स्तनपान के दौरान क्यों खराब होता है मानसिक स्वास्थ्य और ऐसे में क्या करें माताएं?

Breastfeeding and Mental health: पहली बार ब्रेस्टफीडिंग हर माता के लिए एक नया अनुभव होता है, जो कई बार उसके जीवन को भी बदल देता है। इस दौरान कई महिलाएं मानसिक रूप से बीमार भी पड़ जाती हैं।

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Written By: Mukesh Sharma | Updated : August 26, 2025 1:18 PM IST

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Medically Verified By: Dr. Priya Gupta

Effects of Breastfeeding on Mother Mental Health: पहली बार मां बनने का अनुभव जितना खास होता है, उतना ही इसमें कई तरह की उलझनें भी जुड़ी रहती हैं। खुशियों के बीच अनिश्चितता और चिंताएं भी घेर लेती हैं, खासतौर पर जब बात बच्चे को दूध पिलाने की आती है। कभी लगता है कि दूध पर्याप्त है या नहीं, तो कभी बच्चे का वजन बढ़ने को लेकर चिंता सताती है। ऐसे में ये छोटे-छोटे सवाल जल्दी ही बड़ी परेशानी का रूप ले लेते हैं और मां के आत्मविश्वास को हिला सकते हैं। लेकिन अगर सही सलाह, भावनात्मक सहारा और कुछ आसान उपाय मिल जाएं, तो ये चिंताएं धीरे-धीरे दूर हो सकती हैं। इससे मां बेफिक्र होकर अपने नन्हे शिशु के साथ एक गहरा और प्यारा रिश्ता बनाने पर ध्यान दे सकती है। डॉ. प्रिया गुप्ता, सीनियर कंसल्टेंट, गायनेकोलॉजी एंड ऑब्सटेट्रिक्स  और मिस तमन्ना भनोट, लैक्टेशन काउंसलर, कोकून हॉस्पिटल, जयपुर आपको इस बारे में विस्तार से बता रही हैं।

माताओं की उलझनें और दबाव

बच्चे के जन्म से पहले ही मां की पोषण यात्रा शुरू हो जाती है, लेकिन पहली बार मां बनने वाली महिलाओं के लिए यह सफर आसान नहीं होता। समाज की अपेक्षाएं, परिवार की लगातार सलाह और इंटरनेट की अधूरी जानकारी उन्हें उलझा सकती है। यदि दूध बनने में देरी हो, बच्चा सही से न चूस पाए या निप्पल में दर्द हो, तो मां मानसिक दबाव महसूस करने लगती है। वहीं, जो महिलाएं फार्मूला दूध चुनती हैं, उन्हें अक्सर आलोचना का सामना करना पड़ता है, जिससे उनका आत्मविश्वास डगमगा सकता है। ऐसे में सही जानकारी और भावनात्मक सहयोग बेहद जरूरी है।

(और पढ़ें - बच्चों के लिए क्यों जरूरी है मां का दूध)

स्तनपान और भावनाएं

दूध पिलाने से जुड़ी परेशानियां केवल शारीरिक नहीं होतीं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी मां को प्रभावित करती हैं। जब स्तनपान की प्रक्रिया उम्मीद के अनुसार नहीं चलती, तो मां खुद को दोषी मानने लगती है और अपने भीतर असफलता का भाव महसूस करती है। यह आत्मग्लानि धीरे-धीरे प्रसवोत्तर उदासी या चिंता (पोस्टपार्टम ब्लूज) में बदल सकती है। इसकी एक मुख्य वजह है- खुद की तुलना दूसरी मांओं से करना। जबकि सच यह है कि हर मां और बच्चे का सफर अलग होता है। खुद को दोष न देना ही आत्मविश्वास की ओर पहला कदम है।

आत्मविश्वास कैसे बढ़ाएं?

लैक्टेशन काउंसलर और बाल रोग विशेषज्ञ जैसी विशेषज्ञ मदद मां को सही दिशा दिखा सकती है। वे दूध पिलाने की तकनीक देखकर बताते हैं कि कहां दिक्कत है और आसान उपाय सुझाते हैं, जिससे मां को बेवजह की कोशिशों से बचाव होता है। ऐसे समय में सबसे अच्छा है कि माताएं भरोसेमंद स्रोतों और अस्पताल के कार्यक्रमों पर भरोसा करें, न कि इंटरनेट या इधर-उधर की पुरानी सलाह पर। हर बच्चे की भूख और खानपान का पैटर्न अलग होता है। कभी बच्चा बार-बार दूध मांगेगा (क्लस्टर फीडिंग), कभी अचानक ज्यादा भूख लगेगी , और कभी कम खाएगा– ये सब बिल्कुल सामान्य बातें हैं। अगर मां को ये समझ हो तो वह घबराएगी नहीं। साथ ही, सपोर्ट ग्रुप, ऑनलाइन कम्युनिटी या दोस्तों से जुड़ना मां को यह अहसास कराता है कि वह अकेली नहीं है। पति या परिवारजन जब इस सफर में साथ देते हैं, तो मां का भावनात्मक बोझ काफी हल्का हो जाता है और सबसे जरूरी – गलतियां होना इस सफर का हिस्सा है। छोटी-छोटी सफलताओं को पहचानना, खुद को पॉजिटिव बातें कहना और थोड़ी देर के लिए आराम लेना, मां को आत्मविश्वास और हौसला बनाए रखने में मदद करता है।

(और पढ़ें - ब्रेस्टफीडिंग के दौरान की जाने वाली गलतियां)

