सही समय पर कैंसर की जांच कराने से कैसे मरीज का जीवन बचाया जा सकता है?

Cancer Screening: कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से अपनी जान बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि आप समय-समय पर अपनी जांच कराते रहें। इस लेख में जानें किन लोगों को कब जांच कराते रहना चाहिए।

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Written By: Mukesh Sharma | Updated : April 10, 2026 8:23 PM IST

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Medically Verified By: Dr. Sandeep Kumar Mohan

Cancer Treatment in Hindi: कैंसर एक बेहद गंभीर और जानलेवा बीमारी है और शायद हर कोई इस बारे में जानता भी है। लेकिन इसके साथ-साथ यह जानना भी जरूरी है कि कैंसर कभी भी शरीर में रातोंरात विकसित नहीं होता है। बल्कि यह शरीर के अंदर चुपचाप और धीरे-धीरे बढ़ता है और जब तक इसके लक्षण दिखाई देते हैं, यह गंभीर रूप ले चुका होता है। कैंसर की यही बात उसे जितना वह वास्तव में गंभीर है, उससे कई गुना ज्यादा गंभीर बना देती है। डॉ. संदीप मोहन, कंसल्टेंट, सर्जिकल ऑन्कोलॉजी, मणिपाल हॉस्पिटल्स, गुरुग्राम के अनुसार कैंसर को समय पर पहचान करने के लिए नियमित रूप से जांच कराते रहना जरूरी होता है। अगर रोग को समय पर पहचान लिया जाए, तो उसे आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है, तथा इलाज के सफल होने की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है।

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समय रहते जांच का महत्व

कैंसर होने का मतलब ही ये होता है कि प्रभावित कोशिकाओं का असामान्य और अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगना। अगर समय पर इसकी पहचान न हो, तो यह शरीर के कई अंगों तक फैल सकता है। आम तौर से होने वाले कैंसर स्तन कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, कोलोरेक्टल कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर और ओरल कैंसर हैं, जिनकी जांच लक्षण पैदा होने से पहले की जा सकती है, क्योंकि ये कैंसर लक्षणों से पहले शरीर में कुछ बदलाव प्रकट करते हैं।

कैंसर की जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि, स्क्रीनिंग में उन मरीजों की मेडिकल जांच की जाती है, जो रोग का कोई भी लक्षण प्रकट नहीं करते हैं। इस जांच का उद्देश्य शरीर में कैंसर से पहले होने वाले बदलावों की पहचान करना है। कैंसर स्क्रीनिंग से कैंसर का पता उस समय लगाया जा सकता है, जब बीमारी बिल्कुल शुरुआती चरण में होती है। इस समय इसका इलाज बहुत आसान और प्रभावशाली होता है। असरदार इलाज के लिए मेडिकल जांच द्वारा कैंसर को समय पर पहचानना बहुत महत्वपूर्ण होता है।

कैंसर की समय पर पहचान करने के लिए मेडिकल जांच

कैंसर के शुरुआती चरणों को सामान्य परीक्षणों की मदद से उस समय भी पहचाना जा सकता है, जब शरीर में इसके कोई लक्षण न हों।

  • मैमोग्राफी (स्तन कैंसर): इसमें लो-डोज एक्सरे की मदद से स्तन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों और गाँठों को पहचाना जाता है।
  • पैप स्मियर और एच.पी.वी टेस्ट (सर्विकल कैंसर): यह कोशिकाओं के असामान्य व्यवहार और एच.पी.वी संक्रमण की पहचान करता है, जिसकी वजह से सर्विकल कैंसर हो सकता है।
  • कोलोनोस्कोपी (कोलोरेक्टल कैंसर): इसके द्वारा कोलोन और रेक्टम में पॉलिप्स या शुरुआती कैंसर की पहचान की जाती है।
  • ओरल कैंसर स्क्रीनिंग: मुंह की जांच करके असामान्य छालों, चकत्तों या असामान्य विकास की पहचान करना।
  • पी.एस.ए टेस्ट (प्रोस्टेट कैंसर): इसमें पी.एस.ए लेवल के लिए खून की जाँच की जाती है, ताकि प्रोस्टेट की समस्याओं को पहचाना जा सके।
  • लो-डोज सीटी स्कैन: इसके माध्यम से खासकर धूम्रपान करने वाले या ज्यादा जोखिम वाले लोगों के फेफड़ों में होने वाले बदलावों को देखा जाता है।

समय पर पहचान करने से क्या होगा?

