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"मां जाते-जाते 10 लोगों को जिंदगी दे गई" मां के ऑर्गन डोनेट करने वाली बेटी रिद्धि की ये कहानी रुला देगी

विशाखा जी की बेटी ने साबित कर दिया कि मां सिर्फ यादों में नहीं, बल्कि दुनिया से जाने के बाद भी दूसरों की धड़कनों और सांसों में हमेशा के लिए अमर रह सकती है। इसीलिए अंगदान बहुत जरूरी है।

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Written By: Rashmi Upadhyay | Published : June 16, 2026 1:07 PM IST

Zindagi ke baad bhi campaign: जब कोई अपना इस दुनिया से जाता है, तो पीछे छोड़ जाता है कभी न खत्म होने वाला सन्नाटा और आंसू। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जाते-जाते भी दूसरों की बुझती हुई जिंदगी में उम्मीद का दीया जला जाते हैं। मुंबई की विशाखा पारेख एक ऐसा ही नाम हैं, जो आज से लगभग एक साल पहले 10 अगस्त, 2025 को गोरेगांव के ऑस्कर हॉस्पिटल में अंतिम सांस लेकर इस दुनिया को अलविदा कह गईं, लेकिन अपने पीछे 10 अजनबियों को एक नई जिंदगी दे गईं। जब Zee Media की टीम ने उनकी 32 साल की बेटी रिद्धि पारेख से बातचीत की तो उन्होंने उस रात के दर्द, संघर्ष और हिम्मत की ऐसी कहानी सुनाई जिससे हमारे समाज की आंखें खुल जाएंगी।

पैर की मामूली चोट और वो एक रूटीन टेस्ट, जिसने सब उजाड़ दिया

बेटी रिद्धि पारेख बताती हैं कि विशाखा जी को कोई गंभीर बीमारी नहीं थी, वे बिल्कुल स्वस्थ थीं। "मां के पैर में बस एक मामूली चोट लगी थी।" दर्द बढ़ने पर जब टेस्ट और सोनोग्राफी हुई, तो पता चला कि उनके पैर की नसें ब्लॉक हैं। इसके बाद डॉक्टर्स की टीम ने आगे की कार्रवाई की लेकिन तभी अचानक विशाखा जी को गंभीर ब्रेन हैमरेज हो गया और डॉक्टरों ने उन्हें 'ब्रेन डेड' घोषित कर दिया। पारेख परिवार के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं था। पैर की एक छोटी सी चोट कुछ ही घंटों में विशाखा जी को मौत के मुंह तक ले जाएगी, ऐसा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। लेकिन इस अचानक आए पहाड़ जैसे दुख के बीच भी रिद्धि ने हिम्मत नहीं हारी।

Organ Donation

रिद्धि ने 2 साल पहले ली थी ऑर्गन डोनर की शपथ

रिद्धि बताती हैं, "2 साल पहले जब मैंने खुद को ऑर्गन डोनर के रूप में रजिस्टर किया था, तो मां ने मुझ पर बहुत गर्व किया था। बस मां की वही बात उस दुख की घड़ी में मेरी ताकत बन गई। मैंने तय कर लिया था कि मैं अपनी मां को ऐसे ही नहीं जाने दूंगी, उन्हें दूसरों की सांसों में जिंदा रखूंगी।"

'चाहे जो हो जाए, मां का अंगदान करना है'

फैसला जितना बड़ा था, राह उतनी ही मुश्किल थी। विशाखा जी जिस अस्पताल में भर्ती थीं, वहां ऑर्गन निकालने (Retrieval) की सुविधा ही नहीं थी। रिद्धि कहती हैं, "जब हमने प्रोसेस देखा, तो एक बार के लिए मैं और मेरा पूरा परिवार बुरी तरह डर गए थे। प्रोसेस इतना लंबा और पेचीदा था कि कोई भी आम इंसान हिम्मत हार जाए। लेकिन हमने ठान लिया था।" उस समय पारेख परिवार की ढाल बना 'मोहन फाउंडेशन' (MOHAN Foundation)। संस्था और ZTCC मुंबई की मदद से विशाखा जी को तुरंत नानावटी मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल शिफ्ट किया गया। रिद्धि और उनके परिवार के इसी दृढ़ निश्चय का नतीजा था कि विशाखा जी की किडनी, लिवर, कॉर्निया और हड्डियों की मदद से 10 लोगों को एक नया जीवन मिला।

'लोग क्या कहेंगे' से ऊपर उठा परिवार

क्या 1 साल में कभी इस फैसले पर पछतावा (Regret) हुआ? इस सवाल पर रिद्धि की आवाज में एक अजीब सा सुकून और गर्व है। वो कहती हैं, "पछतावा? कभी नहीं! बल्कि हर बीतते दिन के साथ मेरा और मेरे परिवार का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है कि मेरी मां आज भी इस दुनिया में है, किसी की आंखों से देख रही है, किसी के दिल में धड़क रही है।" रिद्धि ने बताया कि शुरुआत में रिश्तेदारों और समाज में थोड़ा संकोच था, लेकिन जब उन्होंने देखा कि इस दुख में भी पारेख परिवार ने कितना बड़ा कदम उठाया है, तो सभी ने उनके इस साहसी फैसले को सलाम किया।

Organ Donation Importance

क्या अंगदान करने से भगवान नाराज होते हैं?

