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एस्थेटिक और हेयर रेस्टोरेशन प्रोसीजर में मरीजों की सुरक्षा, डॉक्टरों की ट्रेनिंग और फर्जी ऑनलाइन लिस्टिंग को लेकर देश की प्रमुख मेडिकल बॉडीज ने गंभीर चिंता जताई है। इंडियन एसोसिएशन ऑफ डर्मेटोलॉजिस्ट, वेनेरोलॉजिस्ट एंड लेप्रोलॉजिस्ट (IADVL) और एसोसिएशन ऑफ प्लास्टिक सर्जन्स ऑफ इंडिया (APSI) ने कहा कि स्किन, हेयर और कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट्स के क्षेत्र में बिना पर्याप्त मेडिकल ट्रेनिंग वाले लोगों की बढ़ती मौजूदगी मरीजों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
मेडिकल बॉडीज ने कहा कि यह मुद्दा उस समय और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, जब डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया (DCI) द्वारा डेंटिस्ट्स एक्ट, 1948 के तहत MDS डेंटल सर्जनों को कुछ एस्थेटिक प्रोसीजर और हेयर ट्रांसप्लांटेशन करने की अनुमति दिए जाने का मामला सामने आया। एसोसिएशन्स का कहना है कि इस तरह के प्रोसीजर पारंपरिक रूप से नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत प्रशिक्षित डर्मेटोलॉजिस्ट और प्लास्टिक सर्जन जैसे विशेषज्ञों द्वारा किए जाते रहे हैं।
IADVL के प्रेसिडेंट डॉ. विनय सिंह ने कहा कि हेयर ट्रांसप्लांट जैसे प्रोसीजर केवल तकनीकी काम नहीं हैं, बल्कि इनके लिए एस्थेटिक प्रोसीजर और डर्मेटोलॉजी में अतिरिक्त विशेषज्ञता जरूरी होती है।उन्होंने बताया कि MBBS के बाद डर्मेटोलॉजिस्ट बनने के लिए मान्यता प्राप्त मेडिकल संस्थानों में डर्मेटोलॉजी में पोस्टग्रेजुएट स्तर पर तीन साल की रेजिडेंसी करनी होती है। इस ट्रेनिंग में त्वचा रोग, बालों की समस्याएं और एडवांस्ड डर्मेटोलॉजिकल प्रोसीजर का गहन अध्ययन शामिल होता है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद प्लास्टिक सर्जन डॉ. रजत गुप्ता ने मरीजों से अपील की कि वे किसी भी स्किन, हेयर या कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट से पहले डॉक्टर की योग्यता और स्टेट मेडिकल काउंसिल में उनका रजिस्ट्रेशन अवश्य जांच लें। उन्होंने कहा कि डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन नंबर प्रिस्क्रिप्शन पर साफ तौर पर लिखा होना चाहिए और मरीजों को इलाज से पहले यह जांचना चाहिए कि हेल्थ एक्सपर्ट वास्तव में रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर हैं या नहीं।

डॉ. आदित्य अग्रवाल, सीनियर कंसल्टेंट, प्लास्टिक सर्जरी, Medanta ने कहा कि हेयर ट्रांसप्लांट और अन्य एस्थेटिक सर्जिकल प्रोसीजर के लिए स्किन की बायोलॉजी, बालों के डिसऑर्डर, इन्फेक्शन कंट्रोल और हेयर ट्रांसप्लांट के बाद होने वाले इंफेक्शन को संभालने की गहरी समझ बेहद जरूरी है। उनके अनुसार, हेयर ट्रांसप्लांटएक आधुनिक मेडिकल प्रोसीजर है और इसे केवल ऐसे रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर्स द्वारा किया जाना चाहिए।
हेल्थ एक्सपर्ट्स ने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामलों में बढ़ोतरी हुई है, जिनमें पर्याप्त योग्यता के बिना लोगों पर एस्थेटिक मेडिकल प्रोसीजर करने के आरोप लगे हैं। इस संदर्भ में कानपुर हेयर ट्रांसप्लांट केस का भी उल्लेख किया गया, जिसमें हेयर ट्रांसप्लांट के बाद दो इंजीनियरों की मौत हो गई थी। आरोप है कि यह प्रोसीजर एक डेंटल सर्जन द्वारा किया गया था। विशेषज्ञों ने दावा किया कि देश के कई हिस्सों से ऐसे अन्य मामले भी सामने आए हैं, जिनमें बिना योग्य मेडिकल प्रैक्टिशनर्स द्वारा किए गए एस्थेटिक प्रोसीजर के कारण गंभीर संक्रमण, आंखों की रोशनी जाने जैसी कई गंभीर घटनाएं सामने आई हैं।
