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डाउन सिंड्रोम के बारे में लोग ठीक तरह से समझ नहीं पाते और इसीलिए, लोगों में डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) की बीमारी और इसके मरीजों को लेकर कई तरह की गलतफहमियां (Myths about people with down syndrome) होती हैं। लोगों को लगता है कि डाउन सिंड्रोम वाले लोग जीवन में आत्मनिर्भर नहीं हो सकते या अन्य लोगों की तरह पढ़ना-लिखना या किसी तरह का काम कर पाना इन लोगों के लिए मुश्किल होता है। लेकिन, सही समय पर बीमारी की पहचान, डॉक्टर की मदद और सही तरह के करियर गाइडेंस (Career guidance in down syndrome) की मदद से डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बहुत से लोगों ने इन मिथकों (Myths related to Down Syndrome) को ना केवल तोड़ा है बल्कि अपनी निजी जिंदगी और प्रोफेशनल लाइफ में भी बहुत बेहतर साबित हुए हैं।
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ ( National Institute of Health -NIH) की एक नयी रिपोर्ट के अनुसार, हर साल भारत में ऐसे 30 हजार नये बच्चों का जन्म होता है जिन्हें डाउन सिंड्रोम (children born with Down Syndrome in India) होता है। हालांकि, अब समाज में आ रहे बदलावों को ध्यान में रखते हुए इन बच्चों को सीखने और समाज में तालमेल बिठा पाने के लिए तैयार करने की कोशिशें करनी चाहिए।
डॉ. गौरी रवि चिंतापल्ली (Dr. Gowri Ravi Chinthalapalli, Consultant - Child Development, Aster CMI Hospital, Bangalore) कहती हैं कि, " डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों को सही तरह के सपोर्ट की जरूरत होती है जिसकी मदद से बच्चे नयी स्किल्स सीख सकते हैं, अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं और करियर में सफल हो सकते हैं। इन बच्चों की मदद के लिए पेरेंट्स के साथ-साथ परिवार और आसपास के लोगों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।"
Disclaimer : प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।