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Medically Verified By: Dr. Vats Gupta
फैटी लिवर VS हेपेटाइटिस
आजकल खराब खानपान, मोटापा और कम एक्टिविटी वाली लाइफस्टाइल के कारण फैटी लिवर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। पहले तो लोग अपने शरीर में हो रहे बदलावों को अनदेखा कर देते हैं और जब समस्या गंभीर होती दिखती है तो इंटरनेट पर खुद अपना इलाज करना शुरु कर देते हैं। यही कारण है कि बहुत से लोगों को फैटी लिवर और हेपेटाइटिस के बीच का अंतर नहीं पता है।
पारस हेल्थ उदयपुर के जनरल फिजिशियन/इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉक्टर वत्स गुप्ता के अनुसार “फैटी लिवर एक डिजीज है जिसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। वहीं हेपेटाइटिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें लिवर में सूजन आ जाती है, जो वायरल संक्रमण, शराब, दवाइयों या ऑटोइम्यून बीमारियों के कारण हो सकती है।” डॉक्टर आगे कहते हैं कि दोनों ही बीमारियां लिवर को प्रभावित करती हैं, लेकिन इनके कारण, लक्षण और उपचार अलग-अलग होते हैं। सही समय पर पहचान और इलाज से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है। आइए जानते हैं कि इन दोनों बीमारियों में क्या अंतर है।
फैटी लिवर में लिवर की कोशिकाओं में सामान्य से अधिक फैट जमा हो जाता है। यह मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है-
नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD)- यह मोटापा, डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल और मेटाबॉलिक सिंड्रोम से जुड़ा होता है।
अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (AFLD)- यह अत्यधिक शराब के सेवन से होता है।
डॉक्टर बताते हैं कि शुरुआती चरण में फैटी लिवर के अधिकांश मरीजों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। कुछ लोगों को थकान, पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में भारीपन या हल्का दर्द महसूस हो सकता है।
हेपेटाइटिस यानी लिवर में सूजन। यह कई कारणों से हो सकता है, जिनमें सबसे प्रमुख हैं हेपेटाइटिस A, B, C, D और E वायरस। इसके अलावा शराब, कुछ दवाइयों का अधिक सेवन और ऑटोइम्यून रोग भी हेपेटाइटिस का कारण बन सकते हैं। डॉक्टर द्वारा इसके कुछ सामान्य लक्षण भी बताए गए हैं-
डॉक्टर गुप्ता कहते हैं, "हालांकि दोनों बीमारियां लिवर से संबंधित हैं, लेकिन इनकी प्रकृति अलग होती है और फैटी लिवर और हेपेटाइटिस में अंतर देखने को मिलते हैं।"
| फैटी लिवर | हेपेटाइटिस |
| फैटी लिवर में मुख्य समस्या लिवर में फैट का जमा होना होता है। | हेपेटाइटिस में लिवर में सूजन होती है। |
| फैटी लिवर अक्सर लाइफस्टाइल से जुड़ा होता है। | हेपेटाइटिस के प्रमुख कारण वायरल संक्रमण, शराब, कुछ दवाइयां या अन्य चिकित्सीय स्थितियां हो सकते हैं। |
| फैटी लिवर की स्थिति धीरे-धीरे गंभीर होकर लिवर फाइब्रोसिस, सिरोसिस और कुछ मामलों में लिवर कैंसर का कारण बन सकता है। | अगर हेपेटाइटिस का इलाज न किया जाए, तो, विशेषकर हेपेटाइटिस B और C, लंबे समय में स्थायी लिवर क्षति और सिरोसिस का जोखिम बढ़ा सकते हैं। |
अगर लगातार थकान, पेट के दाहिने हिस्से में दर्द, पीलिया, भूख में कमी, वजन का तेजी से घटना या लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT) की रिपोर्ट में असामान्यता दिखाई दे, तो तुरंत गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या हेपेटोलॉजिस्ट से परामर्श लेना चाहिए। जिन लोगों को मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या शराब के अधिक सेवन की आदत है, उन्हें नियमित रूप से लिवर की जांच करवानी चाहिए।
डॉक्टर कहते हैं कि फैटी लिवर और कई प्रकार के हेपेटाइटिस से बचाव काफी हद तक संभव है। बैलेंस डाइट लें, रेगुलर एक्सरसाइज करें, वजन कंट्रोल रखें, शराब का सेवन सीमित या बंद करें, गैर जरूरी दवाइयों से बचें और हेपेटाइटिस A एवं B के लिए उपलब्ध टीकाकरण अवश्य करवाएं। सुरक्षित रक्त चढ़ाने और संक्रमण से बचाव के उपाय अपनाना भी महत्वपूर्ण है।
फैटी लिवर और हेपेटाइटिस दोनों ही लिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन समय पर जांच, सही निदान और उचित उपचार से इनका प्रभाव काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। अगर लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय शुरुआती अवस्था में चिकित्सकीय सलाह ली जाए और स्वस्थ जीवनशैली अपनाई जाए, तो लिवर को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है। नियमित स्वास्थ्य जांच और जागरूकता ही गंभीर लिवर रोगों से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख जानकारी के लिए है। अगर आपको लिवर से जुड़ी कोई भी समस्या है तो उसे इस लेख के आधार पर ठीक करने की कोशिश न करें। समस्या का पता लगने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं और सही उपचार लें।