा रखने वाले मधुमेह (डायबिटीज) पीड़ित महिलाओं एवं पुरुषों को ब्लड शूगर लेवल को मानक रेंज में रखना चाहिए।

फर्टिलिटी ट्रीटमेंट फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से परामर्श के मुताबिक ट्रीटमेंट प्लान तैयार करें जिसमें हार्मोन थेरेपी और रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी दोनों का मेल होना चाहिए।

प्रेगनेंसी के दौरान बचाव के उपाय

गर्भधारण से पूर्व काउंसलिंगः मधुमेह (डायबिटीज़) पीड़ित महिलाओं को प्रीकन्सेप्शन (गर्भधारण से पहले) काउंसलिंग लेनी चाहिए ताकि उचित ब्लड शूगर कंट्रोल सुनिश्चित करने के साथ-साथ संभावित जोखिमों को भी कम रखा जा सके।

रेग्युलर मॉनीटरिंगः प्रेग्नेंसी के दौरान हेल्थकेयर टीम द्वारा कड़ी निगरानी सुनिश्चित करने से मां और शिशु दोनों में जटिलताओं को कम करने के साथ-साथ परिणामों में भी सुधार होता है।

निष्कर्ष

मधुमेह (डायबिटीज) केवल ‘शूगर समस्या’ नहीं है, बल्कि इसका असर ब्लड ग्लूकोज़ लेवल से भी ज्यादा होता है और इसके कारण महिलाओं तथा पुरुषों दोनों में फर्टिलिटी एवं रिप्रोडक्टिव हेल्थ से जुड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। शुरू में ही डायग्नॉसिस होने, समुचित प्रबंधन और मल्टीडिसीप्लीनरी एप्रोच से इन प्रभावों को कम करने तथा परिवार बनाने के लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है। इन समस्याओं से निपटने के लिए केवल मेडिकल सहायता ही काफी नहीं होती बल्कि भावनात्मक सहयोग भी जरूरी होता है। साथ ही, सार्वजनिक स्तर पर इस बारे में जानकारी होने से कपल्स को डायबिटीज़ एवं इंफर्टिलिटी की चुनौतियों से आसानी से निपटने में भी मदद मिलती है।

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