फैटी लिवर के खतरे युवाओं में साइलेंट किलर की तरह हैं
फैटी लिवर की बीमारी सामान्यतया युवाओं में होती है। हाल के कुछ सालों में फैटी लिवर की बीमारी के बाद लोगों को लिवर सिरोसिस होने की घटना बहुत तेजी से बढ़ी है। आंकड़ों की बात करें तो अमेरिका और ब्रिटेन में हर तीसरे युवा को कम या अधिक फैटी लिवर की बीमारी है।
फैटी लिवर के खतरे का असर सबसे ज्यादा युवाओं में होता है। हाल के कुछ सालों में फैटी लिवर के खतरे से लोगों को लिवर सिरोसिस होने की घटना बहुत तेजी से बढ़ी है। आंकड़ों की बात करें तो अमेरिका और ब्रिटेन में हर तीसरे युवा को कम या अधिक फैटी लिवर की बीमारी है। यह बीमारी सामान्यतया जीवनशैली की वजह से होती है। इस बीमारी को एक तरह से लिवर में फैट की अधिकता भी कहा जाता है। डॉक्टर फैटी लिवर के खतरे को साइलेंट किलर का नाम देते हैं।
फैटी लिवर है क्या
लिवर की कोशिकाओं में वसा अथवा फैट का होना सामान्य बात है किंतु, यह 5 प्रतिशत से अधिक होने लगे तो इसे फैटी लिवर कहेंगे। फैटी लिवर मुख्यतः दो प्रकार का होता है
अल्कोहलिक फैटी लिवर उन लोगों को ज्यादा होता है जो शराब या अल्कोहल का सेवन बहुत ज्यादा करते हैं।
नॉनल्कोहॉलिक फैटी लिवर किसी को भी हो सकता है। इसकी मुख्य वजह खान-पान का तरीका और जीवनशैली को माना जाता है।
फैटी लिवर के लक्षण
फैटी लिवर में सामान्यतः व्यक्ति को कोई तक़लीफ़ नहीं होती। एवं अधिकांशतः यह किसी और वज़ह से सोनोग्राफी कराने के दौरान चिकित्सक को दिख जाता है। अधिकांश लोगों में फैटी लिवर आजीवन कोई तक़लीफ़ नहीं देता, किन्तु फैटी लिवर की वज़ह से कुछ लोगों में लिवर की कोशोकाओं में इंफ्लामेशन आरम्भ हो जाता है। तब व्यक्ति को थकावट, हल्का पेट दर्द , चिड़चिड़ापन, भूख न लगने ज़ैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं।
लिवर कोशिकाओं के ख़राब होना आरम्भ होने पर पीलिया एवं आगे चल कर सिरहोसिस हो सकता है जिसमें पेट में पानी भरना या इडिमा हो सकता है। सिरहोसिस एक गंभीर समस्या होती है जिसका परमानेंट इलाज मात्र लिवर ट्रांसप्लांट होता है।
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किसको होता फैटी लिवर का अधिक खतरा
फैटी लिवर वयस्कों में 40 वर्ष की उम्र के बाद अधिक देखने मिलता है किंतु यह बच्चों को भी हो सकता है। खासकर बच्चों में मोटापा होने पर।
मोटापा कमर का साइज पुरुषों में 94 से मी से अधिक एवं महिलाओं में 80 सेंट मी से अधिक होना।
डायबिटीज, थायरॉइड, बी पी की समस्या होना।
अधिक वसा, शक्कर युक्त भोजन एवं कम वर्ज़िश करने वाले लोग।
स्मोकिंग, अल्कोहल का व्यसन।
हाई कोलेरट्रोल ,हाई लिपिड रक्त में होना।
स्टेरॉयड जैसी दवाओं का अधिक इस्तेमाल।
आनुवंशिक कारण।
इन्सुलिन रेजिस्टेंस। यह डायबिटीज आरम्भ होने के पहले की अवस्था होती है।
फैटी लिवर की जांच
फैटी लिवर का आरंभिक पता सोनोग्राफी से ही चलता है। जिसे उपरोक्त रिस्क फैक्टर्स होने पर करवा के देखा जा सकता है।
लिवर एंजाइम की रक्त जांचें जैसे एस जी पी टी इत्यादि से लिवर कोशिकाओं में इंफ्लामेशन तो विकसित नहीं हो रहा देखा जाता है।
फ़िब्रोसकैन नामक विशेष सोनोग्राफी फैटी लिवर ,कोशिकाओं को नुकसान तो नहीं पंहुचा रहा देखने की जाती है।
कभी कभार बॉयोप्सी की आवश्यकता भी आपके चिकित्सक महसूस कर सकते हैं। हल्का फैटी लिवर होने पर हालांकि किसी और जांच की आवश्यकता नहीं होती है।
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फैटी लिवर का इलाज
फैटी लिवर को ठीक करने किसी भी दवा की अलग से आवश्यकता नहीं होती। न ही किसी दवा से फैटी लिवर ठीक होता है।
मात्र डाइट एवं वर्ज़िश से इसे आगे बढ़ने से रोका जा सकता है। एवं अनेक केस में ठीक भी किया जा सकता है।
दवाएं रिस्क को बढ़ाने वाले कारक ज़ैसे शुगर, बीपी, थायरॉइड , कोलेस्ट्रॉल इत्यादि की दी जाती हैं यदि वे कारक मौजूद हों।
फैटी लिवर के खतरे
फैटी लिवर किस व्यक्ति में आगे बढ़ कर सिरहोसिस करवा देगा एवं किसमें नहीं यह जानने का कोई कारगर तरीका नहीं। अतः फैटी लिवर पता चलने पर
डाइट और व्यययम पर ध्यान देना आरम्भ कर देना चाहिए।
कभी कभार अत्यधिक मोटापा होने पर बेरियाटिक सर्जरी अथवा मोटापा कम करने वाली दवाओं की आवश्यकता होती है। किंतु मोटापा कम करने की दवाएं मन से कभी नहीं लेनी चाहिए , उनमें साइड इफ़ेक्ट की संभावना होती है।
फैटी लिवर के मरीजों की डाइट कैसी होनी चाहिए
तले खाने, सैचुरेटेड फैट न लेना
शक्कर की मात्रा को बहुत कम करना
फल, सब्ज़ियों, नट्स का इस्तेमाल पोषण में बढ़ाना।
व्य्यायम हफ़्ते में कम से कम 5 दिन जिनमें योगा, एरोबिक्स ज़ैसे दौड़ना, एवं वेट ट्रेनिंग का समावेश हो।
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