
रश्मि उपाध्याय
रश्मि उपाध्याय साल 2014 से मीडिया क्षेत्र से जुड़ी हैं और TheHealthSite.Com में बतौर एडिटर काम कर रही हैं। इन्हें ... Read More
Written By: Rashmi Upadhyay | Published : May 21, 2026 10:13 AM IST
100 Years of Essel Group: The ZEEL legacy in advancing health awareness, crisis communication, and public understanding in India over decades
सुबह की चाय के साथ टीवी स्क्रीन पर फ्लैश होती वो लाल पट्टी याद है आपको? जब साल 2020 में अचानक लॉकडाउन लगा था और हर तरफ एक अनजाना डर था, और हम अपने घरों की खिड़कियां बंद करके टीवी स्क्रीन के सामने बैठ गए थे। उस खौफनाक दौर में टीवी से आने वाली एक जानी-पहचानी आवाज हमें बताती थी कि पैनिक मत करिए, मास्क लगाइए, दूरी रखिए और सुरक्षित रहिए। टीवी पर बोला जा रहा था कि आप बस सुरक्षा के मानकों को अपनाएं, सरकार जल्द इस समस्या का समाधान ढूंढ लेगी। वह सिर्फ एक न्यूज चैनल नहीं था, वह एक भरोसा था। आज जब Essel Group अपने गौरवशाली 100 वर्ष पूरे कर रहा है, तब राजनीति और मनोरंजन के विषय में तो हमारे पास बहुत कुछ है ही बताने के लिए, लेकिन इससे इतर हमारे पास एक ऐसे विषय पर बात का भी अवसर है जिसे अक्सर कम आंका जाता है- वह है 'देश की सेहत की फिक्र'।
टाइपराइटर के ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज AI और टेलीप्रॉम्प्टर के इस डिजिटल युग तक, एस्सेल ग्रुप ने सिर्फ भारत को खबरें देखना नहीं सिखाया, बल्कि हर महामारी, हर मेडिकल आउटब्रेक में देश का सबसे बड़ा हेल्थ वॉचडॉग और लाइफसेवर बनकर खड़ा रहा है। आइए समय के पहिए को थोड़ा पीछे घुमाते हैं और देखते हैं कि भारत के स्वास्थ्य इतिहास के हर मुश्किल मोड़ पर Essel Group ने हमारी जान कैसे बचाई।

आज तो हमारे पास व्हाट्सएप और गूगल है, लेकिन एक बार पीछे मुड़कर 90 के दशक के बारे में सोचिए। साल 1994 में जब सूरत में अचानक Plague फैला, तो देश में हड़कंप मच गया था। लोग डर से शहर छोड़कर भाग रहे थे। उस दौर में सैटेलाइट टीवी की दुनिया में कदम रख चुके ZEE ने जिम्मेदारी संभाली। अफवाहों के बाजार के बीच, ग्राउंड पर मौजूद रिपोटर्स और संवाददाताओं ने सीधे डॉक्टरों को स्क्रीन पर लाकर देश को बताया कि प्लेग से डरना नहीं, बल्कि साफ-सफाई कैसे रखनी है। हो सकता है ये बात आपको आज बहुत आम लग रही हो लेकिन यकिन मानिए 90 के दशक में वाकई यह एक उपलब्धि थी।
90 के दशक के बाद जब दिल्ली और उत्तर भारत में डेंगू और चिकनगुनिया के बड़े आउटब्रेक हुए, तब एस्सेल के मीडिया नेटवर्क ने हर घर को एक मेडिकल गाइड की तरह जागरूक किया। मच्छर कहां पनपते हैं, कूलर का पानी कब बदलना है, बच्चों और बुजुर्गों को कैसे सुरक्षित रखना है, आदि जैसी बुनियादी लेकिन जान बचाने वाली जानकारियां ZEE के माध्यम से जन-आंदोलन बनी। भारत को पोलियो मुक्त बनाने के सरकारी अभियान को हर गरीब की झोपड़ी तक पहुंचाने में भी इस नेटवर्क ने रीढ़ की हड्डी का काम किया।
साल 2009-2010 के आसपास जब स्वाइन फ्लू (H1N1) ने भारत में दस्तक दी, तो मास्क और सैनिटाइजर शब्द पहली बार आम भारतीयों की जुबान पर आए थे। ZEE मीडिया ने लगातार स्पेशल बुलेटिन चलाकर लोगों को लक्षणों की पहचान करना सिखाया। इसके बाद केरल में जब जानलेवा निपाह वायरस का प्रकोप हुआ, तो तमाम जरूरी मेडिकल जानकारी को इतनी सरल और आसान भाषा में पेश किया कि दक्षिण से लेकर उत्तर भारत तक लोग जागरूक भी हुए और पैनिक से भी बचे।
साल 2020 में कोरोना काल को भला कोई कौन भूल सकता है। कोरोना वायरस का दौर सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक तनाव का दौर था। जब सोशल मीडिया पर फेक न्यूज की बाढ़ आ गई थी कि लहसुन खाने या भाप लेने से कोरोना ठीक हो जाएगा, तब जी मीडिया ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाई और लोगों में कन्फ्यूजन बढ़ाने के बजाय सटीक जानकारी देकर लोगों को जागरुक किया।
देश के बड़े से बड़े डॉक्टरों के पैनल से लेकर सरकारी मेडिकल बॉडी के एक्सपर्ट और वायरोलॉजिस्ट्स को लाइव बिठाकर देश को असली साइंस समझाई। जब लोग घरों में बंद थे और वर्क फ्रॉम होम के कारण एंग्जायटी, मोटापा और इंसोमनिया जैसी दिक्कतें बढ़ रही थी, तब जी ने वेलनेस, योग और इन-हाउस फिटनेस के स्पेशल शोज चलाए। वह एस्सेल की मीडिया एथिक्स ही थी जिसने संकट के समय देश को टूटने नहीं दिया।

समय बदला, वायरस बदले, लेकिन एस्सेल का नेचर नहीं बदला। जब दुनिया के कुछ हिस्सों में हंतावायरस के मामलों ने दोबारा दुनिया को डराया, जब ZEE के हेल्थ वर्टिकल्स ने सबसे पहले रिसर्च-बेस्ड रिपोर्ट्स सामने रखी। सनसनी फैलाने के बजाय हमेशा यह समझाया गया कि यह वायरस कैसे फैलता है और भारत के लिए इसका रिस्क कितना है। आज, जब हम सीधे दिखने वाले वायरसों से लड़कर आगे बढ़ चुके हैं, तो एस्सेल कनेक्ट का फोकस देश की उन 'साइलेंट महामारियों' पर है जो हमारे घरों को अंदर ही अंदर खोखला कर रही हैं- जैसे थायराइड, डायबिटीज, और हार्मोनल असंतुलन, आदि। आज जब हम अपनी वेबसाइट के जरिए देश के करोड़ों लोगों को उनकी सेहत के प्रति जागरूक कर रहे हैं, तो यह असल में उसी 100 साल पुरानी एस्सेल लिगेसी का विस्तार है।