अगर कैंसर की पहचान समय पर हो जाए, तो इलाज आसान होता है। कैंसर का इलाज कीमोथेरेपी, टारगेटेड थेरेपी, हार्मोन थेरेपी, या रेडियेशन द्वारा किया जाता है। इलाज के लिए किस विधि का उपयोग करना है, यह कैंसर के प्रकार और स्टेज के आधार पर तय होता है। इलाज की प्रक्रिया में शरीर को कम से कम प्रभावित किए बिना कोशिकाओं को असामान्य रूप से बढ़ने से या तो रोका जाता है या फिर नष्ट किया जाता है। लेकिन अगर कैंसर ज्यादा बढ़ चुका है, तो सर्जरी भी की जा सकती है। अगर कैंसर को समय पर पहचान लिया जाता है, तो मरीज को निम्नलिखित लाभ होते हैं -

  • सर्वाइवल की अधिक संभावना - समय पर कैंसर का निदान उसके सफल इलाज की संभावना को बहुत बढ़ा देता है, जिससे मरीज को बेहतर नतीजे मिलते हैं। समय पर निदान और इलाज होने से कैंसर के कारण मृत्यु का खतरा काफी कम हो सकता है।
  • छोटे चीरे वाली सर्जरी - कैंसर के शुरुआती चरण में छोटे चीरे वाली सर्जरी से काम चल जाता है, जिससे मरीज पर शारीरिक, मानसिक और वित्तीय भार कम पड़ता है।
  • बीमारी के फैलने पर रोक - प्री-कैंसर स्टेज में कैंसर की पहचान होने पर उसके गंभीर होने से पहले ही उसे ठीक किया जा सकता है।
  • बेहतर जीवन - समय पर इलाज शुरू हो जाने पर जटिलताएं कम होती हैं और मरीज ज्यादा जल्दी अपना सामान्य जीवन शुरू कर पाते हैं।

कब जांच करानी चाहिए

स्क्रीनिंग अलग-अलग लोगों के अनुसार अलग-अलग होती है। स्क्रीनिंग की जरूरत और फ्रीक्वेंसी इस बात पर निर्भर होती है कि मरीज की उम्र क्या है, वह महिला है या पुरुष, परिवार में कोई कैंसर का इतिहास है या नहीं, मरीज की जीवनशैली क्या है और उनका मौजूदा स्वास्थ्य कैसा है। महिलाओं को एक विशेष उम्र के बाद नियमित तौर से स्तन और सर्वाइकल कैंसर की जांच कराते रहना चाहिए।

वहीं धूम्रपान करने वाले लोगों को फेफड़ों के कैंसर की जांच कराना चाहिए। इसी प्रकार, 45 साल से अधिक उम्र वाले लोगों या फिर ज्यादा जोखिम वाले लोगों को इस उम्र से पहले भी कोलोरेक्टल कैंसर की जांच कराते रहना चाहिए। कैंसर स्क्रीनिंग केवल बीमारी की पहचान करने के लिए नहीं, बल्कि अपने स्वास्थ्य पर अपना नियंत्रण रखने के लिए कराई जाती है।

हम समय पर कार्रवाई करके कई जटिलताओं को रोक सकते हैं, इलाज के नतीजों को बेहतर बना सकते हैं और कैंसर पर नियंत्रण पाकर एक स्वस्थ भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।

अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्ट‍िकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

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