IADVL की ऑनरेरी नेशनल सेक्रेटरी जनरल डॉ. शीतल पुजारी ने कहा कि स्किन डिजीज, हेयर डिसऑर्डर और सर्जिकल कॉम्प्लीकेशंस के मैनेजमेंट में पर्याप्त मेडिकल ट्रेनिंग के बिना किसी को ऐसे प्रोसीजर करने की अनुमति देना न केवल ट्रेनिंग स्टैंडर्ड्स को कमजोर कर सकता है, बल्कि मरीजों के जोखिम को भी बढ़ा सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि बिना उचित प्रशिक्षण वाले पेशेवरों को एस्थेटिक और हेयर रेस्टोरेशन प्रक्रियाओं में शामिल करने से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों ने कहा हाल के वर्षों में बोटॉक्स, हेयर ट्रांसप्लांट, थ्रेड लिफ्ट और अन्य एस्थेटिक ट्रीटमेंट्स की मांग तेजी से बढ़ी है। ऐसे में युवा उपभोक्ता ऑनलाइन मार्केटिंग, सोशल मीडिया और डिजिटल विज्ञापनों के जरिए आसानी से प्रभावित हो रहे हैं। मेडिकल बॉडीज ने कहा कि स्किन और बालों की समस्याओं को लेकर सोशल मीडिया का बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल हो रहा है, जहां लोग केमिस्ट या अन्य गैर-चिकित्सकीय व्यक्तियों की सलाह पर दवाएं और ट्रीटमेंट शुरू कर देते हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में फर्जी ऑनलाइन लिस्टिंग और भ्रामक विज्ञापनों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। एक्सपर्ट्स ने कहा कि कई वेबसाइट्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म पेड ऐड प्लेसमेंट के जरिए ऐसे लोगों को “डर्मेटोलॉजिस्ट” के रूप में प्रमोट कर रहे हैं, जिनके पास पर्याप्त या सत्यापित मेडिकल क्वालिफिकेशन नहीं होती। ऐसी भ्रामक लिस्टिंग आम लोगों को गुमराह कर सकती हैं और गलत हाथों में इलाज कराकर उनकी सेहत को गंभीर खतरे में डाल सकती हैं।
डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. दीपिका पंडी ने कहा कि मेडिकल प्रैक्टिस से जुड़े विज्ञापनों और मार्केटिंग को नियंत्रित करने के लिए अधिक औपचारिक और कानूनी नियंत्रण व्यवस्था की जरूरत है। उनका कहना था कि जिस तरह मेडिकल ट्रीटमेंट को नियमों के तहत नियंत्रित किया जाता है, उसी तरह उसके प्रचार-प्रसार और डिजिटल प्रमोशन पर भी स्पष्ट निगरानी होनी चाहिए।
इस बीच IADVL की तमिलनाडु शाखा ने डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया की 6 दिसंबर 2022 की गाइडलाइंस को चुनौती देते हुए मद्रास हाई कोर्ट में कानूनी कार्रवाई शुरू की है। रिट पिटीशन नंबर 36164 और 12044 ऑफ 2024 के तहत दायर इस याचिका में कहा गया है कि ओरल और मैक्सिलोफेशियल सर्जनों को कुछ एस्थेटिक और हेयर ट्रांसप्लांट प्रोसीजर की अनुमति देने वाली गाइडलाइंस को दोबारा परखा जाना चाहिए।
बताया गया कि 21 जनवरी 2026 को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया और नेशनल मेडिकल कमीशन के बीच रेगुलेटरी टकराव पर ध्यान दिया और केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को मामले की जांच कर मरीजों की सुरक्षा के हित में स्पष्ट रेगुलेटरी दिशा-निर्देश सुनिश्चित करने के लिए जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
मेडिकल एसोसिएशन्स ने सरकार से मांग की है कि इस पूरे मामले में स्पष्ट और विस्तृत गाइडलाइंस जारी की जाएं और मौजूदा नियमों को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि झोलाछाप और बिना लाइसेंस वाले लोगों पर रोक लगाई जा सके। साथ ही आम लोगों से अपील की गई है कि वे किसी भी तरह के स्किन, हेयर या कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट से पहले डॉक्टर की डिग्री, अनुभव और मेडिकल रजिस्ट्रेशन की जांच जरूर करें।
विशेषज्ञों का कहना है कि मरीजों की सुरक्षा किसी भी एस्थेटिक या कॉस्मेटिक ट्रेंड से ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसे में जागरूकता, सख्त निगरानी और सही रेगुलेशन ही इस बढ़ते खतरे को रोकने का सबसे प्रभावी रास्ता हो सकते हैं।
Disclaimer : प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।