जब रिद्धि से पूछा गया कि समाज में लोग अंगदान करने से कतराते क्यों हैं? रिद्धि के मुताबिक, इसके पीछे दो सबसे बड़े कारण हैं- पहला, जागरूकता की कमी और लंबा प्रोसेस, जिससे लोग घबरा जाते हैं। और दूसरा, सबसे बड़ा कारण है 'धार्मिक अंधविश्वास'। रिद्धि बताती हैं, "हमारे समाज में लोगों का यह अंधविश्वास है कि हम जैसे इस दुनिया में आए हैं, मरने के बाद भगवान को हमारे सारे अंग वैसे के वैसे ही वापस मिलने चाहिए। लेकिन मुझे लगता है कि यह सोच बिल्कुल गलत है। किसी मरते हुए इंसान की मदद करने से, किसी को जिंदगी देने से भगवान कभी नाराज नहीं हो सकते। बल्कि वो तो सबसे ज्यादा खुश होंगे।"

मां का अंगदान करने वाली रिद्धि समाज को क्या कहना चाहती हैं?

रिद्धि उन सभी परिवारों को एक संदेश देना चाहती हैं जो इस मुश्किल घड़ी में फैसला नहीं ले पाते। वह कहती हैं, "अंगदान को लेकर अपने घरों में आज ही बात कीजिए। जब तक हम जिंदा रहते हुए इस पर चर्चा नहीं करेंगे, तब तक ऐन वक्त पर फैसला लेना मुश्किल होगा। दुख के उस एक पल में आपका एक साहसी फैसला लेना होगा। मेरी मां आज भी अमर हैं, और एक बेटी के लिए इससे बड़ा सुकून कुछ नहीं हो सकता।"

Zee Media की अपील: अंगदान महादान

अंगदान को लेकर हमारे समाज में आज भी जागरूकता की भारी कमी है। हर साल भारत में लाखों लोग सिर्फ इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें समय पर ऑर्गन नहीं मिल पाते। विशाखा पारेख जी के परिवार की यह कहानी हमें सिखाती है कि जब दुख का पहाड़ टूटा हो, तब भी हम अपनी सोच को बड़ा रखकर किसी के घर का बुझता हुआ चिराग रोशन कर सकते हैं। आइए, Zee Media के जागरूकता अभियान 'जिंदगी के बाद भी' का हिस्सा बनें, अंगदान से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करें और अंगदान करने का संकल्प लें। क्योंकि आपके एक फैसले से किसी को दूसरी जिंदगी मिल सकती है। विशाखा पारेख जी और उनके पूरे परिवार के इस जज्बे को ZeeMedia कोटि-कोटि नमन करता है।

Organ Donor

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कौन कर सकता है अंगदान?

अंगदान दो तरह से होता है- पहला 'लिविंग डोनेशन' (जीवित रहते हुए किडनी या लिवर का एक हिस्सा देना) और दूसरा 'डिसीज्ड डोनेशन' (ब्रेन डेड घोषित होने के बाद आंखें, दिल, लिवर, किडनी आदि दान करना)। मेडिकल टीम जांच के बाद ही तय करती है कि कौन से अंग दान किए जा सकते हैं।

कैसे कर सकते हैं अंगदान?

  • जब किसी अपने की मृत्यु होने वाली हो या डॉक्टर उसे 'ब्रेन डेड' घोषित कर दें, तो बिना समय गंवाए तुरंत अस्पताल के डॉक्टर को बताएं कि आप अंगदान करना चाहते हैं, या सरकारी हेल्पलाइन 1800-11-4770 पर फोन करें।
  • डॉक्टर आपसे एक फॉर्म पर साइन करवाएंगे। इसमें कोई पैसा नहीं लगता और न ही इलाज का कोई खर्च परिवार से लिया जाता है।
  • अंग निकालने का ऑपरेशन बेहद सम्मान के साथ किया जाता है, शरीर पर कोई दाग या खराबी बाहर से नहीं दिखती और ऑपरेशन के तुरंत बाद शव परिवार को सम्मान समेत अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया जाता है।

कहां होता है अंगदान?

