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Written By: Yogita Yadav | Published : August 7, 2018 2:03 PM IST
स्मोकलैस तंबाकू यानी धुएं रहित तम्बाकू उत्पाद बीड़ी और सिगरेट से भी ज्यादा खतरनाक हैं। सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, अन्य ऐशियाई देशों के अलावा अमेरिका में भी हर साल लाखों लोग इसके सेवन से मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं।
स्मोकलैस तम्बाकू
"धुएं रहित तम्बाकू" का अर्थ है वे सभी उत्पाद जिनमें तम्बाकू की जरा सी भी मात्रा मौजूद है। इनकी मिठास और खुशबू के कारण लोग इन्हें माउथ फ्रेशनर समझते हैं और इन्हें चबाते हैं। चबाने के बाद निकलने वाले रस को वे थूक देते हैं। परंतु तब तक इनमें मौजूद निकोटीन मुंह के अंदरूनी हिस्से द्वारा अवशोषित किया जा चुका होता है।
सुप्रीम कोर्ट का है प्रतिबंध
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गुटखा की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया है। गुटखा के विक्रय पर प्रतिबंध लगने के बाद भी दुकानों में पान मसाला व तंबाकू की बिक्री की जा रही है। अलग-अलग पाउच में पान मसाला और तंबाकू का विक्रय करने पर संबंधित निर्माण कंपनियों, विक्रय एजेंसियों और दुकानदारों पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के तहत कार्रवाई करने का निर्देश है।
गुटखा फैक्ट्रियों के मजदूर
सिर्फ तंबाकू खाने वाले ही नहीं बल्कि गुटखा फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर और कामगार भी मुंह के कैंसर का शिकार बनते हैं। गुटखे में मौजूद माइक्रो पार्टिकल श्वास के माध्यम से इनके शरीर में प्रवेश करते हैं। जिससे श्वास नली और गला क्षतिग्रस्त होता है। आगे चलकर यह गले के कैंसर का भी रूप ले सकता है। जनजित के नाम पर हालांकि इन फैक्ट्रियों में मजदूरों को गुड़ वितरित किया जाता है, परंतु यह हर रोज होने वाली तंबाकू कंज्मशन के सामने नाकाफी है।
कई देश हैं प्रभावित
भारत, पाकिस्तान, अन्य एशियाई देशों और उत्तरी अमेरिका समेत कई देशों में लोग धुएं रहित तम्बाकू का लंबे समय से उपयोग करते आ रहे हैं। धुएं रहित तम्बाकू में मौजूद लगभग 28 रासायनिक घटक प्रकृति में कैंसरजन्य हैं, जिनमें से नाइट्रोसामाइन सबसे प्रमुख है। मौखिक सूक्ष्म फाइब्रोसिस (ओएसएमएफ) तंबाकू से उत्पन्न होने वाले प्रारंभिक विकार है, जो आगे चलकर माउथ कैंसर का रूप ले लेता है।
ये हैं प्रलोभन
कुछ देशों में पान का सांस्कृतिक महत्व है। जबकि पान का अर्थ केवल पत्ता है। जब इसमें तंबाकू लपेटा जाता है तो यह खतरनाक हो जाता है। इसके अलावा गुटखा बेचने वाली कंपनियां युवाओं को माउथ फ्रेशनर, डाइजेस्टिव, एंटी बैक्टीरियल, स्ट्रेस बस्टर आदि कहकर प्रलोभन देती हैं। जबकि कुछ देशों में बच्चे मिठास के कारण इसे कैंडी समझकर इसका उपभोग करते हैं।
नहीं हैं खाद्य पदार्थ
खाद्य एवं सुरक्षा अधिनियम 2011 की धारा 2, 3 व 4 के अनुसार तंबाकूयुक्त पदार्थ खाद्य पदार्थ की श्रेणी में नहीं माने जाते हैं। यही कारण है कि गुटखा बंद किए जा रहे हैं। इनमें निकोटिन होने के कारण लोगों को बीमारियां होने की संभावना होती है।
हर साल मर रहे हैं नौ लाख लोग
उत्तर प्रदेश सरकार ने गुटखा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की घोषणा तो की थी, लेकिन अब भी उत्तर प्रदेश में गुटखा फैक्ट्रियां धड़ल्ले से चल रही हैं। साथ ही अलग-अलग आकर्षक पाउच में देश भर में गुटखा बिक रहा है। सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में तंबाकू के उपयोग के कारण हर साल करीब 900,000 लोगों की जान चली जाती है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तंबाकू उत्पादक देश है।
चित्रस्रोत-Shutterstock.
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