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Father's Day Special: 18 साल के बेटे ने एक किडनी देकर बचाई पिता की जान

फादर्स डे के मौके एक महज 18 साल के लड़के ने अपनी एक किडनी पिता को दान करके उसकी जान बचाई और अपने पिता को नया जीवन उपहार में दिया। पढ़े बेटे के साहत और आधुनिट मेडिकल टेक्नोलॉजी से जुड़ी ये कहानी।

Written By Mukesh Sharma
Published : June 20, 2026 7:36 PM IST

son donates kidney to father (Altered with AI)

हम अक्सर ऐसा कहते हैं कि हम कितनी भी कोशिश कर लें अपने माता-पिता का कर्ज नहीं चुका सकते हैं, लेकिन कुछ लोगों को इसका सौभाग्य प्राप्त हो जाता है। ऐसा ही एक मामला दिल्ली के पटपड़गंज में देखने को मिला जहां मैक्स हॉस्पिटल में आए एक 49 वर्षीय व्यवसायी व्यक्ति की जान बचाने के लिए उसके 18 वर्षीय पुत्र ने अपनी एक किडनी दान दी। कई घंटों तक चलने वाले इस ऑपरेशन में डॉक्टर की मेहनत, मॉटर्न ट्रांसप्लांट तकनीक की समझ और बेटे का अपने पिता के प्रति प्रेम व किडनी दान करने के लिए साहस एक व्यक्ति की जान बचाता है। कॉम्प्लेक्स एबीओ-इनकम्पैटिबल किडनी ट्रांसप्लांट के इस केस के बारे में हर किसी को जरूर जानना चाहिए।

मरीज को था गंभीर किडनी रोग

श्री आबिद रजा को रैपिडली प्रोग्रेसिव किडनी फेल्योर (RPKF) डायग्नोस हुआ था। इसका कारण एक दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी थी, जिसने उनकी किडनियों को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया था। धीरे-धीरे उनकी स्थिति बिगड़ती गई। किडनी ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा करते हुए वह डायलिसिस पर निर्भर हो गए थे। परिवार में कोई उपयुक्त और अनुकूल डोनर उपलब्ध न होने के कारण उनके सामने विकल्प लगातार सीमित होते जा रहे थे।

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बेटे ने दिखाया किडनी डोनेट करने का साहस

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आबिद रजा के पितुर अली रजा ने बढ़ते हुए किडनी डोनेट करने का फैसला लिया। इससे उनके पिता को नया जीवन देने का अवसर मिला। अली हमेशा से एक मेधावी और दृढ़ संकल्प वाले छात्र रहे हैं। उनकी विज्ञान विषय में विशेष रुचि रही है। कक्षा 12 की परीक्षा में 92 प्रतिशत अंक प्राप्त करने के बाद वे विज्ञान एवं अनुसंधान के क्षेत्र में करियर बनाने के उद्देश्य से बी.एससी. की पढ़ाई करने की तैयारी कर रहे थे। अपने शैक्षणिक जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण चरण में होने के बावजूद उन्होंने अपने पिता का जीवन बचाने के लिए बिना किसी हिचकिचाहट के यह निर्णय लिया और अपने परिवार के हित को सबसे ऊपर रखा।

लेकिन ब्लड ग्रुप नहीं हुआ मैच

किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था और इसलिए जांच के दौरान डॉक्टरों को पता लगा कि अली का ब्लड ग्रुप B+ था, जबकि उनके पिता का ब्लड ग्रुप O+ था। डॉक्टर्स के सामने यह एक बड़ी चुनौती बन रही थी, क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में कभी भी अलग-अलग ब्लड ग्रुप के दौरान किडनी ट्रांसप्लांट नहीं होता है।

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kidney transplant (Enhanced with AI)

