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Medically Verified By: Dr. Pavitra Shankar
जब कोई व्यक्ति सिगरेट या अन्य नशे का सेवन करता है तो दिमाग में डोपामिन नामक केमिकल अचानक बढ़ जाता है। डोपामिन को ‘फील गुड’ हार्मोन भी कहा जाता है, जो खुशी और संतुष्टि का एहसास कराता है। यही कारण है कि शुरुआत में नशा करने के बाद थोड़ी राहत या सुकून महसूस होता है।
तनाव भरी जिंदगी, काम का दबाव और निजी समस्याओं के बीच कई लोग सिगरेट, शराब या अन्य नशे को अपना स्ट्रेस कम करने और सुकून पाने का एक जरिया मान लेते हैं। अक्सर यह सुनने को मिलता है कि एक कश लेने या एक पैग पीने से दिमाग हल्का हो जाता है। लेकिन आकाश हेल्थकेयर में मनोचिकित्सक विभाग की एसोसिएट कंसल्टेंट डॉ. पवित्रा शंकर का कहना है कि ‘यह सुकून असली नहीं, बल्कि दिमाग का केमिकल खेल है, जो धीरे-धीरे व्यक्ति को लत की ओर धकेल देता है। नशा शुरुआत में दिमाग को झूठा सुकून देता है, क्योंकि यह ब्रेन के रिवॉर्ड सिस्टम पर असर डालता है।’
डॉक्टर पवित्रा शंकर कहती हैं कि ‘सिगरेट, शराब या अन्य नशे के पदार्थ डोपामिन नाम के केमिकल को अचानक बढ़ा देते हैं, जिससे व्यक्ति को थोड़ी देर के लिए हल्कापन, राहत या खुशी महसूस होती है। लेकिन यह प्रभाव अस्थायी होता है। जैसे ही असर कम होता है, दिमाग दोबारा उसी ‘फील-गुड’ एहसास की मांग करता है। यही वजह है कि एक कश लेने की तलब धीरे-धीरे आदत और फिर लत में बदल जाती है।’
नशे की लत को लेकर क्या कहती हैं डॉक्टर?
‘समय के साथ शरीर सहनशील हो जाता है, यानी पहले जितना असर पाने के लिए ज्यादा मात्रा की जरूरत पड़ती है। नशा सुकून नहीं देता, बल्कि तनाव, चिड़चिड़ापन और मानसिक निर्भरता बढ़ाता है। असली समाधान काउंसलिंग, सपोर्ट सिस्टम और स्वस्थ विकल्प अपनाना है।’ आइए अब हम थोड़ा विस्तार से जानते हैं कि आखिर एक कश लेने के बाद बार-बार पीने का मन क्यों करता है?
डॉक्टर के मुताबिक, शरीर और दिमाग समय के साथ नशे के प्रभाव के प्रति सहनशील हो जाते हैं। इसे टॉलरेंस कहा जाता है। यानी पहले जो सुकून एक सिगरेट से मिलता था, वही असर पाने के लिए बाद में दो या तीन की जरूरत पड़ सकती है। यह बढ़ती मात्रा लत को और मजबूत बनाती है।
डॉक्टर कहते हैं ‘जब व्यक्ति तनाव में होता है, तो उसका दिमाग पुराने अनुभवों को याद करता है। अगर पहले तनाव के समय सिगरेट से राहत मिली थी, तो दिमाग उसी रास्ते को दोबारा अपनाने का संकेत देता है। धीरे-धीरे यह आदत व्यवहार का हिस्सा बन जाती है।’
शुरुआती दौर में नशा तनाव कम करता हुआ महसूस हो सकता है, लेकिन लंबे समय में यह चिंता, डिप्रेशन, नींद की समस्या और चिड़चिड़ापनबढ़ा सकता है। निकोटिन या अल्कोहल का असर खत्म होते ही शरीर विदड्रॉल लक्षण दिखाने लगता है- जैसे घबराहट, सिरदर्द, ध्यान की कमी और बेचैनी। इन लक्षणों से बचने के लिए व्यक्ति फिर नशे की ओर लौटता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि असली सुकून स्वस्थ जीवनशैली से आता है- जैसे नियमित व्यायाम, मेडिटेशन, पर्याप्त नींद और भावनात्मक समर्थन। काउंसलिंग और बिहेवियर थेरेपी भी लत छोड़ने में मददगार साबित होती है।
डॉ. का कहना है, ‘लोग अक्सर नशे को तनाव का समाधान मान लेते हैं, जबकि यह समस्या को और जटिल बना देता है। सही मार्गदर्शन, परिवार का सहयोग और पेशेवर मदद से तलब पर काबू पाया जा सकता है।’ स्पष्ट है कि नशा सुकून का स्थायी साधन नहीं, बल्कि एक अस्थायी भ्रम है। एक कश से शुरू होने वाली आदत कब लत बन जाए, इसका अंदाजा अक्सर देर से होता है। इसलिए बेहतर है कि सुकून के स्वस्थ और सुरक्षित विकल्प अपनाए जाएं।
Disclaimer: प्रिय पाठकों यह आर्टिकल केवल सामान्य जानकारी और सलाह देता है। यह किसी भी तरह से चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। इसलिए अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। thehealthsite.com इस जानकारी के लिए जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।