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ज्यादा स्क्रीन टाइम बन सकता है Digital Fatigue Syndrome का कारण, जानें कैसे डालता है दिमाग पर असर

Digital Fatigue Syndrome व्यक्ति को चिड़चिड़ा बना सकता है। यह दिमाग पर असर डालकर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल कर सकता है।

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Written By: Anju Rawat | Published : February 16, 2026 6:01 PM IST

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Medically Verified By: Dr. Purendra Bhasin

Digital Fatigue Syndrome: आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, लैपटॉप और टीवी का उपयोग हमारी दिनचर्या का सबसे जरूरी हिस्सा बन चुका है। वर्क फ्रॉम हो, ऑनलाइन क्लासेज या मनोरंजन करना, हर काम स्क्रीन की मदद से ही होता है। इसकी वजह से लोगों को लंबे समय तक स्क्रीन देखने की आदत लग जाती है। जब कोई व्यक्ति बिना स्क्रीन के रह नहीं पाता है और उसे हर वक्त मोबाइल फोन चलाने की इच्छा होती है, तो इसकी वजह से धीरे-धीरे डिजिटल फटीग सिंड्रोम की समस्या होने लगती है। डिजिटल फटीग सिंड्रोम की वजह से मानसिक तनाव बढ़ जाता है और इसका असर दिमाग पर भी पड़ता है। डिजिटल फटीग सिंड्रोम का मुख्य कारण बहुत ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर है। लंबे समय तक स्क्रीन पर समय बिताने से आंखों और दिमाग पर दबाव पड़ता है। आइए, रतन ज्योति नेत्रालय, ग्वालियर के फाउंडर और डायरेक्टर डॉ. पुरेन्द्र भसीन से जानते हैं डिजिटल फटीग सिंड्रोम क्या होता है और इसके लक्षण क्या हैं?

डिजिटल फटीग सिंड्रोम के लक्षण

जब किसी व्यक्ति को डिजिटल फटीग सिंड्रोम होता है, तो इस स्थिति में उसे कुछ लक्षणों का अनुभव हो सकता है। इसमें शामिल हैं-

  • आंखों में तेज जलन
  • आंखों में सूखापन
  • तेज सिरदर्द
  • गर्दन और कंधों में दर्द होना
  • मानसिक थकान
  • किसी काम में ध्यान न लगना
  • मूड स्विंग्स या चिड़चिड़ापन

दरअसल,कई लोग लंबे समय तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने, लगातार नोटिफिकेशन और डिजिटल ओवरलोड की वजह से मानसिक रूप से बोझिल महसूस करते हैं। डिजिटल फटीन सिंड्रोम की वजह से बच्चों और किशोरों में पढ़ाई में गिरावट आ सकती है। उनकी नींद पूरी नहीं होती है और इससे उनके व्यवहार में बदलाव हो सकता है।

डिजिटल फटीग सिंड्रोम दिमाग को कैसे प्रभावित करता है?

डॉ. पुरेन्द्र भसीन बताते हैं, "डिजीटल फटीग सिंड्रोम का दिमाग पर असर धीरे-धीरे पड़ता है। लगातार स्क्रीन स्क्रॉलिंग से ब्रेन के रिवार्ड सिस्टम पर प्रभाव पड़ता है। इससे डोपामिन का स्तर बढ़ता जाता है और व्यक्ति के मन में बार-बार फोन चेक करने की इच्छा या आदत विकसित हो जाती है। इसकी वजह से व्यक्ति को लंबे समय तक किसी काम पर ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है। उसे बार-बार फोन इस्तेमाल करने की इच्छा होती है। इतना ही नहीं, जब देर तक फोन का उपयोग (डिजिटल मल्टीटास्किंग) होता है, तो दिमाग की उत्पादकता में भी कमी आने लगती है। यानी डिजिटल फटीग सिंड्रोम की वजह से व्यक्ति को किसी एक काम करने या ध्यान लगाने में मुश्किल हो सकती है। इसलिए डिजिटल डिटॉक्स बहुत जरूरी है।"

डिजिटल फटीग सिंड्रोम से बचाव कैसे करें?

  • डिजिटल फटीग सिंड्रोम से बचने के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित करना बहुत जरूरी होता है।
  • 20-20-20 नियम को फॉलो करें। इसका मतलब है हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें। इससे आंखों को आराम मिलेगाऔर दिमाग भी शांत होगा।
  • सोने से कम से कम एक घंटे पहले स्क्रीन का उपयोग बंद कर दें।
  • बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें। बच्चों को आउटडोर गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें। इससे उनका दिमाग भी तेज होगा और वे फिजिकली एक्टिव रहेंगे।

Highlights:

  • लंबे समय तक मोबाइल फोन या लैपटॉप का इस्तेमाल करना डिजिटल फटीग सिंड्रोम का कारण बन सकता है।
  • यह दिमाग पर असर डाल सकता है और ध्यान लगाने में मुश्किल हो सकती है।
  • सोने से एक घंटे पहले स्क्रीन का इस्तेमाल बिल्कुल न करें।

Disclaimer : प्र‍िय पाठकों यह आर्ट‍िकल केवल सामान्‍य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसल‍िए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए ज‍िम्मेदारी का दावा नहीं करता है।