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ज्यादातर लोगों को लगता है कि हार्ट और किडनी दोनों अलग-अलग अंग हैं तो इनके बीच कोई खास रिश्ता नहीं है। यानि कि अगर किसी व्यक्ति को किडनी से संबंधित कोई समस्या होती है तो इससे उसके हार्ट पर कोई फर्क नहीं पडेगा। लेकिन तमाम मेडिकल रिसर्च और ट्रायल के बाद यह साफ हो चुका है कि हार्ट और किडनी दोनों ही अंग आपस में एसोसिएट हैं। अगर किसी भी ऑर्गन में कोई खराबी होती है तो इसका सीधा असर हार्ट रेट पर भी पड़ेगा। मेडिकल भाषा में इसे 'कार्डियोरेनल' रोग कहते हैं। हर साल 9 मार्च को विश्व किडनी दिवस (World Kidney Day) मनाया जाता है और आज इस मौके पर एशियन हार्ट इंस्टीट्यूट के सीनियर कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर संतोष कुमार डोरा (Dr. Santosh Kumar Dora, Senior Cardiologist at Asian Heart Mumbai) आपको बताएंगे कि किडनी कैसे हार्ट को प्रभावित कर सकती है।
उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, मोटापा और डिस्लिपिडेमिया ऐसी बीमारियां हैं तो हार्ट डिजीज और किडनी डिसफंक्शन दोनों के लिए खतरनाक साबित होती है। ये स्थितियां अक्सर एकसाथ चलती हैं और एक-दूसरे की प्रगति को बढ़ाती हैं, जिससे हृदय और किडनी के स्वास्थ्य पर सिनेरगेटिक प्रभाव पड़ता है।
सूजन संबंधी प्रक्रियाएं, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और एंडोथेलियल डिसफंक्शन हृदय रोग और किडनी रोग दोनों के विकास और प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
क्रोनिक किडनी रोग में फ्लूइड और इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन से उच्च रक्तचाप और फ्लूइड ओवरलोड हो सकता है, जिसकी वजह से हृदय पर दबाव आता है और हृदय गति प्रभावित हो सकती है। इसी तरह, हार्ट फेल होने की स्थिति में भी किडनी में रक्त का प्रवाह कम हो सकता है, जिससे उनका कार्य प्रभावित हो सकता है। इसलिए, ये दोनों यह कहना गलत नहीं होगा कि हार्ट और किडनी के फंक्शन काफी हद तक एक जैसे होते हैं और एक-दूसरे के लक्षणों को बढ़ाती हैं।
इकोकार्डियोग्राफी और कार्डियक मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) जैसी तकनीक हृदय संरचना और कार्य में संबंध में विस्तार से और गहरी जानकारी देती है अंतर्निहित किडनी की शिथिलता का संकेत देने वाली सूक्ष्म असामान्यताओं की पहचान कर सकती हैं। ऐसे में डॉक्टर को एक समझ मिल जाती हैं कि इलाज को किस दिशा में ले जाना है।
ट्रोपोनिन और ब्रेन नैट्रियूरेटिक पेप्टाइड (बीएनपी) जैसी बायोमार्कर जांचें किडनी रोग के रोगियों में हृदय संबंधी परिणामों के बारे में गहरी जानकारी प्रदान करती हैं।
उपचार भी दोनों में समान हैं। जबकि ऐसे कई प्रीक्लिनिकल और क्लिनिकल अध्ययन हैं जो बताते हैं कि सामान्य मार्गों पर लक्षित थेरेपी कार्डियोरेनल सिंड्रोम को कम करने में सक्षम हो सकती हैं। इसलिए हेल्दी डाइट, नियमित शारीरिक गतिविधि, धूम्रपान का सेवन न करना और सही समय पर दवाओं का सेवन करने से न सिर्फ हृदय संबंधी जोखिम कम होता है बल्कि किडनी की कार्यप्रणाली भी अच्छी होती हैं।