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Baccho Me Mansik Rog- भले ही आज लोग यह कहने लगे कि शारीरिक बीमारी की तरह ही मानिसक बीमारी होना भी लाजमी है और इसमें शर्म करने के बजाय डॉक्टर को दिखाना चाहिए। लेकिन क्या ऐसा होता है? सच्चाई ये है कि मेंटल हेल्थ (Mental Health in India) आज भी हमारे देश में पागलपन का पर्याय है। अगर एक मिडिल क्लास फैमिली में किसी व्यक्ति को एंग्जाइटी, आब्सेसिव कम्पलसिव डिसआर्डर, हर वक्त नेगेटिव ख्याल आना और खुद को नुकसान पहुंचाने जैसी चीजें महसूस हो तो उसे बिना सोच समझे पागल कह दिया जाता है। यही वो कारण है कि लोग अपने लक्षणों को दबा देते हैं और मुखोटा पहनकर समाज के आगे आते हैं। कुछ दिनों बाद ये स्थिति इतनी खतरनाक हो जाती है कि मौत का कारण भी बन सकती है। जब से डिजिटल और इंटरनेट का क्रेज बढ़ा है बड़ों के साथ ही टीनेजर्स में भी मानसिक रोग होना कॉमन हो गया है।
एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर 10 में से 1 टीनेजर मानसिक रोग का शिकार होता है। इसी विषय पर हाल ही में मानसिक शक्ति फाउंडेशन द्वारा एक दिवसीय कॉन्फ्रेंस "छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों और डिजिटल इनोवेशन" पर एक दिन की कॉन्फ्रेंस दिल्ली के कॉन्स्टिटूशन क्लब में सम्पन्न हुई। इस कॉन्फ्रेंस में डिजिटल तकनीक की मदद से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को सशक्त बनाने के नए तरीकों पर चर्चा हुई। डॉ. अमरेश श्रीवास्तव ने कहा कि आजकल डिजिटल एप बच्चों को मेंटल हेल्थ समस्याओं से बचाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इस तरह के ऐप छात्रों को मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन, सेल्फ-हेल्प टेक्नीक और विशेषज्ञ परामर्श सेवाओं तक आसान पहुंच प्रदान करते हैं।
क्योंकि छोटे बच्चों और टीनेजर्स का विकास चल ही रहा होता है इसलिए उनमें एंग्जाइटी या डिप्रेशन जैसे बीमारियों के लक्षण इतनी आसानी से नहीं दिखते हैं। जब बच्चों की बढ़ने की उम्र होती है तो उनके बात करने का तरीका, खाने का तरीका, सोने का तरीका और उठने बैठने का तरीका वैसे भी बड़ों से अलग होता है। कई बार डॉक्टर भी बच्चों में एंग्जाइटी या अन्य मानसिक रोगों के शुरुआती लक्षणों को पहचानने में कन्फ्यूज हो जाते हैं। लेकिन ये भी सच है कि अगर छोटी उम्र में बच्चों में पनप रहे मानसिक रोगों के लक्षणों को पकड़ा न जाए तो वो टीनेज तक आते आते डिप्रेशन या एंग्जाइटी के शिकार हो जाते हैं।