हालांकि, इवैल्यूएशन प्रोसेस के दौरान डॉक्टरों के सामने एक नई चुनौती आई। सामान्य परिस्थितियों में अलग ब्लड ग्रुप होने पर किडनी ट्रांसप्लांट संभव नहीं होता। हालाकि, मैक्स हॉस्पिटल, पटपड़गंज की मल्टी-डिसिप्लिनरी ट्रांसप्लांट टीम भी हार मानने के लिए तैयार नहीं थी और उन्होंने एक एबीओ-इनकम्पैटिबल ट्रांसप्लांट की तैयारी की। एडवांस्ड डीसेंसिटाइजेशन प्रोटोकॉल, इंटेंसिव इम्यूनोलॉजिकल तैयारी, प्लाज्माफेरेसिस प्रोसिजर तथा अत्यंत सावधानी के साथ प्रीऑपरेटिव केयर के माध्यम से टीम ने ब्लड ग्रुप के कारण आई इस परेशानी को सावधानी के साथ पार किया और ट्रांसप्लांट को सक्षम बनाया।

बिना ब्लड ग्रुप मैच हुए भी किडनी ट्रांसप्लांट संभव

मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के डॉक्टर्स ने बताया कि लास्ट-स्टेज किडनी डिजीज से पीड़ित मरीजों के लिए किडनी ट्रांसप्लांट ही उपचार का सबसे प्रभावी विकल्प है। एबीओ-इनकम्पैटिबल ट्रांसप्लांट इस दिशा में हुई महत्वपूर्ण प्रगतियों में से है। इससे उन मरीजों को भी उम्मीद की किरण दिखी है, जिन्हें कम्पैटिबल डोनर खोजने में मुश्किल होती है। इस मामले में मरीज की मेडिकल हिस्ट्री भी काफी जटिल थी। इस कारण से प्रत्यारोपण की पूरी प्रक्रिया के दौरान बहुत सावधानी से प्लान करने और निगरानी की जरूरत थी। यह सफल परिणाम दर्शाता है कि आधुनिक इम्यूनोलॉजिकल प्रोटोकॉल और मल्टी-डिसिप्लिनरी एक्सपर्टीज ट्रांसप्लांट से जुड़ी बड़ी बाधाओं को भी पार करने में सक्षम हैं।”

सर्जरी के तुरंत बाद करने लगी किडनी काम

डॉक्टर की मेहनत और स्किल्स की मदद से ऑपर्शन सक्सेफुल हुआ और ट्रांसप्लांट के बाद श्री आबिद रजा में ट्रांसप्लांट की गई किडनी ने सही तरह से काम करना शुरू कर दिया। खास बात यह रही कि सर्जरी के तुरंत बाद ही नई किडनी काम करने लगी। रिकवरी के दौरान उनकी किडनी की कार्यक्षमता में काफी सुधार देखा गया और हफ्ते भर में ही मरीज की स्टेबल कंडीशन देखते हुए उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। वहीं, डोनर सर्जरी के बाद अली भी पूरी तरह स्वस्थ हैं और उन्हें चार दिनों के भीतर अस्पताल से छुट्टी मिल गई।

यह सफल परिणाम एडवांस्ड किडनी ट्रांसप्लांट और जटिल एबीओ-इनकम्पैटिबल ट्रांसप्लांट के मामले में मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज की विशेषज्ञता को और मजबूत करता है। यह उपलब्धि एक समर्पित मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम के सहयोग का परिणाम है, जो विश्वस्तरीय प्रत्यारोपण सेवाएं प्रदान करने और मरीजों के लिए इलाज के नतीजों को बेहतर बनाने के लिए निरंतर कार्यरत है।

डिसक्लेमर: इस लेख का उद्देश्य केवल ऑटिज्म की समस्या और उसकी देखभाल से जुड़ी कुछ जरूरी जानकारी देना है और इसमें दी गई जानकारी का इस्तेमाल ऑटिज्म या किसी भी बीमारी के इलाज के लिए नहीं है और उसके लिए आपको डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।