
किशोरी मिश्रा
किशोरी मिश्रा को डिजिटल मीडिया का लगभग 8+ वर्षों का व्यापक अनुभव है, जिसमें स्वास्थ्य (Health) और जीवनशैली ... Read More
Written By: Kishori Mishra | Published : April 22, 2026 5:45 PM IST
Rare Breathing Issue
हॉस्पिटल में आया हर एक केस डॉक्टर्स के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता है। कुछ चुनौतियां ऐसी हो जाती हैं, जिसके बारे में जानकर ही हमें हैरानी होती है, लेकिन डॉक्टर्स की टीम की सूझबूझ से किया गया इलाज लोगों को नई जिंदगियां दे जाता है। मुख्य रूप जब मामला किसी छोटे से बच्चे का होता है, तो हर किसी का हाथ कांप जाता है। लेकिन डॉक्टर्स ऐसी चुनौतियों का सामना हमेशा डटकर करते हैं। इसलिए उन्हें धरती का भगवान भी माना गया है। ठीक ऐसा ही केस मुंबई के Narayana Health SRCC Children’s Hospital में डॉक्टरों के सामने आया, जो बेहद जटिल था। लेकिन डॉक्टर्स की जीवनरक्षक सर्जरी से दो साल की बच्ची एबिगेल लोबो की जान बचाई। आइए जानते हैं इस पूरे मामले को विस्तार से -
डॉक्टर राशिकल शाह के मुताबि, "शुरुआत में यह मामला सामान्य लग रहा था, लेकिन धीरे-धीरे यह गंभीर रूप लेता गया। बच्ची को पहले गर्दन में हल्की अकड़न और सांस लेने में मामूली दिक्कत महसूस हो रही थी। परिवार ने इसे सामान्य संक्रमण या मौसमी समस्या समझा, लेकिन अगले चार से पांच महीनों में लक्षण तेजी से बढ़ने लगे।"
बच्ची को सांस लेने में परेशानी बढ़ती गई, सांस लेते समय आवाज आने लगी और उसकी आवाज में भी बदलाव दिखाई देने लगा। खासतौर पर लेटने पर उसकी स्थिति और खराब हो जाती थी। इन लक्षणों ने माता-पिता को चिंतित कर दिया, जिसके बाद वे तुरंत अस्पताल पहुंचे।
अस्पताल में जांच के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि बच्ची की सांस की नली यानि ट्रेकिया अपनी सामान्य स्थिति से हट गई है, जो किसी गंभीर अंदरूनी समस्या का संकेत था। इसके बाद अल्ट्रासाउंड और कॉन्ट्रास्ट-एन्हांस्ड CT स्कैन जैसे एडवांस टेस्ट किए गए। इन टेस्ट में सामने आया कि बच्ची की छाती के सामने वाले हिस्से यानि एंटीरियर मीडियास्टिनम में एक गांठ हो गई थी, जो थाइमस ग्रंथि से निकलकर गर्दन तक फैल चुकी थी। यह गांठ ट्रेकिया को दबा रही थी, जिससे सांस की नली संकरी हो गई थी और बच्ची को लगातार सांस लेने में खतरा बना हुआ था।
इस चुनौतीपूर्ण स्थिति को देखते हुए एक मल्टीडिसिप्लिनरी टीम बनाई गई, जिसका नेतृत्व डॉ. राशिकल शाह ने किया। उनके साथ डॉ. प्रदीप के, कौशिक भी शामिल थे। डॉक्टरों ने बेहद सावधानी से सर्जरी की योजना बनाई, क्योंकि छोटे बच्चों में ऐसी स्थिति बहुत जोखिम भरी होती है।
सर्जरी के दौरान एक और चुनौती सामने आई, जब ऑपरेशन के बीच किए गए इंट्राऑपरेटिव अल्ट्रासाउंड में गांठ के कुछ हिस्से ठोस पाए गए। इसके चलते डॉक्टरों को तुरंत अपनी रणनीति बदलनी पड़ी और उन्होंने मीडियन स्टर्नोटॉमी अपनाई, ताकि गांठ को पूरी तरह और सुरक्षित तरीके से हटाया जा सके।
सर्जरी के दौरान डॉक्टरों ने बेहद सटीक तरीके से काम करते हुए ट्रेकिया, थाइमस और आसपास की महत्वपूर्ण ब्लड बेसेल्स को सुरक्षित रखा। इस जटिल ऑपरेशन में खून की कमी भी बहुत कम रही, जो टीम की कुशलता को दर्शाता है।
ऑपरेशन के बाद बच्ची को कुछ समय तक निगरानी में रखा गया और उसकी रिकवरी काफी बेहतर रही। बाद में हिस्टोपैथोलॉजी जांच में पुष्टि हुई कि यह गांठ कैंसर नहीं थी, बल्कि एक बेनाइन ट्यूमर था। यह खबर परिवार के लिए बड़ी राहत लेकर आई।
डॉक्टरों के अनुसार, छोटे बच्चों में इस तरह की मीडियास्टिनल गांठ का इलाज बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि सांस की नली पर थोड़ा सा दबाव भी जानलेवा साबित हो सकता है। ध्यान रखें कि अगर बच्चों में सांस से जुड़ी कोई भी असामान्य समस्या लंबे समय तक बनी रहे, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच और सही इलाज से गंभीर से गंभीर स्थिति को भी संभाला जा सकता है।
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