स्वास्थ्य सेवाएं और भावनात्मक सहयोग

नई माताओं को सहयोग देने में स्वास्थ्य प्रणाली की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। जब बच्चा जन्म लेता है, तभी से माँ को सही दिशा और आत्मविश्वास की जरूरत होती है। ऐसे में अस्पतालों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रसव के बाद मांओं को स्तनपान से जुड़ा सहयोग मिले। इसके लिए न सिर्फ़ व्यक्तिगत मार्गदर्शन, बल्कि नियमित वर्कशॉप और ट्रेनिंग सत्र आयोजित किए जाएं, जहां मांओं को दूध पिलाने की तकनीक, सही पॉजिशन और आम समस्याओं के समाधान सिखाए जाएं। सिर्फ अस्पताल ही नहीं, बल्कि समुदाय स्तर पर भी ऐसी पहलें होना जरूरी हैं। पीयर काउंसलिंग प्रोग्राम (जहां एक मां दूसरी मां की मदद करती है) नई मांओं के लिए बहुत सहायक साबित हो सकते हैं। खासकर उन इलाकों में, जहां विशेषज्ञ डॉक्टर या अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, वहां इस तरह के कार्यक्रम मांओं का भरोसा बढ़ाते हैं और उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होने देते। इस तरह स्वास्थ्य प्रणाली और समुदाय दोनों मिलकर एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम बना सकते हैं, जिससे हर मां अपने बच्चे की परवरिश आत्मविश्वास और सुकून के साथ कर सके।

मदद लेना कमजोरी नहीं, समझदारी है

अगर स्तनपान से जुड़ी चिंताएं मां के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने लगें, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कई बार दूध की कमी, बच्चे का सही से न चूस पाना या दूसरों से लगातार तुलना करने जैसी बातें मां के मन में अपराधबोध भर देती हैं। धीरे-धीरे यह चिंता और तनाव बढ़कर उदासी या हताशा में बदल सकता है। अगर यह स्थिति लगातार बनी रहे, तो यह मां की भावनात्मक सेहत के साथ-साथ बच्चे की देखभाल पर भी असर डाल सकती है। ऐसे समय पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से मदद लेना बेहद जरूरी है। डॉक्टर या काउंसलर न सिर्फ मां को उसकी भावनाओं को समझने में मदद करते हैं, बल्कि व्यावहारिक उपाय और तनाव कम करने की तकनीक भी सिखाते हैं। परिवार और करीबी लोगों को भी मां को यह भरोसा दिलाना चाहिए कि वह अकेली नहीं है और मदद लेना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है। मां का मानसिक स्वास्थ्य जितना मज़बूत होगा, उतना ही वह अपने बच्चे को प्यार, धैर्य और आत्मविश्वास से पाल सकेगी। इसलिए अपराधबोध या उदासी को दबाने के बजाय समय रहते विशेषज्ञ की सलाह लेना मां और बच्चे दोनों की भलाई के लिए आवश्यक है।

पूर्णता हमेशा आवश्यक नहीं

स्तनपान सिर्फ पोषण देने का साधन नहीं है, बल्कि मां और बच्चे के बीच गहरा भावनात्मक रिश्ता बनाने का जरिया भी है। पहली बार मां बनने वाली महिलाओं पर अक्सर सब कुछ बिल्कुल सही करने का दबाव होता है, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि पूर्णता हमेशा आवश्यक नहीं है। सही सहयोग और लचीलापन अपनाकर मां अपने बच्चे के लिए सुरक्षित, पोषित और स्नेहमय माहौल तैयार कर सकती है। एक आत्मविश्वासी मां वह नहीं है, जिसे कभी चिंता न हो, बल्कि वह है जो अपनी चिंताओं का साहस और समझदारी से सामना करती है और जरूरत पड़ने पर मदद मांगने से हिचकिचाती नहीं। यही दृष्टिकोण मां और बच्चे दोनों के लिए मातृत्व की यात्रा को और भी सुखद और संतुलित बना देता है।

अस्वीकरण: प्रिय पाठकों यह आर्ट‍िकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

FAQs

ब्रेस्टफीडिंग के दौरान कमजोरी से कैसे बचें?

ब्रेस्टफीडिंग के दौरान महिलाओं को अपनी डाइट में आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन से भरपूर फूड्स शामिल करना चाहिए। साथ ही अधिक से अधिक मात्रा में पानी पीने से भी कमजोरी और थकान से बचने में मदद होती है।

ब्रेस्टफीडिंग से मां को क्या फायदे होते हैं?

ब्रेस्टफीडिंग कराने से न्यू मदर्स के शरीर में ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन रिलीज होता है।  ये हार्मोन्स गर्भाशय को उसके सामान्य आकार में लाने में मदद करते हैं।

क्या ब्रेस्टफीडिंग मदर्स को देसी घी खाना चाहिए?

हां, महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान और प्रेगनेंसी के बाद भी जब वे ब्रेस्टफीडिंग करा रही हों उस दौरान  देसी घी का सेवन जरूर करना चाहिए। देसी घी से हेल्दी फैट्स और विटामिन डी प्राप्त होता है जो महिलाओं की हड्डियों को मजबूत करता है।

ब्रेस्टफीडिंग के दौरान डाइट कैसी होनी चाहिए?

बच्चे को ब्रेस्टफीड कराने वाली महिलाओं को हल्का और सुपाच्य भोजन खाना चाहिए। प्रोटीन और डाइटरी फाइबर वाले फूड्स का सेवन अधिक करें। इसके साथ ही विटामिन डी के लिए दूध और अन्य डेयरी प्रॉडक्ट्स का सेवन जरूर करें।    

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