  • आप सीधे notto.mohfw.gov.in पर जाकर 'Register' बटन पर क्लिक करें और एक साधारण फॉर्म भरकर अपना डोनर कार्ड पा सकते हैं।
  • NOTTO के अलावा आप MOHAN Foundation या Organ India जैसी संस्थाओं की वेबसाइट पर जाकर भी ऑनलाइन फॉर्म भर सकते हैं।

NOTTO की वेबसाइट पर फॉर्म कैसे भरते हैं?

  • Notto.mohfw.gov.in वेबसाइट खोलें और होमपेज पर ऊपर दिख रहे "Register for Organ Donation" बटन पर क्लिक करें।
  • अब आपके सामने एक फॉर्म खुलेगा। इसमें अपना नाम, जन्मतिथि (DOB), जेंडर, मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी और अपना पूरा पता सही-सही भरें।
  • फॉर्म में अपना ब्लड ग्रुप सिलेक्ट करें। इसके बाद आपसे पूछा जाएगा कि आप कौन से अंग दान करना चाहते हैं—आप चाहें तो 'All Organs' (सभी अंग) चुन सकते हैं या अपनी मर्जी से कुछ खास अंग (जैसे सिर्फ आंखें या किडनी) पर टिक कर सकते हैं।
  • कानूनी तौर पर आपको दो गवाहों (Witness) के नाम और उनके फोन नंबर भरने होते हैं। इसमें आप अपने परिवार के किसी भी दो सदस्यों की डिटेल डाल सकते हैं।
  • आखिर में आपके मोबाइल नंबर पर एक OTP आएगा, उसे बॉक्स में डालकर 'Submit' कर दें। रजिस्ट्रेशन पूरा होते ही स्क्रीन पर आपका 'Organ Donor Card' आ जाएगा, जिसे आप डाउनलोड करके अपने पास रख सकते हैं।
  • फॉर्म भरने के लिए कोई फीस देनी पड़ती।
  • फॉर्म भरने के बाद अपने परिवार को इस फैसले के बारे में जरूर बताएं, क्योंकि आपके जाने के बाद उनकी कानूनी अनुमति अनिवार्य होती है।

डोनर कार्ड क्या होता है?

NOTTO या किसी संस्था द्वारा जारी किया गया एक पहचान पत्र होता है, जो यह बताता है कि आपने अपनी मृत्यु के बाद अपने अंग दान करने का संकल्प लिया है। यह कार्ड आपकी इच्छा का प्रमाण तो है, लेकिन आपके जाने के बाद अंगदान तभी हो सकता है जब आपका परिवार इसके लिए अंतिम लिखित अनुमति देता है।

अंगदान के बारे में 5 बड़ी अफवाहें

भ्रम (Myths)सच (Facts)
अगर मैं अंगदान के लिए साइन करूंगा, तो डॉक्टर अस्पताल में मुझे बचाने की कोशिश नहीं करेंगे।डॉक्टर का पहला काम आपकी जान बचाना होता है, अंगदान की बात सिर्फ तब शुरू होती है जब मरीज 'ब्रेन डेड' घोषित हो जाए।
घर पर सामान्य मौत होने के बाद भी शरीर के सारे अंग दान किए जा सकते हैं।घर पर प्राकृतिक मौत होने पर सिर्फ आंखें दान हो सकती हैं, बाकी अंग नहीं।
अंगदान करने से मृत व्यक्ति का शरीर पूरी तरह से खराब हो जाता है।अंगों को एक सामान्य ऑपरेशन की तरह बेहद सम्मान से निकाला जाता है, जिससे शव पर बाहर से कोई खराबी या दाग न दिखे।
अंगदान के लिए परिवार को अस्पताल को बहुत सारे पैसे देने पड़ते हैं।अंगदान पूरी तरह से मुफ्त और एक नेक काम है, डोनर के परिवार से पैसा नहीं लिया जाता।
मैं बहुत बूढ़ा हूं या मुझे बीमारी है, इसलिए मेरे अंग किसी काम के नहीं हैं।उम्र मायने नहीं रखती, मौत के वक्त डॉक्टर्स मेडिकल जांच करके खुद तय करते हैं कि आपके कौन से अंग स्वस्थ हैं और जान बचा सकते हैं।
अगर अंगदान किए तो अगले जन्म में उस अंग के बिना पैदा होना पड़ेगा।यह सिर्फ एक अंधविश्वास है।
अंगदान करने से भगवान नाराज होते हैं।सभी प्रमुख धर्मों में अंगदान को इंसानियत की सबसे बड़ी सेवा और एक पुण्य का काम माना जाता है।
अंगदान के बाद डॉक्टर पूरी बॉडी को कांट छांट पर परिवार को देते हैं।अंगों को एक सामान्य और बेहद साफ-सुथरे सर्जिकल ऑपरेशन की तरह निकाला जाता है।